बच्चों का बात न मानना और चिड़चिड़ा होना सिर्फ उनकी जिद नहीं, बल्कि इसका कहीं न कहीं कनेक्शन माता-पिता से भी होता है. आज के समय में कई माता-पिता इस बात से परेशान हैं कि उनका बच्चा हमेशा फोन चलाने या फिर फोन देखने की जिद्द करता है. ऐसे में क्या बच्चों को स्क्रीन देखने देना चाहिए या नहीं, लेकिन मनोविज्ञान कहता है कि सिर्फ बच्चों का स्क्रीन टाइम ही मायने नहीं रखता, बल्कि माता-पिता के हाथ में रहने वाली स्क्रीन भी उतनी ही महत्वपूर्ण है यानी अगर पेरेंट्स हर समय फोन में व्यस्त रहते हैं, तो इसका असर बच्चे के व्यवहार, उसकी भावनाओं और परिवार के रिश्तों पर भी पड़ सकता है.
क्या आपकी फोन की आदत बिगाड़ रही है बच्चे का व्यवहार
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बच्चे अपने माता-पिता की आदतों को देखकर सीखते हैं. ऐसे में पेरेंट्स का मोबाइल इस्तेमाल करने का तरीका भी बच्चों के व्यवहार और परिवार के साथ उनके जुड़ाव को प्रभावित कर सकता है. जैसे मान लीजिए आपका बच्चा आपसे कोई बात कर रहा है और उसी समय आप ऑफिस का ईमेल चेक करने लगते हैं या फिर परिवार के साथ खाना खाते समय व्हाट्सऐप का जवाब देने लगते हैं. कई बार पार्क में बच्चे को झूला झुलाते हुए भी लोग सोशल मीडिया स्क्रॉल करने लगते हैं. ये पल देखने में छोटे और मामूली लगते हैं, क्योंकि इनमें सिर्फ कुछ सेकंड ही लगते हैं.
जब ऐसा दिन में बार-बार होता है, तो यह धीरे-धीरे बच्चे के साथ बनने वाले भावनात्मक जुड़ाव और उसकी परवरिश पर असर डाल सकता है. मनोविज्ञान में इसे टेक्नोफेरेंस कहा जाता है. इसका मतलब है कि मोबाइल, टैबलेट या अन्य डिजिटल डिवाइस माता-पिता और बच्चों के बीच होने वाली बातचीत और ध्यान में बार-बार बाधा डालते हैं. इससे बच्चे को लग सकता है कि उसकी बातों या भावनाओं को उतनी अहमियत नहीं दी जा रही है, जिसका असर उसके व्यवहार और रिश्तों पर पड़ सकता है.
क्या कहती है रिसर्च
यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन ने इस पर रिसर्च की, जो चाइल्ड डेवलपमेंट जर्नल में प्रकाशित हुई थी. इस स्टडी में पाया गया कि लगभग हर दो में से एक माता-पिता ने माना कि मोबाइल और टैबलेट आदि सामान्य दिन में कम से कम तीन बार या उससे अधिक उनके और बच्चों के साथ बिताए जाने वाले समय में बाधा डालती है.
रिसर्च के अनुसार, भले ही ये रुकावटें कुछ सेकंड की ही क्यों न हों, लेकिन बार-बार होने पर इनका असर बच्चों के व्यवहार पर पड़ सकता है. जिन परिवारों में डिजिटल डिवाइस माता-पिता और बच्चों के बीच बातचीत में अक्सर दखल देते हैं, वहां बच्चों में नाराजगी, चिड़चिड़ापन, निराशा और बार-बार शिकायत करने जैसी समस्याएं अधिक देखने को मिलीं. एक्सपर्ट के अनुसार, बच्चों के लिए सिर्फ माता-पिता की मौजूदगी ही नहीं, बल्कि उनका पूरा ध्यान भी जरूरी होता है. जब बच्चे को बार-बार महसूस होता है कि मोबाइल उसकी बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण है, तो उसके व्यवहार और भावनात्मक विकास पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
यह भी पढ़ें:- क्या आपका बच्चा बुलिंग का शिकार है? इन 5 संकेतों को कभी न करें नजरअंदाज
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं