- ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ युद्ध अभ्यास में बड़ी कटौती का एलान किया है.
- इस फैसले के केंद्र में ईरान के खिलाफ युद्ध में दक्षिण कोरिया का खुला समर्थन नहीं होना बताया जा रहा है.
- माना जा रहा है कि ट्रंप की नॉर्थ कोरियाई के साथ नीति में कूटनीति और सैन्य तैयारी के बीच संतुलन देखने को मिलेगा
ट्रंप ने दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिकी सैन्य अभ्यासों को काफी कम करने का आदेश दिया है. इसके पीछे उन्होंने दो बड़ी वजहें बताई हैं. पहली, उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन के साथ उनके अच्छे संबंध और दूसरी, ईरान के परमाणु निरस्त्रीकरण में दक्षिण कोरिया का अमेरिका का साथ न देना. लेकिन यह फैसला ऐसे समय हुआ है जब उत्तर कोरियाई सैनिक यूक्रेन युद्ध से नए युद्धक अनुभव हासिल कर रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप ने इस फैसले को सिर्फ सैन्य जरूरतों से नहीं जोड़ा. उन्होंने उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के साथ अपने 'बहुत अच्छे संबंधों' का हवाला दिया. साथ ही उन्होंने दक्षिण कोरिया के उस रुख पर भी नाराजगी जताई, जिसमें उसने ईरान के परमाणु निरस्त्रीकरण में अमेरिका के साथ शामिल होने से इनकार किया.
यानी इस फैसले के पीछे एक साथ तीन परतें दिखाई देती हैं. ईरान का मुद्दा, किम जोंग उन के साथ ट्रंप की कूटनीति और उत्तर कोरिया की तेजी से बदलती सैन्य क्षमता. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई सैन्य अधिकारी खुद मान रहे हैं कि उत्तर कोरिया यूक्रेन युद्ध से नए युद्धक अनुभव हासिल कर रहा है, तब सैन्य अभ्यास कम करने का फैसला आखिर क्या संदेश देता है?
कौन सा सैन्य अभ्यास कम किया जा रहा है?
जिस अभ्यास पर यह फैसला आया है उसका नाम उल्चि फ्रीडम शील्ड है. यह अमेरिका और दक्षिण कोरिया का प्रमुख वार्षिक संयुक्त सैन्य अभ्यास है.
दी गई जानकारियों के मुताबिक इस साल यह अभ्यास सोमवार से शुरू होकर 27 अगस्त तक चलने वाला था. इसमें करीब 18000 दक्षिण कोरियाई सैनिकों के साथ अमेरिकी सैनिक और संयुक्त राष्ट्र कमान से जुड़े 18 में से 11 देशों के सैनिक और कर्मचारी शामिल होने वाले थे.
यानी यह कोई छोटा सैन्य अभ्यास नहीं है. इसका उद्देश्य दक्षिण कोरिया और अमेरिका की संयुक्त सैन्य तैयारी को मजबूत करना और उत्तर कोरिया से संभावित खतरे के लिए तैयार रहना है.
दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्रालय ने कहा है कि संयुक्त सैन्य अभ्यास पहले से तय कार्यक्रम के मुताबिक आगे बढ़ेगा.
ऐसे में एक अहम सवाल ये पैदा होता है कि अगर अभ्यास शुरू होने वाला है और दक्षिण कोरिया इसे तय कार्यक्रम के अनुसार करने की बात कह रहा है, तो ट्रंप के आदेश का असर आखिर किस स्तर पर होगा?
ट्रंप ने कहा कि अभ्यास को रद्द करने में देर हो चुकी है, इसलिए उन्होंने अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ को इसे 'काफी कम' करने का आदेश दिया है.

डोनाल्ड ट्रंप
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ट्रंप ने कटौती की सबसे बड़ी वजह क्या बताई?
ट्रंप का सबसे महत्वपूर्ण तर्क किम जोंग उन के साथ उनके संबंध हैं.
