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दुनिया का सबसे बड़ा 'चोकपॉइंट' है बाब अल-मंडेब: क्यों कहलाता है यह 'आंसुओं का दरवाजा'? भारत पर क्या असर पड़ेगा

यह रूट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार के लिए जीवन रेखा की तरह है. अगर यह बंद होता है तो भारत पर इसके बेहद गंभीर आर्थिक असर हो सकते हैं.

दुनिया का सबसे बड़ा 'चोकपॉइंट' है बाब अल-मंडेब: क्यों कहलाता है यह 'आंसुओं का दरवाजा'? भारत पर क्या असर पड़ेगा
भारत का यूरोप, मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के साथ होने वाला अधिकांश व्यापार बाब-अल-मंडेब से स्वेज नहर होकर गुजरता है.
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ईरान और अमेरिका ने होर्मुज पर नाकेबंदी कर पूरे दुनिया को अर्थव्यवस्था को झटका दिया है. अब भी कई देश इस झटके से उबर नहीं पाए हैं. इस बीच ईरान की ओर से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि वह लाल सागर में बाब अल-मंडेब पर भी हूती विद्रोहियों के सहारे नाकेबंदी करना चाहता है. लेकिन अगर ऐसा होगा तो इसके नुकसान की भरपाई करना काफी मुश्किल है. 

बाब अल-मंडेब को ग्लोबल ट्रेड का नस कहा जाता है. इसे आंसुओं का दरवाजा का भी कहते हैं.  लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रास्ते को 'आंसुओं का दरवाजा' क्यों कहा जाता है? और अगर यह रास्ता बंद हो गया, तो आपकी जेब पर इसका क्या सीधा असर पड़ने वाला है? 

क्यों कहलाता है यह 'आंसुओं का दरवाजा'

'बाब अल-मंडेब' एक अरबी नाम है, जिसका सीधा और दर्दनाक मतलब होता है'लॉन्मेंटेशन का गेट' यानी 'आंसुओं का दरवाजा'. इसे यह डरावना नाम मिलने के पीछे दो बड़ी वजहें हैं. प्राचीन काल में जब आज जैसी आधुनिक नावें और जीपीएस नहीं होते थे, तब इस रास्ते से गुजरना सीधे मौत को दावत देने जैसा था. यहां की समुद्री लहरें और चट्टानें इतनी खतरनाक हैं कि प्राचीन काल में ढेरों नाविक यहां डूबकर मर गए. अपनों को खोने वाले परिवारों के आंसुओं की वजह से इसका नाम यह पड़ा.

एक और अरबी मान्यता है कि सदियों पहले एक भयंकर भूकंप आया था. इस भूकंप के कारण ही एशिया और अफ्रीका महाद्वीप एक-दूसरे से अलग हो गए थे. इस तबाही में एक साथ लाखों लोग समुद्र में समा गए थे. उस सामूहिक शोक और आंसुओं की याद में इसे 'आंसुओं का दरवाजा' कहा जाने लगा.
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भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा?

आम इंसान को लग सकता है कि हजारों किलोमीटर दूर किसी समुद्री रास्ते के बंद होने से भारत को क्या फर्क पड़ेगा? लेकिन सच यह है कि यह रूट भारत के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा की लाइफलाइन है. अगर बाब अल-मंडेब का रास्ता ब्लॉक होता है, तो भारत को तीन बड़े मोर्चों पर नुकसान हो सकता है. 

भारत का जितना भी व्यापार यूरोप, मिडिल ईस्ट और उत्तरी अफ्रीका के देशों के साथ होता है, उसका अधिकांश हिस्सा इसी रास्ते से होकर स्वेज नहर पहुंचता है. अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो जहाजों को पूरा अफ्रीका महाद्वीप घूमकर 'केप ऑफ गुड होप' के रास्ते जाना पड़ेगा. इसका मतलब है कि जो सफर कुछ दिनों में तय होता था, उसमें 10 से 14 दिनों की देरी हो जाएगी. समय पर माल न पहुंचने से भारतीय कंपनियों को भारी घाटा होगा.

इसके अलावा जब जहाज लंबा रास्ता तय करेंगे, तो जाहिर है कि ईंधन ज्यादा खर्च होगा. इसके अलावा, युद्ध के खतरे वाले जोन से गुजरने के कारण जहाजों का इंश्योरेंस प्रीमियम कई गुना बढ़ जाएगा. जब मालभाड़ा बढ़ेगा, तो भारतीय निर्यातकों का सामान विदेशी बाजारों में महंगा हो जाएगा. इससे भारतीय सामान की मांग घटेगी और देश में महंगाई भी बढ़ सकती है.

एक और वजह है कि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल और एलएनजी विदेशों से आयात करता है. इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी बाब अल-मंडेब के रास्ते भारत आता है. अगर यहां रुकावट आई, तो देश में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस की किल्लत हो सकती है. सप्लाई चेन टूटने से देश में ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं, जिससे हर आम और खास चीज महंगी हो जाएगी.
बाब अल मंडेब में हूती विद्रोही ने 2023 में हमला किया था. इसके बाद भी कई बार जहाजों पर हमले हुए

बाब अल मंडेब में हूती विद्रोही ने 2023 में हमला किया था. इसके बाद भी कई बार जहाजों पर हमले हुए

क्या वाकई हूती विद्रोही इस रास्ते को रोक सकते हैं?

इस सवाल का सीधा जवाब है हां, उनके पास ऐसा करने की पूरी ताकत है. इसके पीछे की वजह इस रास्ते की भूगोल है.

यह जलमार्ग बेहद संकरा है. अपने सबसे पतले बिंदु पर इसकी चौड़ाई सिर्फ 30 किलोमीटर है. यमन की लंबी तटरेखा पर हूती विद्रोहियों का मजबूत कब्जा है. इसके अलावा, उन्हें ईरान से घातक मिसाइलें, आधुनिक ड्रोन और समुद्र में बिछाई जाने वाली बारूदी सुरंगें मिल रही हैं. इस वजह से वे यहां से गुजरने वाले किसी भी जहाज को आसानी से निशाना बना सकते हैं.

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