तेहरान स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ पोलिटिकल स्टडीज एंड रिसर्च की ओर से प्रकाशित ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) के जीवन और वंशावली पर आधारित हिदातायुल्लाह बेह्बानी की किताब 'शरह-ए-इस्म' के मुताबिक खामेनेई साहब शियों के चौथे इमाम, इमाम ज़ैनुलाबिदीन (अ.स.) के वंशज हैं. कर्बला के हादसे के बाद इमाम ज़ैनुलाबिदीन (अ.स.) ने शियों और हुसैनियों की एकता सुनिश्चित की. किताब 'अल-सवाइक-अल-मुहर्रिका' के मुताबिक इनको सिंध पर आक्रमण और नरसंहार करवाने वाले बनी उमय्या के खलीफा अल-वलीद बिन अब्दुल मलिक ने 25 मुहर्रम, 712 ईस्वी में ज़हर देकर शहीद कर दिया गया था. उसी साल पैगम्बर के खानदान के लोगों को पनाह देने वाले राजा दाहिर को भी खलीफा के आदेश पर शहीद किया गया था. 1806 में कट्टर औरंगज़ेबी और शिया-सूफी विरोधी विचारधारा वाले वहाबियों ने मदीने स्थित 'जन्नतुल बकी' में इनकी कब्र को ढहा दिया. 1926 ई० में दोबारा यही काम आल-ए-सउद ने किया. पैगम्बर मुहम्मद साहब (स.अ.व.) की दुश्मनी में उनके खानदान के और लोगों की कब्र को ढहा दिया. आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) के पूर्वजों में सबसे पहले सुलतान सैयद अहमद (र.) 360 हिजरी (970 ईस्वी) में ईरान आए थे. उन्हें अब्बासी खलीफा के कहने पर नमाज़ की हालत में शहीद कर दिया गया था.
आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 25 मुहर्रम को क्यों दफन किए गए
इसी क्रम में आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) को इमाम ज़ैनुलाबिदीन (अ.स.) की शहादत के अय्याम 25 मुहर्रम को ही मशहद में दफन किया गया. इसी वजह से 28 फरवरी के बाद उनका शव तब तक संरक्षित रखा गया. ये एक सोची समझी रणनीति भी थी, क्योंकि कुछ दिनों में अरबईन शुरू हो जाएगा और करोड़ों में लोग स्वाभाविक रूप से एकत्र रहेंगे. इस्लामिक कैलंडर के 'सफ़र' के महीने की 20 तारीख को हर साल करोड़ों लोग नजफ़ से कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़े (कब्र) तक चल कर जाते हैं और उनकी ज़ियारत (दर्शन) करते हैं. इसी को अरबईन वाक (Arabaeen Walk) कहते हैं. इराक में जनाज़े का सफ़र अरबईन की तरह नजफ़ से कर्बला तक रहा. इस जनाज़े को जानकारों ने दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा जनाज़ा बताया है.
इस लेख का उद्देश्य यह दिखाना है कि नजफ़ से लेकर कर्बला तक अरबईन और जनाज़े के सफ़र में हर जगह भारत की छाप के ऐतिहासिक प्रमाण उपस्थित हैं.
ईराक के नजफ़ शहर का भारत से क्या नाता है
मध्य-दक्षिणी इराक के नजफ़ शहर को मौला अली (अ.स.) के पवित्र रौज़े के कारण नजफ़ अल-अशरफ कहा जाता है. क़ुम के बाद ईरान के राजकीय प्रतिनिधित्व के साथ आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई(र.) जनाज़े को यहां ले जाया गया था. रौज़े पर जनाज़े की नमाज़ आयतुल्लाह मोहम्मद तकी अल-हकीम ने पढाई. छह किमी में जनाज़े के जुलूस में करीब 40 लाख लोग शामिल हुए. इसको कवर करने के लिए पूरी दुनिया के करीब तीन हजार पत्रकार, 2500 कैमरे और 23 सजीव प्रसारण करने वाले चैनल थे.