उन्होंने कहा कि वह अमेरिकी भागीदारी से खुश नहीं हैं क्योंकि उनके किम के साथ 'बहुत अच्छे संबंध' हैं. उनका कहना था कि ये अभ्यास महंगे हैं और ऐसे देश को गलत और शत्रुतापूर्ण संकेत भेजते हैं जो उनके राष्ट्रपति बनने के बाद से शांतिपूर्ण और सम्मानजनक रहा है.
यहां ट्रंप की पुरानी उत्तर कोरिया नीति की झलक साफ दिखाई देती है.
ट्रंप पहले कार्यकाल में भी किम जोंग उन के साथ बातचीत के दौरान अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बड़े सैन्य अभ्यासों को रोक चुके हैं या कम कर चुके हैं.
2018 में किम के साथ पहली शिखर वार्ता के बाद उल्चि फ्रीडम शील्ड अभ्यास को रद्द किया गया था. इसके बाद भी कुछ अभ्यासों को रोकने या छोटे स्तर पर करने का फैसला हुआ था.
बाद में इन अभ्यासों को नए नाम और बदले हुए स्वरूप में दोबारा शुरू किया गया.
इसलिए इस बार का फैसला पूरी तरह नया नहीं है. फर्क यह है कि इस बार उत्तर कोरिया की सैन्य क्षमता को लेकर अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई अधिकारियों की चिंता पहले से ज्यादा स्पष्ट है.

दक्षिण कोरिया का कौन सा जवाब बना ट्रंप के भड़कने की वजह?
ब्रिटिश अंग्रेजी अखबार द गार्जियन के मुताबिक ट्रंप ने अपने बयान में दक्षिण कोरिया के ईरान संबंधी रुख का भी जिक्र किया.
उन्होंने कहा कि उन्होंने दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति से पूछा था कि क्या वह इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के परमाणु निरस्त्रीकरण में अमेरिका के साथ शामिल होना चाहेंगे. ट्रंप के मुताबिक दक्षिण कोरिया ने इसका जवाब 'नहीं, धन्यवाद' में दिया.
ट्रंप की नाराजगी का एक हिस्सा अमेरिकी सहयोगियों से उनकी अपेक्षाओं से जुड़ा दिखाई देता है. ब्रिटिश अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ के मुताबिक ट्रंप ने जापान, फ्रांस और ब्रिटेन समेत दूसरे सहयोगियों के संघर्ष में शामिल होने को लेकर भी नाराजगी जताई है.
इस लिहाज से दक्षिण कोरिया के साथ सैन्य अभ्यासों में कटौती को एक संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है कि अमेरिका अपने सहयोगियों से केवल क्षेत्रीय सुरक्षा में नहीं, बल्कि दूसरे अंतरराष्ट्रीय संघर्षों में भी अधिक सहयोग की उम्मीद कर रहा है.

फाइल फोटोः ड्रोन हमले की तस्वीर
ड्रोन और साइबर युद्ध क्यों महत्वपूर्ण हैं?
एक तरफ ट्रंप कह रहे हैं कि उत्तर कोरिया के साथ संबंध अच्छे हैं और सैन्य अभ्यास उसे शत्रुतापूर्ण संकेत भेजते हैं.
दूसरी तरफ अमेरिकी सैन्य अधिकारी खुद कह रहे हैं कि उत्तर कोरिया के सैनिकों को यूक्रेन युद्ध से आधुनिक युद्ध का वास्तविक अनुभव मिल रहा है.
पिछले सप्ताह अमेरिकी और दक्षिण कोरियाई सैन्य अधिकारियों ने कहा था कि इस बार के अभ्यास में यूक्रेन युद्ध से मिले सबक को शामिल किया जाएगा.
इनमें ड्रोन, जीपीएस में बाधा और साइबर हमलों जैसी क्षमताओं को शामिल किया गया है.
अमेरिकी सेना के प्रवक्ता कर्नल रयान डोनाल्ड ने कहा कि उत्तर कोरियाई सैनिक यूक्रेन में मिले अनुभव को वापस उत्तर कोरिया ले गए हैं और इससे उत्तर कोरिया की क्षमता बदल रही है.
यानी सैन्य अधिकारियों का आकलन यह है कि खतरा पुराना नहीं रहा. वह बदल रहा है.
