मुरैना (मितावली). ग्वालियर से करीब 40 किलोमीटर दूर, मुरैना जिले का यह छोटा सा गांव है मितावली. यहां दूर-दूर तक पसरे सन्नाटे और छोटे-छोटे पहाड़ों के बीच एक ऐसा राज दफ्न है, जिसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. स्थानीय लोग कहते हैं कि इस पहाड़ी पर सूरज ढलने के बाद जो रुक गया, वो शायद कभी लौटकर नहीं आया. यह है देश का सबसे रहस्यमयी ठिकाना मितावली के चौसठ योगिनी मंदिर. प्राचीन भारत में इसे कभी तंत्र-मंत्र की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी कहा जाता था. ऐसा भी माना जाता है कि भारत की पुरानी संसद भवन का डिजाइन भी मुरैना के इसी मंदिर से लुटियंस ने लिया था. क्योंकि दोनों के डिजाइन लगभग समान हैं.
इस मंदिर से जुड़े कुछ ऐसे रहस्यमयी पहलू हैं, जो आज भी वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए एक बड़ी पहेली बने हुए हैं. आइए जानते हैं इस अद्भुत मंदिर की वो अनकही दास्तान, जो आपको हैरत में डाल देगी.
100 फीट ऊंची पहाड़ी पर नंदी महाराज का कड़ा पहरा
इस रहस्यमयी सफर की शुरुआत मितावली गांव की एक शांत पहाड़ी से होती है. पहाड़ी की ऊंचाई करीब 100 फीट है, जहां तक पहुंचने के लिए पत्थरों को काटकर बनाई गई 108 कठिन सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं.

लेकिन चढ़ाई शुरू करने से पहले ही मुख्य द्वार पर करीब 5 फीट ऊंची नंदी महाराज की भव्य प्रतिमा आपका रास्ता रोक लेती है. आर्किटेक्चर का अद्भुत नमूना देखिए यह विशाल मूर्ति किसी जोड़-तोड़ से नहीं, बल्कि एक ही सिंगल पत्थर को तराश कर बनाई गई है. मानो शिव का यह वाहन सदियों से मंदिर की रखवाली कर रहा हो.
आखिर कहां गईं 64 देवियों की मूर्तियां?
सीढ़ियों का इम्तिहान पास कर जैसे ही आप ऊपर पहुंचेंगे, आंखों के सामने एक अद्भुत, गोल पहिये जैसा ढांचा दिखाई देगा. यह आम मंदिरों की तरह शिखर वाला नहीं है, बल्कि पूरी तरह से खुले आसमान के नीचे बना हुआ है.
मंदिर के चारों तरफ एक गोलाकार गलियारा है, जिसमें 64 छोटे-छोटे कमरे बने हैं. कच्छपघात राजवंश के राजा देवपाल द्वारा सन 1323 में बनवाए गए इस मंदिर के हर कमरे में कभी योगिनी (अलौकिक शक्तियों वाली देवियों) की मूर्तियां हुआ करती थीं. लेकिन आज स्थिति अलग है.
आज इन 64 कमरों में देवियों की जगह सिर्फ शिवलिंग स्थापित हैं. इतिहासकारों का मानना है कि चंबल के डाकुओं और अंतरराष्ट्रीय मूर्ति तस्करों की काली नजरों से बचाने के लिए सरकार ने मूल मूर्तियों को यहां से हटाकर सुरक्षित संग्रहालयों (म्यूजियम) में रखवा दिया था.

एक साथ दो शिवलिंगों का रहस्य
इस गोलाकार मंदिर के ठीक केंद्र (सेंटर) में मुख्य गर्भ गृह स्थित है. आमतौर पर किसी भी शिव मंदिर में एक गर्भ गृह के भीतर एक ही शिवलिंग होता है. लेकिन मितावली के इस मंदिर में एक बड़ा और एक छोटा शिवलिंग एक साथ स्थापित हैं.
तंत्र शास्त्र के जानकारों के अनुसार, यह कोई साधारण पूजा स्थल नहीं था. मुख्य गर्भ गृह ब्रह्मांडीय ऊर्जा को आकर्षित करने का केंद्र था. यहां दो शिवलिंगों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि प्राचीन समय में यहां विशेष तांत्रिक अनुष्ठान और गुप्त सिद्धियां की जाती थीं, जहां मुख्य यजमान के लिए विशेष अभिषेक की व्यवस्था होती थी.
वहीं, प्रसिद्ध इतिहासकारों और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मंदिर केवल तंत्र साधना का केंद्र नहीं था, बल्कि यह खगोल विज्ञान (Astronomy) की एक उन्नत प्रयोगशाला भी था.
मंदिर की छत न होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि प्राचीन साधक रात के समय तारों, नक्षत्रों और ग्रहों की चाल को सीधे देख सकें. माना जाता है कि 64 की संख्या केवल देवियों की नहीं, बल्कि साल के खास नक्षत्रों और चक्रों को दर्शाती है. सूर्य की देशांतर रेखाओं को ध्यान में रखकर ही इसके गोलाकार कमरों का निर्माण किया गया था.

इसी मंदिर की नकल है हमारा पुराना संसद भवन?
इस मंदिर का सबसे बड़ा और चर्चित विवाद इसके डिजाइन को लेकर है. यदि आप दिल्ली में स्थित भारत के पुराने संसद भवन की तस्वीर और इस मंदिर की तस्वीर को एक साथ देखेंगे, तो दोनों में कोई अंतर नजर नहीं आएगा.
दोनों का गोलाकार ढांचा, गलियारा और खंभों (Pillars) की कतार बिल्कुल एक जैसी है. हालांकि, ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडविन लुटियंस की किसी भी डायरी या सरकारी दस्तावेज में इस बात का आधिकारिक प्रमाण नहीं है कि उन्होंने इस मंदिर की नकल की थी. लेकिन दोनों की अविश्वसनीय समानता को देखकर यह साफ हो जाता है कि लुटियंस इस प्राचीन भारतीय वास्तुकला से गहरे प्रभावित थे.

रात ढलते ही वीरान हो जाता है ये मंदिर?
स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारियों की मानें तो इस मंदिर में सूर्यास्त के बाद रुकना सख्त मना है. लोक मान्यताओं के अनुसार, आज भी अमावस्या की रात को दूर-दूर से अघोरी, तांत्रिक और यहां तक कि विदेशी सैलानी भी यहां गुप्त तांत्रिक क्रियाएं करने आते हैं.
मंदिर के संकरे गलियारे और छोटे दरवाजे इस तरह बनाए गए हैं कि कोई भी कितना भी शक्तिशाली इंसान क्यों न हो, उसे गर्भगृह में नतमस्तक होकर ही प्रवेश करना पड़ता है.
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