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सऊदी अरब के 'जानी दुश्मन' क्यों बने हैं हूती, किस बात की मानते हैं इतनी रंजिश? सीधा रियाद पर अटैक

सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच जंग फिर तेज हो गई है. हूतियों ने रियाद और यानबू पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों से हमला किया है और लाल सागर के अहम रास्ते बाब-अल-मंदेब पर कंट्रोल बढ़ा लिया है.

सऊदी अरब के 'जानी दुश्मन' क्यों बने हैं हूती, किस बात की मानते हैं इतनी रंजिश? सीधा रियाद पर अटैक
18 सितंबर को हूती विद्रोहियों के समर्थकों ने सना में सऊदी अरब के खिलाफ प्रदर्शन किया. (Photo: AFP)
  • हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच तनातनी कई साल पुरानी है.
  • पिछले दिनों यह तनातनी युद्ध जैसे हालात में तब्दील हो गई.
  • हूतियों ने लाल सागर तट पर कब्जा तेज किया है, जिससे सऊदी के तेल निर्यात पर दबाव बढ़ा गया है.

सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच पिछले कुछ दिनों नई लड़ाई शुरू हुई है. हूतियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद और लाल सागर के तट पर स्थित प्रमुख औद्योगिक और ऊर्जा केंद्र यानबू को निशाना बनाते हुए बड़े पैमाने पर हमले किए हैं. इससे दोनों पक्षों के बीच टकराव और बढ़ गया है. हूती सैन्य प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि इन हमलों में 'बड़ी तादाद में बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों और ड्रोनों' का इस्तेमाल किया गया. हाल ही में हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के तट की ओर तेजी से हमला करके इलाके के एक और अहम समुद्री रास्ते पर कब्जा कर लिया. इससे ईरान के साथ अमेरिका और इजरायल के लंबे वक्त से चले आ रहे टकराव के पूर्व की ओर फैलने का खतरा पैदा हो गया है.

ईरान का समर्थन करने वाले इस गुट ने संकरी बाब-अल-मंदेब जलसंधि (स्ट्रेट) पर अपनी मजबूत स्थिति बनाकर दबाव का एक और मोर्चा खोल दिया है. इससे सऊदी अरब के तेल निर्यात पर और दबाव बढ़ेगा, क्योंकि होर्मुज जलसंधि से होने वाला निर्यात पहले ही दूसरी तरफ मोड़ा जा चुका है.

पिछले दिनों जमीन पर तेजी से कब्जा करने के साथ-साथ दक्षिणी सऊदी अरब में सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले भी किए गए हैं. इससे एक दशक से ज्यादा वक्त से चल रहे युद्ध के बाद ताकत का संतुलन बदल गया है.

इस हमले का मुख्य मकसद लाल सागर पर कंट्रोल हासिल करना है, जबकि ईरान का होर्मुज पर पहले से ही कब्जा है. इससे उन्हें तेल की कीमतें बढ़ाने और वॉशिंगटन के लिए संकट को सुलझाना मुश्किल बनाने में मदद मिलेगी.

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सऊदी अरब से क्यों लड़ रहे हूती विद्रोही?

