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शिकारी पक्षियों और गिद्धों की संख्या क्यों घट रही है? रिपोर्ट में बताया गया

अध्ययन में कहा गया कि यह गिरावट विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि अध्ययन क्षेत्र शिकारी पक्षियों की महत्वपूर्ण आबादी के लिए जाना जाता है. शोधकर्ताओं ने उन प्रजातियों के लिए तत्काल संरक्षण उपायों की आवश्यकता बताई, जिनकी संख्या 50 प्रतिशत से अधिक घटी है.

शिकारी पक्षियों और गिद्धों की संख्या क्यों घट रही है? रिपोर्ट में बताया गया
गिद्धों की घटती संख्या पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है.
  • शिकारी पक्षी और गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र में मरे हुए जीवों को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं
  • शिकारी पक्षियों को बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होती है, और वे कीटनाशकों, बिजली तार आदि से अधिक प्रभावित होते हैं
  • अफ्रीका में कई शिकारी पक्षियों की आबादी में गिरावट आई है, लेकिन वहां प्रभावी निगरानी कार्यक्रमों का अभाव है

शिकारी पक्षी और गिद्ध पारिस्थितिकी तंत्र (Eco System) में मरे हुए जीवों को खाने वाले महत्वपूर्ण पक्षियों के रूप में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन पक्षियों की अन्य प्रजातियों की तुलना में इनकी आबादी तेजी से घट रही है. एक हालिया अध्ययन में यह बात सामने आई है. अध्ययन के अनुसार, शिकारी पक्षियों को रहने के लिए बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है, उनकी आबादी का घनत्व कम होता है और वे धीरे-धीरे प्रजनन करते हैं. इसी कारण वे कीटनाशकों के इस्तेमाल वाली खेती, बिजली के तारों से करंट लगने, पवन चक्कियों से टकराव और अवैध शिकार जैसे मानवीय प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं.

क्यों घट रही आबादी?

शोधकर्ताओं ने कहा कि कई बार वैज्ञानिकों और संरक्षणवादियों को जब तक इनकी आबादी में गिरावट की गंभीरता का पूरी तरह पता चलता है, तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है. इसलिए आबादी की प्रभावी निगरानी को ‘प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली' के रूप में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. अध्ययन में कहा गया है कि ‘ग्लोबल साउथ' के कई देशों में शिकारी पक्षियों की महत्वपूर्ण आबादी मौजूद है, लेकिन वहां प्रभावी निगरानी कार्यक्रमों का अभाव है. अफ्रीका शिकारी पक्षियों की विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण महाद्वीप है और वहां कई अध्ययनों में सड़क मार्गों पर पक्षियों की गणना कर उनकी आबादी में बदलाव का आकलन किया गया है.

दक्षिण अफ्रीका के आंकड़ों का विश्लेषण

हालिया अध्ययन में अफ्रीका के विभिन्न सर्वेक्षणों के रुझानों को एक साथ जोड़कर महाद्वीप स्तर पर स्थिति को समझने का प्रयास किया गया. हालांकि, इसमें दक्षिण अफ्रीका के आंकड़े शामिल नहीं थे. इसके बाद शोधकर्ताओं ने ‘एंडेंजर्ड वाइल्डलाइफ ट्रस्ट' के ‘बर्ड्स ऑफ प्रे प्रोग्राम' से जुड़ी फील्डवर्कर रोनेल विसागी द्वारा 2009 से 2025 के बीच दक्षिण अफ्रीका के मध्य क्षेत्र में एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया. इस दौरान उन्होंने लगभग चार लाख किलोमीटर की यात्रा के दौरान दिखाई देने वाले सभी शिकारी और बड़े पक्षियों की गणना की.

बीते करीब 16 वर्षों में एकत्र आंकड़ों के आधार पर शोधकर्ताओं ने 18 शिकारी पक्षियों और आठ अन्य बड़े पक्षियों की आबादी के रुझानों का अध्ययन किया. निष्कर्षों में पाया गया कि 26 में से 13 प्रजातियों (50 प्रतिशत) की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई, जबकि केवल तीन प्रजातियों (12 प्रतिशत) में वृद्धि दर्ज की गई. बाकी 10 प्रजातियों में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं देखा गया.

अध्ययन में कहा गया कि यह गिरावट विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि अध्ययन क्षेत्र शिकारी पक्षियों की महत्वपूर्ण आबादी के लिए जाना जाता है. शोधकर्ताओं ने उन प्रजातियों के लिए तत्काल संरक्षण उपायों की आवश्यकता बताई, जिनकी संख्या 50 प्रतिशत से अधिक घटी है. अध्ययन के अनुसार, पिछले 16 वर्षों में आंकी गई 42 प्रतिशत प्रजातियों की आबादी आधे से अधिक घट गई. इनमें प्रवासी प्रजातियां ‘लेसर केस्ट्रेल', ‘अमूर फाल्कन' और ‘स्टेपी बजर्ड' प्रमुख हैं. शोधकर्ताओं ने कहा कि उत्तरी गोलार्ध में इनके प्रजनन क्षेत्रों में किए गए अन्य अध्ययनों में भी ऐसी ही गिरावट दर्ज की गई है.

कौन से पक्षियों की आबादी घटी

अध्ययन में ‘जैकल बजर्ड', ‘वेरॉक्स ईगल' और ‘सेक्रेटरीबर्ड' जैसे स्थानीय शिकारी पक्षियों की आबादी में भी 50 प्रतिशत से अधिक गिरावट पाई गई. हालांकि, ‘व्हाइट-नेक्ड रैवेन', ‘ग्रेटर केस्ट्रेल' और ‘व्हाइट-बैक्ड वल्चर' की आबादी में वृद्धि दर्ज की गई. इनमें ‘व्हाइट-बैक्ड वल्चर' को अत्यंत संकटग्रस्त प्रजाति माना जाता है, लेकिन अध्ययन क्षेत्र में इसकी संख्या बढ़ती दिखी. शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की तुलना ‘सदर्न अफ्रीकन बर्ड एटलस प्रोजेक्ट' (एसएबीएपी2) के आंकड़ों से भी की, लेकिन दोनों तरीकों के केवल लगभग आधे परिणाम ही एक-दूसरे से मेल खाते पाए गए. अध्ययन में कहा गया कि अफ्रीका में शिकारी पक्षियों की गिरती आबादी को अक्सर मानव जनसंख्या वृद्धि, कृषि विस्तार और जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जाता है. हालांकि, अध्ययन क्षेत्र में हाल के वर्षों में भूमि उपयोग या जनसंख्या घनत्व में बड़े बदलाव नहीं हुए हैं, लेकिन दीर्घकालिक या सूक्ष्म मानवीय प्रभाव इन परिवर्तनों के पीछे हो सकते हैं.

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