ईराक के नजफ स्थित इमाम अली की दरगाह में ले जाया जाता ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का जनाजा.
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40 हिजरी (661 ई०) में शियों के पहले इमाम मौला अली इबने अबी तालिब (अ.स.) को उनकी शहादत के बाद यहीं दफनाया गया था. दुखद ये है कि तथाकथित मुस्लिम हुक्मरानों के खतरे की वजह से 100 साल के बाद ये बात मुसलमानों को पता लगी. आज वहां पर मौला अली (अ.स.) का रौज़ा-ए-मुबारक है. शिया परंपरा में यह जगह नबियों की विश्रामस्थल रही है. इसके समीप स्थित वादी-अस-सलाम को विश्व का सबसे बड़ा कब्रिस्तान माना जाता है. इस कब्रिस्तान में हज़रत हुद (अ.स.) और हज़रत सालेह (अ.स.) जैसे नबियों से लेकर तमाम उलेमा की कब्र है. आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) के दादा सैयद हुसैन ख़ामेनेई भी इसी कब्रिस्तान में दफन हैं.
अवध के नवाब ने खुदवाई थी नजफ में नहर
जिस तरीके से मौला अली (अ.स.) को इल्म का दरवाज़ा कहा जाता है, उसी प्रकार उनका शहर नजफ़ भी इल्म या कहें कि ज्ञान परंपरा का एक बड़ा केंद्र है, जिसका एक बड़ा उदहारण नजफ़ का हौज़ा (शिक्षा केंद्र) है. 18वीं शताब्दी से यहां शिया उलेमा का आगमन और प्रवास चालू हो गया था. यहीं पर ईरान की स्थापना की दार्शनिक और फ़िक़ही (विधिक) नीव रखी गई थी. मौला अली (अ.स.) के दर पर ही इमाम खुमैनी ने अपने प्रवास के 13 साल (1965-1978) गुज़ारे और ईरानी क्रांति के साथ-साथ उसके बाद के ईरान की वैचारिक आधारशिला रखी. इसका प्रमाण उनके ईरानी व्यवस्था के मूल - विलायत-अल-फ़की (विधिवेत्ता का संरक्षण) पर दिए उनके व्याख्यानों से मिलता है.
इतिहासकार हुआन कोल ने 2002 में छपी अपनी किताब 'सेक्रेड स्पेस एंड होली वार्स: द पॉलिटिक्स, कल्चर एंड हिस्ट्री ऑफ़ शिया इस्लाम' (Sacred Space and Holy Wars: The Politics, Culture and History of Shi'ite Islam) में बताया है कि अवध की हुकुमत नें 1780 ई० के दशक में पांच लाख रुपये भेज कर 1793 ई० में फरात नदी से नजफ़ तक नहर का निर्माण संपन्न कराया. इससे तत्कालीन नजफ़ में पानी की किल्लत खत्म हुई.इसके बाद वो शहर फिर से आबाद हुआ. इस नहर को हिंदिया नहर या भारतीय नहर कहते हैं. अवध के नवाब ग़ाज़ीउद्दीन हैदर ने 1816 में लखनऊ के मशकगंज इलाके में गोमती नदी के तट पर मौला अली (अ.स.) के पवित्र रौज़े और मस्जिद के तर्ज़ पर 'शाह नजफ़ इमामबाड़ा' बनवाया गया. यह आज भी मौजूद है.
कर्बला और भारत के बीच क्या संबंध है
नजफ़ के बाद आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) के जनाज़े को कर्बला स्थित इमाम हुसैन (अ.स.) और हज़रत अब्बास (अ.स.) के पवित्र रौज़े पर ले जाया गया. यहां पर जनाज़े की नमाज़ आयतुल्लाह अब्दुल महदी अल-करबलाई ने पढाई. मध्य इराक में स्थित यह शहर आपने आप में एक पूरा अन्याय के प्रतिरोध का दर्शन समेटे हुए है. यहीं पर मौला अली (अ.स.) के बेटे और शियों के तीसरे इमाम, इमाम हुसैन (अ.स.) को 10 मुहर्रम, 61 हिजरी को उनके परिवार और साथियों के साथ शहीद किया गया था. इमाम हुसैन (अ.स.) ने वास्तविक इस्लामिक मूल्यों को बचाने के लिए तत्कालीन खलीफा यजीद इबने मुआविया का समर्थन करने से इनकार करते हुए शहादत स्वीकार की थी. इसे प्रतिरोध का सर्वोच्च आदर्श माना जाता है. इसी शहर में मौला इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके अलमदार (ध्वजवाहक) और भाई मौला हज़रत अब्बास (अ.स.) समेत कर्बला के शहीदों का रौज़ा है. यहीं पर प्रतिवर्ष विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम - अरबईन आयोजित होता है.

