- पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष खत्म करने के लिए सार्थक वार्ता की मेजबानी का प्रस्ताव रखा है
- आतंकवाद को पनाह देने वाला पाकिस्तान चाहता है कि शांतिदूत के रूप में छवि बने
- शहबाज सरकार इस मध्यस्थता से घरेलू संघर्ष और तेल संकट के समाधान का दोहरा लाभ लेना चाहती है
अमेरिका और ईरान में पिछले 26 दिनों से जारी जंग को खत्म करवाने के लिए पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान आगे आया है और खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश किया है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मंगलवार को कहा कि संघर्ष को समाप्त करने के लिए 'सार्थक और निर्णायक वार्ता' की मेजबानी को लेकर उनका देश तैयार है. ट्रंप ने भी शहबाज के इस ट्वीट को शेयर करके हिंट दे दिया है कि पाकिस्तान की इस भूमिका के लिए अमेरिका तैयार है. सवाल है कि आखिर दो देशों की जंग में चौधरी बनकर पाकिस्तान को क्या मिलेगा?
आखिर पाकिस्तान ही क्यों?
जंग को खत्म करने के लिए किसी वार्ता की मेजबानी में पाकिस्तान की भूमिका अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ उसके बढ़ते संबंधों और पड़ोसी ईरान के इस्लामिक रिपब्लिक के साथ लंबे समय से चले आ रहे रिश्तों के कारण संभव मानी जा रही है. दोनों से रिश्ते होने के कारण पाकिस्तान को एक अपेक्षाकृत तटस्थ देश की छवि भी मिलती है. कतर जैसे खाड़ी देशों के विपरीत, पाकिस्तान में अमेरिकी सैन्य अड्डे नहीं हैं और वह खुद एक सैन्य शक्ति है. इससे ईरान को भी उसपर भरोसा होगा.

पाकिस्तान को क्या मिलेगा?
- रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार अगर पाकिस्तान की मध्यस्थता में ये वार्ता होती है, तो इससे पाकिस्तान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी. पाकिस्तान की इमेज दुनिया में एक ऐसे देश के रूप में है जो आतंकवाद को पालता और फैलाता है. अब वह खुद को शांतिदूत दिखाना चाहता है. इससे पहले 1972 में पाकिस्तान ने उस गुप्त कूटनीतिक पहल में मध्यस्थता की थी जिसके कारण अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की चीन यात्रा संभव हुई थी.
- ध्यान रहे कि ईरान के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी शिया मुस्लिम आबादी का घर है. 28 फरवरी को संघर्ष की शुरुआत में अमेरिका और इजरायल के हमलों में आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत के अगले दिन पाकिस्तान में देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे. विश्लेषकों और सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, ईरान में लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के पाकिस्तान तक फैल जाने का खतरा है और यही बात इस्लामाबाद में बैठी शहबाज सरकार की सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है.
- पाकिस्तान तो पहले ही अफगान तालिबान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है. उपर से ईरान युद्ध के कारण पाकिस्तान में तेल का संकट आ रखा है. पाकिस्तान के लिए एक तीर से दो निशाने वाला मौका है- खुद को शांतिदूत भी दिखा दे और जंग रुके तो तेल के दाम भी कम हो जाएं.
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार क्विन्सी इंस्टीट्यूट के मिडिल ईस्ट के डिप्टी डायरेक्टर एडम वाइनस्टीन ने कहा, “मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की विश्वसनीयता असामान्य है, क्योंकि वह वॉशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ काम करने लायक संबंध बनाए रखता है. साथ ही दोनों के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों का इतिहास उसे इतना दूरी भी देता है कि उसे एक भरोसेमंद मध्यस्थ माना जा सके.”
वहीं वॉशिंगटन स्थित मिडिल ईस्ट पॉलिसी काउंसिल के सीनियर फेलो कमरान बोखारी ने रॉयटर्स से कहा, “दशकों तक एक संकट में डूबे देश रहने के बाद पाकिस्तान अब पश्चिम एशिया में फिर से एक बड़े अमेरिकी सहयोगी के रूप में उभरता दिखाई दे रहा है.” बोखारी ने कहा कि पाकिस्तान ईरान का सबसे कम विरोधी पड़ोसी है, जबकि उसके सऊदी अरब के साथ सबसे करीबी संबंध हैं और वॉशिंगटन भी उस पर भरोसा करता है. इसलिए ईरान उसे अन्य मध्यस्थों की तुलना में अधिक तटस्थ मान सकता है.
ध्यान रहे कि पाकिस्तान दोनों देशों के बीच अपनी ऐतिहासिक मध्यस्थ की भूमिका का भी सहारा ले सकता है. 1979 में अमेरिका और ईरान के बीच राजनयिक संबंध टूटने के बाद से अमेरिका में तेहरान का वास्तविक राजनयिक मिशन वॉशिंगटन स्थित पाकिस्तान के दूतावास में ही संचालित होता रहा है.
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