- यमन के हूती विद्रोहियों की तरफ मक्का में कथित तौर पर ड्रोन हमला किया गया.
- सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच मक्का रक्षा समझौता होने के बावजूद पाकिस्तान ने सैन्य मदद से इनकार किया
- पाकिस्तान ने यमन में सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार किया और ईरान के साथ संबंधों को प्राथमिकता दी
यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच जारी जंग की लपटें अब इस्लाम के सबसे पाक शहर मक्का तक पहुंच गई हैं. मक्का में अचानक लगे इमरजेंसी अलर्ट और मंडराते हवाई हमले के खतरे ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है. हालांकि, सऊदी एयर डिफेंस ने समय रहते ड्रोन को हवा में ही ढेर कर दिया, लेकिन इस एक घटना ने मध्य पूर्व के सामरिक समीकरणों को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है.
इस संकट के समय तीन मुस्लिम देशों सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच बने नए-नवेले 'मक्का रक्षा समझौते' की कलई भी खुल गई है. जब सऊदी अरब को अपनी सरजमीं और संप्रभुता की रक्षा के लिए सैन्य मदद की दरकार थी, तब उसके सबसे करीबी सहयोगी पाकिस्तान ने कदम पीछे खींच लिए. स्थिति यह बन गई कि सऊदी अरब को अपनी सुरक्षा और हूती विद्रोहियों की सैन्य हरकतों पर पैनी नजर रखने के लिए अमेरिका के जरिए इजरायल की खुफिया एजेंसी से मदद मांगने पर मजबूर होना पड़ा.
क्या मक्का वास्तव में निशाने पर था?
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रवक्ता मेजर जनरल तुर्की अल-मलिकी के अनुसार, मंगलवार शाम को मक्का शहर के दक्षिण में एक संदिग्ध ड्रोन देखा गया था. इससे पहले कि वह पवित्र शहर के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र में दाखिल होता, सऊदी एयर डिफेंस ने उसे मार गिराया.
उन्होंने इसे एक सीधे तौर पर 'आतंकी हरकत' बताते हुए कहा कि दो पवित्र मस्जिदों (हरमैन शरीफैन) और तीर्थयात्रियों की सुरक्षा सऊदी अरब के लिए एक 'रेड लाइन' है. इसे पार करने की इजाजत किसी को नहीं दी जाएगी. इससे पहले जुलाई 2017 में भी मक्का की ओर एक बैलिस्टिक मिसाइल से हमला करने की कोशिश की गई थी.
दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है. हूती सैन्य प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल याह्या सारी ने टेलीग्राम पर बयान जारी कर सऊदी सरकार के दावों को 'झूठा और मनगढ़ंत' बताया है. उनका कहना है कि हूती विद्रोही कभी भी पवित्र इस्लामी स्थलों को निशाना नहीं बनाते. उनके हमले सिर्फ सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों और तेल संयंत्रों तक ही सीमित हैं, जो मक्का और अन्य पवित्र स्थलों से काफी दूर हैं.
याह्या सारी ने उल्टा सऊदी अरब पर आरोप लगाया कि उनके लड़ाकू विमानों ने यमन में 450 से ज्यादा हवाई हमले किए हैं और दावा किया कि हूती बलों ने मारिब में सऊदी का एक F-15 फाइटर जेट भी मार गिराया है.
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पाकिस्तान का दोहरा चरित्र
हाल ही में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच एक त्रिपक्षीय सैन्य समझौता हुआ था. इसके तहत किसी भी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाना था. लेकिन हूती खतरे के सामने आते ही पाकिस्तान ने इसे व्यावहारिक रूप से लागू करने से परहेज किया.
पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि यमन में हूती ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई का हिस्सा बनना फिलहाल एक काल्पनिक स्थिति है. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मीडिया से बातचीत में स्वीकार किया कि वह यह नहीं जानते कि रियाद ने मदद के लिए औपचारिक रूप से संपर्क किया है या नहीं, हालांकि उन्होंने कागजों पर बने समझौते के तहत प्रतिबद्धता की बात जरूर दोहराई.
पाकिस्तान के इस ठंडे रवैये के पीछे उसका अपना स्वार्थ है.
अव्वल तो उसे ईरान से दुश्मनी का डर है. पाकिस्तान की अपनी अर्थव्यवस्था पहले से ही बदहाल है. वह रेड सी और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आने वाले तेल और गैस पर निर्भर है. इस समुद्री रास्ते पर ईरान और हूती लड़ाकों का दबदबा है. पाकिस्तान, सऊदी के चक्कर में ईरान से सीधी दुश्मनी लेकर अपने ऊर्जा मार्ग को खतरे में नहीं डालना चाहता.
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया (X) पर मक्का पर हुए इस प्रयास की कड़े शब्दों में निंदा तो की और सऊदी फौजियों की तारीफ की, लेकिन किसी भी प्रकार की सीधी सैन्य मदद या जमीनी फोर्स भेजने की बात से पूरी तरह गोल कर गए.
इजरायल और सऊदी अरब का अजीब गठबंधन
पाकिस्तान के पीछे हटने के बाद सऊदी अरब को एक ऐसे सहयोगी की तलाश थी जिसके पास हूती विद्रोहियों की हर गतिविधि की सटीक खुफिया जानकारी हो. 'द यरूशलेम पोस्ट' की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड की मध्यस्थता में सऊदी अरब और इजरायल के अधिकारियों के बीच बातचीत हुई.
सऊदी अरब ने अब तक इजरायल के साथ 'अब्राहम अकॉर्ड्स' के तहत औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए हैं और उसका स्टैंड आज भी यही है कि जब तक फिलिस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा नहीं मिलता, तब तक सामान्य संबंध नहीं बन सकते. लेकिन अपनी सुरक्षा पर मंडराते खतरे को देखते हुए सऊदी ने इजरायल से हूती विद्रोहियों के सैन्य ठिकानों और भविष्य की योजनाओं की सटीक जानकारी हासिल करने में ही अपनी भलाई समझी.
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