यूक्रेन युद्ध से उत्तर कोरिया को क्या मिला?
उत्तर कोरिया ने अपनी सैन्य टुकड़ी को रूस के साथ और यूक्रेन के खिलाफ मदद की थी. 2024 के अंत से अब तक उत्तर कोरिया अपने 14 हजार से अधिक रूस के लिए कुर्स्क इलाके में लड़ चुके हैं. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी कहा कि रूस 30 अतिरिक्त उत्तर कोरियाई सैनिकों को प्राप्त करने की तैयारी कर रहा है.
अगर ये आंकड़े और आकलन सही दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो उत्तर कोरिया, रूस की मदद के जरिए आधुनिक युद्ध का वास्तविक अनुभव भी ले रहा है.
यहीं पर अमेरिकी सैन्य अधिकारियों की चिंता बढ़ती है.
आज युद्ध में टैंक, तोप, मिसाइलों और हवाई हमलों से अधिक निर्णायक भूमिका में ड्रोन, जीपीएस में बाधा डालना और साइबर हमले हो रहे हैं.
इसीलिए इस साल के अमेरिका-दक्षिण कोरिया अभ्यास में इन खतरों को शामिल किया जाना था.
अमेरिकी अधिकारी रयान डोनाल्ड के मुताबिक अभ्यास में उत्तर कोरियाई सैनिकों के यूक्रेन में हासिल अनुभव को ध्यान में रखा गया है.
इससे पता चलता है कि अमेरिका और दक्षिण कोरिया की सैन्य योजना में उत्तर कोरिया को सिर्फ पुराने मिसाइल और परमाणु खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा. उसके पास आधुनिक युद्ध तकनीकों का बढ़ता अनुभव भी माना जा रहा है.
उत्तर कोरिया का जवाब क्या है?
अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बीच अभ्यास शुरू होने से पहले उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया.
उत्तर कोरिया के विदेश मंत्रालय ने संयुक्त सैन्य अभ्यास को 'आक्रामक युद्ध की तैयारी' बताया और चेतावनी दी कि वह किसी नए स्तर के खतरे का जवाब नए स्तर की प्रतिरोधक क्षमता से देगा.
उत्तर कोरिया आमतौर पर अमेरिका और दक्षिण कोरिया के बड़े सैन्य अभ्यासों से पहले इसी तरह की चेतावनी देता रहा है.
दूसरी तरफ अमेरिका और दक्षिण कोरिया इन अभ्यासों को रक्षात्मक बताते हैं.
इसलिए यहां एक पुराना चक्र फिर दिखाई देता है.
अमेरिका-दक्षिण कोरिया अभ्यास करते हैं. उत्तर कोरिया इसे खतरा बताता है. उत्तर कोरिया मिसाइल परीक्षण करता है. अमेरिका और दक्षिण कोरिया अपनी सैन्य तैयारी बढ़ाते हैं. अब ट्रंप का अभ्यासों को कम करने का फैसला इस चक्र में एक नया राजनीतिक तत्व जोड़ रहा है.
तो क्या ट्रंप फिर किम जोंग उन से बातचीत की तरफ बढ़ रहे हैं?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ट्रंप ने हाल में फिर से किम जोंग उन के साथ अपने अच्छे संबंधों का जिक्र किया है.
शनिवार को ट्रंप ने ट्रूथ सोशल पर किम के साथ अपनी पुरानी तस्वीर भी साझा की और दोहराया कि दोनों के संबंध बहुत अच्छे हैं.
इससे यह अटकलें तेज हुईं कि ट्रंप उत्तर कोरिया के साथ एक और उच्चस्तरीय बैठक की कोशिश कर सकते हैं.
ट्रंप और किम के बीच पहले भी सीधी कूटनीति हो चुकी है.
ट्रंप 2019 में उत्तर कोरिया की जमीन पर कदम रखने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे.
हालांकि उस समय की कूटनीति परमाणु निरस्त्रीकरण पर किसी स्थायी समझौते तक नहीं पहुंच सकी.
इसके बाद उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने पर ज्यादा जोर दिया.
