धन सिंह पोटाई नक्सलवाद से पीड़ित हैं. नई शांति प्रक्रिया के तहत हम लोग 2022 में माओवाद की राजधानी माने जाने वाले अबूझमाड़ से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर तक पदयात्रा निकाल रहे थे. उस दौरान नारायणपुर के पुलिस प्रमुख कार्यालय के बाहर मेरी मुलाकात धन सिंह से हुई थी. वो कुछ नक्सल पीड़ित महिलाओं की जिनका नाम पीड़ितों की सूची में नहीं था, उनका नाम जुड़वाने का प्रयास कर रहे थे.
धन सिंह पड़ोसी उत्तर बस्तर (कांकेर) जिले के निवासी हैं. नक्सलियों की वजह से वो 2016 में अपना गांव छोड़कर नारायणपुर में रहने लगे थे, क्योंकि उनका गांव अर्रा उनके जिला मुख्यालय कांकेर की बजाय पड़ोसी जिला मुख्यालय नारायणपुर के अधिक करीब है. नारायणपुर में उन दिनों नक्सल पीड़ितों की बड़ी बस्ती बन गई थी, जहां सैकड़ों परिवार रहते थे. उनमें से एक में धन सिंह ने भी अपने लिए एक घर बनाया था. धन सिंह रोजी-रोटी के लिए चाय की एक दुकान चलाते थे. उनका घर हम लोगों का अड्डा बन गया था. वहां मैंने काफी समय बिताया. धन सिंह जी का काफी समय अन्य नक्सल पीड़ितों की मदद में जाता था. वे हमारे साथ शांति पदयात्रा में रायपुर तक आए थे.
चर्च में प्रार्थना के लिए जाते आदिवासी
जब मैं उनके घर रहता था तो मैंने देखा कि दोनों पति-पत्नी रविवार की सुबह गायब हो जाते थे. मैंने उनके घर पर यीशु मसीह की फोटो भी देखी थी, पर कभी उस पर चर्चा नहीं हुई.
सरकार ने कहा है कि 31 मार्च 2026 को माओवादी की समस्या खत्म हो गई. इसके बाद मैंने धन सिंह को फोन किया. वे काफी खुश थे कि दस साल बाद वे अपने गांव वापस जा सकेंगे. पर पिछले हफ्ते जब मैंने उनको यह पूछने के लिए कि फोन किया कि गांव में जीवन कैसा है, बारिश कैसी हो रही, खेती में क्या प्रगति है तो उन्होंने बताया कि गांव के लोगों ने उनके खेत की फेंसिंग तोड़ दी है और जानवर उनके खेत को नुकसान पहुंचा रहे हैं.
गांव से निकाले गए ईसाई आदिवासी
जब मैंने उनसे पूछा कि क्या गांव वाले नहीं चाहते कि आप वापस गांव आएं? इस सवाल पर उन्होंने बताया नहीं वे कह रहे हैं कि हम ईसाई प्रार्थना घर में जाना बंद कर दें. उन्होंने बताया करीब 100 घरों वाले अर्रा गांव में उनके परिवार के अलावा ईसाई धर्म मानने वाले दो और परिवार ईसाई धर्म से जुड़े हैं. गांव में सूददु मंडावी और सियाराम सियाराम हुपेंडी का परिवार भी ईसाई धर्म से जुड़े थे. ये दोनों परिवार भी गांव से पलायन कर गए थे. उनके गांव के बाकी लोग आदिवासी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं. धन सिंह ने बताया कि हम गांव के सभी रीति-रिवाजों में शामिल होना चाहते हैं. लेकिन गांव वाले हमें प्रार्थना सभा में जाने से मना कर रहे हैं.