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सैयद अब्दुल रज्जाक अल मुक़र्रम की पुस्तक 'मकतल अल-हुसैन' के मुताबिक इमाम हुसैन (अ.स.) भारत आना चाहते थे. इसी बात को फखरुद्दीन अपनी किताब 'अल मुन्तख़ब'/ 'अल-फखरी'/ 'मजलिस अल-फखरिया' में कहते हैं. कर्बला के तुरंत बाद खलीफा के ज़ुल्म से बचने के लिए उनके खानदान की पांच महिलाएं लाहौर आईं. इनमे सबसे प्रमुख हज़रत अब्बास (अ.स.) की बहन हज़रत रुकय्या बिन्ते अली इबने अबी तालिब (स.) हैं. स्थानीय रिवायतों के अनुसार इनका पवित्र रौज़ा आज भी लाहौर में बीबी पाक दामन के नाम से मशहूर है.
कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स.) का साथ देने भारत से हुसैनी ब्राह्मणों के नेतृत्व में एक दल गया था. ये दल इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के बाद कर्बला पहुंचा.चूंकि ये हिन्द से गए थे, इसलिए ये जिस इलाके में रुके वो इलाका अल-हिंदिया कहलाया. बाद में अवध की रियासत द्वारा इसे एक शहर के रूप में विकसित किया गया. यह शहर अल हिंदिया कहलाया, जो आज भी मौजूद है. इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत का बड़े पैमाने पर ग़म तो भारत में मनाया जाता है. कर्बला का महत्व इतना है कि प्रतिवर्ष हमारे भारत में हर दस मुहर्रम को इमाम हुसैन (अ.स.) के रौज़े की प्रतिलिपि के रूप में ताज़िया और मौला अब्बास (अ.स.) का अलम निकाला जाता है. इसमें भारत के सभी क्षेत्र और समुदाय के लोग भाग लेते हैं.
भारत में भी है एक मशहद
आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) का जनाज़ा अंत में उनके जन्मस्थान मशहद स्थित इमाम रज़ा (अ.स.) के पवित्र रौज़े पर लाकर दफन किया गया. ऐसा अनुमान है कि करीब डेढ़ करोड़ लोग जनाज़े के जुलूस में शामिल हुए. यहां जनाज़े की नमाज़ 101 साल के सर्वोच्च आयतुल्लाह हुसैन नूरी हमदानी ने पढवाई.
उत्तर-पूर्वी ईरान के खोरासान प्रदेश की राजधानी संभवतः ईरान का सबसे प्रमुख शिया धार्मिक स्थल है. यहां पर शियों के आठवें इमाम, इमाम अली इबने मूसा रज़ा (अ.स.) का पवित्र रौज़ा है, जिन्हें 818 ई० में खलीफा मामून ने जहर देकर शहीद कर दिया था. इस वजह से इसका नाम मशहद अर्थात शहादत का स्थान पड़ा. किताब 'अल-इह्तिजाज' (खंड-2) के मुताबिक इमाम रज़ा (अ.स.) (766-818 ई०) ने न सिर्फ वाकिफी समेत इस्लाम के तमाम फिरके के लोगों को हराया अपितु खलीफा के दरबार में अंतरराष्ट्रीय बुद्धिजीवियों के बीच अपनी श्रेष्ठता भी साबित की. वो अपने पिता इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) की विरासत को आगे बढ़ाते हुए प्रतिकूल समय में अपने प्रतिनिधियों के नेटवर्क को मज़बूत किया और शिया समुदाय को नेतृत्व दिया.