  • हूती विद्रोही एक मिलिट्री, पॉलिटिकल और धार्मिक आंदोलन का हिस्सा हैं, जो उत्तर-पश्चिम यमन के ज्यादातर हिस्से पर राज करते हैं. इन्होंने लाल सागर में कार्गो जहाजों और टैंकरों पर हमले करके ग्लोबल ट्रेड और एनर्जी मार्केट में रुकावट पैदा की है.
  • इस ग्रुप ने 2011 के 'अरब स्प्रिंग' के दौरान मची अफरातफरी का फायदा उठाकर 2014 में यमन की राजधानी सना से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को हटा दिया, जिससे यमन में सिविल वॉर शुरू हो गया.
  • इस बात के डर से कि ईरान का समर्थन करने वाला यह ग्रुप 'बाब अल-मंदेब स्ट्रेट' (Bab el-Mandeb strait) पर कब्जा कर सकता है और रियाद की तेल निर्यात करने की क्षमता के लिए खतरा बन सकता है, सऊदी अरब ने एक साल बाद दखल दिया. इसमें सऊदी को अमेरिका, यूके, फ्रांस और अन्य देशों का समर्थन मिला.
  • इसके बाद साल 2022 में UN की मध्यस्थता से सीजफायर हुआ और तब से दोनों पक्ष तनाव बढ़ाने वाली बड़ी कार्रवाइ से परहेज करते आए हैं. ईरान ने यमन में सीधे तौर पर दखल नहीं दिया है, लेकिन इस लड़ाई को ईरान और सऊदी अरब के बीच बड़े 'प्रॉक्सी वॉर' का हिस्सा माना जाता है.
  • 2023 से 2025 के बीच गाजा में इजरायल के साथ युद्ध के दौरान, हूतियों ने ईरान के समर्थक हमास के समर्थन में लाल सागर में जहाजों पर हमले शुरू कर दिए. नेविगेशन की आजादी बहाल करने के अभियान के तहत UK और US ने 2025 में हूतियों के ठिकानों पर हमले किए.
  • अहम बात यह है कि पिछले साल ट्रंप ने लाल सागर में जहाजों पर हमले रोकने के बदले हूतियों पर US के हमले बंद करने का समझौता किया था. अब इस गुट से टकराने पर क्षेत्र में मौजूद US सेनाओं पर यमन से मिसाइल हमले होने का खतरा हो सकता है.
  • जुलाई में सऊदी अरब के साथ झड़पें फिर से शुरू हो गईं, क्योंकि दोनों पक्षों ने समुद्री आवाजाही पर नई नाकेबंदी लागू कर दी थी. हूतियों ने उन सऊदी तेल टैंकरों पर हमला किया, जिन पर उनकी नाकेबंदी का उल्लंघन करने का आरोप था.

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अभी क्या हो रहा है?

कई साल के संघर्ष और यमन की करीब 14 प्रतिशत आबादी के विस्थापित होने के बावजूद, पिछले दिनों हूतियों ने पूर्वी तट की ओर एक चौंकाने वाला अभियान चलाया, जिससे उन्हें लाल सागर से होने वाले ट्रैफिक पर काफी ज्यादा कंट्रोल मिल गया.

अरब प्रायद्वीप के एक तरफ ईरान का जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) पर कंट्रोल है और दूसरी तरफ उसके सहयोगी हूतियों का कब्जा है. इस युद्ध ने तेहरान को इलाके में और ज्यादा क्षेत्रीय प्रभाव दिला दिया है. अब खाड़ी देशों को यह मानना ​​पड़ रहा है कि उन्हें ईरान के साथ बातचीत करनी पड़ सकती है और सुरक्षा की गारंटी देने वाले के तौर पर वॉशिंगटन पर अपने भरोसे को छोड़ना पड़ सकता है.

इस युद्ध ने अमेरिका के सामने एक मुश्किल स्थिति भी पैदा कर दी है. या तो ईरान के साथ चल रहे उस युद्ध में दूसरे मोर्चे पर दखल दे और भारी संसाधन खर्च करे. या फिर बस तमाशबीन बना रहे और क्षेत्र में अपने एक और सहयोगी के साथ रिश्तों को कमजोर होने दे. सूत्रों ने CNN को बताया कि अमेरिका ने सऊदी अरब को सैन्य मदद के बजाय खुफिया जानकारी और टारगेट तय करने में मदद की पेशकश की है.

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ग्राउंड पर क्या बदला है?

हूती विद्रोहियों ने कहा है कि वे सऊदी अरब के अंदर तक एक बड़ा ऑपरेशन शुरू कर रहे हैं. इसके साथ ही, यमन में पश्चिम की ओर बढ़ते हुए वे एनर्जी से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और दक्षिणी शहरों पर हमले भी तेज कर रहे हैं.

अमेरिका-ईरान युद्ध की वजह से अरब प्रायद्वीप के दूसरी तरफ मौजूद जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के असल में बंद हो जाने के बाद, रियाद ने अपने कच्चे तेल का ज्यादातर हिस्सा लाल सागर के बंदरगाहों से भेजना शुरू कर दिया था.

क्षेत्रीय सूत्रों ने रॉयटर्स को बताया कि बढ़ती आर्थिक लागत और हूती विद्रोहियों पर हमला करने से ट्रंप के इनकार ने कुछ खाड़ी देशों में यह सोच मजबूत कर दी है कि तेहरान के साथ बातचीत अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि खुद को बचाने के लिए जरूरी हो गई है.

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