उन्होंने बताया 15 किमी दूर आमाबेड़ा में जिस चर्च में वे जाते हैं, वहां पिछले साल तोड़फोड़ की गई थी. स्थानीय ईसाई परिवारों पर ईसाई धर्म छोड़कर अपने मूल धर्म में वापस आने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. धन सिंह ने अपने गांव के बारे में और बताना शुरू किया. उन्होंने बताया कि उनके गांव के पूर्व सरपंच रमेश मंडावी अभी भी जेल में हैं, उनकी पत्नी अभी सरपंच हैं. साल 2016 में संतू हुपेनडी नाम के एक ग्रामीण ने नक्सलियों से 10 लोगों की शिकायत की थी. उसने इन लोगों पर पुलिस की मुखबिरी करने का आरोप लगाया था. उस सूची में धन सिंह और रमेश मंडावी दोनों का नाम था.
नक्सलियों की हिंसा के पीड़ित
इसके बाद धन सिंह गांव छोड़कर चले गए. लेकिन रमेश मंडावी ने नक्सलियों से दोस्ती गांठ ली. वे सड़क के ठेकेदार भी बन गए थे. पिछले साल पुलिस ने नक्सलियों की मदद के लिए उनको पकड़ने की कोशिश की तो उन्होंने पड़ोस की तहसील आमाबेड़ा में नक्सलियों की मदद से इसके खिलाफ रैली निकाली. लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. वे मूलवासी बचाओ मंच में भी सक्रिय थे. वो अन्य जगहों पर सड़क बनाने का विरोध करते थे. धन सिंह का कहना था कि रमेश बीजेपी से भी जुड़े थे. लेकिन गिरफ्तारी के बाद बीजेपी ने उनसे दूरी बना ली. रमेश मंडावी के जेल जाने के बाद गांव के अन्य नेताओं ने ईसाई विरोध का कार्यक्रम अपने हाथ में ले लिया.
धन सिंह ने बताया कि नक्सलियों ने उनके गांव में 2005 में रामलाल वटटी और 2011 में बैजू कोरराम की हत्या कर दी थी. दोनों पूर्व नक्सली थे. लेकिन नक्सलवाद छोड़ने के बाज वो नक्सली के नाम से लोगों से पैसों की उगाही कर रहे थे. धन सिंह के भागने के बाद 2017 में सूददु मंडावी और सियाराम हुपेंडी के परिवार को भी गांव से ईसाई होने की वजह से भगा दिया गया था. वे लोग अब भी नारायणपुर में रहते हैं.
क्यों आदिवासी ईसाई नहीं आ पा रहे हैं अपने गांव
मैंने धन सिंह से पूछा आप ईसाई क्यों बने? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा ''मैं 2006 में बहुत बीमार पड़ा था और प्रभु यीशु ने मुझे बचाया. तब से मैं प्रार्थना सभा में जाता हूं.'' इस पर मैंने कहा, ''हां मैंने देखा था आप नारायणपुर में भी चर्च जाते थे.''
धन सिंह के पास 16 एकड़ जमीन का पट्टा है. ऐसे में कानूनी रूप से उन्हें अपनी जमीन पर खेती करने से तो कोई रोक नहीं सकता है. धन सिंह ने कहा अब नारायणपुर के मकान की फिर से मरम्मत करवा रहा हूं. नक्सली तो चले गए पर पता नहीं गांव में रह पाऊंगा की नहीं.
उनके पंचायत से छह लोग नक्सलियों के साथ जुड़े थे. इनमें से दो को नक्सलियों ने लौटने के बाद मार दिया था. बाकी के चार लोग आंदोलन खत्म होने के बाद गांव वापस आ गए हैं. नक्सलियों ने धन सिंह के खिलाफ गलत शिकायत करने वाले संतू हुपेनडी को भी बाद में मार दिया था, जब उन्हें यह पता चला कि वह शिकायत गलत थी. उन्होंने अमृत दर्रो नाम के एक व्यक्ति को भी मुखबिर होने के शक में मार दिया था.
ये सब परिवार भी पिछले कई सालों से नारायणपुर में रह रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे अब वापस अपने गांव लौट रहे हैं. लेकिन क्या ईसाई धन सिंह अपने गांव वापस लौट पाएंगे.
(डिस्क्लेमर: लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो लोकतांत्रिक मीडिया के प्रयोग सीजीनेट स्वर और छत्तीसगढ़ में नई शांति प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं. इस लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)