इसलिए इस बार अगर ट्रंप फिर से किम के साथ बातचीत की कोशिश करते हैं, तो सवाल यह होगा कि क्या सैन्य अभ्यास कम करने से बातचीत का रास्ता खुलेगा या इससे उत्तर कोरिया को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा?
दक्षिण कोरिया के लिए इसका क्या मतलब है?
दक्षिण कोरिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा और कूटनीति के बीच संतुलन की है.
एक तरफ उसे अमेरिका के साथ सैन्य साझेदारी बनाए रखनी है. दूसरी तरफ ट्रंप प्रशासन की बदलती प्राथमिकताओं को भी समझना होगा.
दक्षिण कोरिया का कहना है कि अभ्यास तय कार्यक्रम के मुताबिक जारी रहेगा.
लेकिन अगर अमेरिकी भागीदारी का स्तर लगातार कम होता है, तो भविष्य में यह सवाल उठ सकता है कि अमेरिका-दक्षिण कोरिया सैन्य गठबंधन का स्वरूप कितना बदल रहा है.
खासकर तब, जब उत्तर कोरिया रूस के साथ सैन्य संबंध मजबूत कर रहा है और उसके सैनिकों को यूक्रेन युद्ध का अनुभव मिल रहा है.

क्या सैन्य अभ्यास कम करना उत्तर कोरिया के लिए राहत है?
सीधे तौर पर ऐसा कहना जल्दबाजी होगी.
क्योंकि अभ्यास पूरी तरह रद्द नहीं किए गए हैं. ट्रंप ने भी कहा है कि इन्हें रद्द करने में देर हो चुकी है और उन्होंने इन्हें 'काफी कम' करने का आदेश दिया है.
दूसरी ओर दक्षिण कोरिया ने कहा है कि अभ्यास पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार होगा.
इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा बदलाव राजनीतिक संदेश का है.
ट्रंप यह संकेत दे रहे हैं कि वह किम जोंग उन के साथ अपने संबंधों को महत्व देते हैं और बड़े सैन्य अभ्यासों को उत्तर कोरिया के प्रति अनावश्यक रूप से शत्रुतापूर्ण संकेत मानते हैं.
लेकिन अमेरिकी सैन्य अधिकारी दूसरी तस्वीर सामने रख रहे हैं. उनके मुताबिक उत्तर कोरिया की सैन्य क्षमता बदल रही है और अभ्यासों को उसी हिसाब से विकसित करने की जरूरत है.

तो असली सवाल क्या हैः दोस्ती या सुरक्षा?
ट्रंप की सोच में किम जोंग उन के साथ व्यक्तिगत कूटनीतिक संबंध एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते दिखाई देते हैं. लेकिन सैन्य कमांडरों की चिंता यह है कि उत्तर कोरिया अब पहले वाला उत्तर कोरिया नहीं है.
वह रूस के साथ गहरे सैन्य संबंध बना चुका है. उसके सैनिकों को आधुनिक यूक्रेन युद्ध का अनुभव भी मिला है. ड्रोन, जीपीएस व्यावधान, साइबर युद्ध और बैलिस्टिक मिसाइलों जैसी क्षमताओं को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं. ऐसे में संयुक्त सैन्य अभ्यास कम करने का फैसला अमेरिका की उत्तर कोरिया नीति में संभावित बदलाव का संकेत भी हो सकता है.
अगर इसका अगला कदम किम जोंग उन के साथ बातचीत है, तो ट्रंप इसे तनाव कम करने की रणनीति के रूप में पेश कर सकते हैं. लेकिन अगर उत्तर कोरिया इस दौरान अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाता रहता है, तो अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सामने एक कठिन सवाल रहेगा.
क्या किम के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध वास्तव में उत्तर कोरिया के सैन्य खतरे को कम कर सकते हैं?
फिलहाल इसका जवाब स्पष्ट नहीं है. लेकिन ट्रंप का यह फैसला बताता है कि अमेरिका की उत्तर कोरिया नीति में एक बार फिर कूटनीति और सैन्य तैयारी के बीच संतुलन सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है.
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