वक्फ़ बोर्ड के अभिलेख, कब्र के पत्थर पर अंकित जानकारी और स्थानीय रिवायतों के अनुसार इमाम रज़ा (अ.स.) के वंशजों में से एक इमाम मशहद अली तत्कालीन खलीफा मामून के ज़ुल्म से बचने के लिए मशहद (ईरान) से भारतीय पंजाब के पटियाला शहर में आए थे. किताब 'अल-काफी' (खंड -1 पृष्ठ 497), किताब 'बिहार अल-अनवार' (खंड-5 पृष्ठ 114) किताब 'अल-इरशाद' (पृष्ठ 327) के मुताबिक उन्होंने अपनी मां और इमाम तकी (अ.स.) की पत्नी हज़रत समाना अल-मुनकरश अल-मगरिबी (स.) के नाम से समाना शहर बसाया, वहां पर उनका पवित्र रौज़ा आज भी मौजूद है. इस रौज़े का निर्माण रमजान के महीने 967 हिजरी (1559 ई०) में अकबर के दौर में अर्जुद्दीन खान बिन बख्शउल्ला खान द्वारा कराया गया था. पंजाब के इसी समाना शहर को मशहद-ए-हिन्द भी कहा जाता है. वहां सालाना मजलिसों में दूर दराज़ से ज़ायरीन पहुंचते हैं.
आम तौर पर शिया समुदाय को 'अहल-ए-तश्य्यु' (शियावाद को मानने वाले) कहा जाता है. पकिस्तानी सुन्नी क्षेत्रों में उपहास और तिरस्कार के तौर पर शियों को 'अहल-ए-तश्य्यु' की जगह 'अहल-ए-तशयी' कहा जाता है. तशयी का अर्थ है अंतिम यात्रा या जनाज़े का जुलूस. इस प्रकार अहल-ए-तशयी का अर्थ हुआ 'जनाज़े के जुलूस वाले लोग'. दरअसल संप्रदायवादी और विभाजनकारी पाकिस्तानी सोच से निकला ये जुमला शिया समुदाय की इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत का सार्वजनिक शोक मनाने की संस्कृति के साथ-साथ अज़ादारी, मातमदारी, मातमी जुलूस, ग़म का प्रतीक काले कपड़े इत्यादि के उपहास और तिरस्कार के लिए था. लेकिन मज़ाक उड़ाने वाले ये भूल गए कि शिया समुदाय की असाधारण संगठनात्मक क्षमता, उसकी वैचारिक निरंतरता और विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत अज़ादारी-ए-इमाम हुसैन (अ.स.) है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण अरबईन है. कर्बला से लेकर आज के ईरान तक हर कदम पर देखा जाए तो भारत की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. ईरानी क्रांति के संस्थापक इमाम खुमैनी (र.) के पूर्वज, खलीफा के ज़ुल्म से बच कर बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में आ बसे थे. आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई (र.) ने 1968 में भारत में आज़ादी की लड़ाई पर एक किताब लिखी. तेहरान में महात्मा गांधी के नाम पर अस्पताल का होना इसी निरंतरता का प्रतीक है. कर्बला की विरासत और उसको संजोने वाले ईरान का संबंध भारत से ऐतिहासिक के साथ-साथ विश्वास, संस्कृति और आध्यात्मिकता का भी है.
(डिस्क्लेमर: लेखक इस्लामिक इतिहास और धर्मशास्त्र के जानकार हैं. उन्होंने कंप्यूटर साइंस विषय से बीटेक भी किया है. वो उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के 22 गांव दोआबा स्थित बड़ा इमामबाड़ा के प्रमुख हैं. वो नक़ीब-अल-अशरफ़ है, जिसका अर्थ है कि वो सादात (हज़रत पैगंबर मुहम्मद साहब) के वंशजों के इतिहास, संस्कृति और परिवार का लेखा-जोखा रखते हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)