कभी सोचा है कि जो विमान आंधी-तूफान और बारिश में भी उड़ान भर लेता है, वही विमान 'राख' में उड़ान क्यों नहीं भर पाता? सवाल इसलिए क्योंकि इंडोनेशिया में दो दिन से कोई विमान नहीं उड़ा. रविवार को यहां एक ज्वालामुखी फटा, जिसके बाद राख निकलने के कारण एयरपोर्ट बंद हो गए, उड़ानें रद्द हो गईं और लाखों यात्रियों को अपनी यात्रा छोड़नी पड़े.
हुआ ये कि रविवार को इंडोनेशिया में अनाक क्राकाटोआ ज्वालामुखी रविवार को अचानक फट गया. रविवार तड़के 3 बजकर 53 मिनट पर ज्वालामुखी करीब 30 सेकंड तक फटा.
ज्वालामुखी फटने का बाद राख के दो गुबार निकले. पहला गुबार 20,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचा. इससे जकार्ता, बैंटन, पश्चिमी जावा और आसपास के इलाके प्रभावित हुए. इसके बाद दूसरा गुबार 50,000 फीट की ऊंचाई तक पहुंचा. इससे बैंटन, लामपुंग और बेंगकुलु के कुछ हिस्सों और हिंद महासागर के भी कुछ हिस्से चपेट में आए.
फिर क्या हुआ?
अनाक क्राकाटोआ, इंडोनेशिया के दो द्वीपों- जावा और सुमात्रा के बीच सुंडा स्ट्रेट में स्थित है. इसके नाम का मतलब है- क्राकाटोआ की संतान. क्राकाटोआ वह ज्वालामुखी था, जिसमें 1883 में इतना जबरदस्त विस्फोट हुआ था कि पूरी दुनिया का तापमान गिरने लगा था. इसके फटने से निकला गुबार 80 किलोमीटर ऊंचाई तक फैल गया था.
अनाक क्राकाटोआ भी ऐसा ही ज्वालामुखी है. इंडोनेशिया की जियोलॉजिकल एजेंसी के मुताबिक, दो दिन में इस ज्वालामुखी में रुक-रुक कर 4 बार धमाके हुए.
ज्वालामुखी के बाद निकली राख के कारण रविवार और सोमवार को एयरपोर्ट्स बंद रहने से 2,961 उड़ानें रद्द हुईं, जिनमें 622 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें थीं. इस कारण करीब 3.41 लाख यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा.
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लेकिन ऐसा क्यों?
सवाल उठता है कि जब विमान आंधी-तूफान और बारिश में भी उड़ सकता है तो फिर राख में क्यों नहीं उड़ पाता? तो इसका जवाब है कि ज्वालामुखी फटने के बाद जो राख निकलती है वह कोई आम राख नहीं होती. वह राख इतनी खतरनाक होती है कि विमान का इंजन तक खराब कर सकती है.
ज्वालामुखी की राख के कण बहुत खुरदुरे होते हैं. इनसे विमान की विंडस्क्रीन हमेशा के लिए खराब हो सकती हैं और उन्हें धुंधला भी कर सकते हैं. ये ठीक वैसा ही होगा, जैसे किसी ने विंडस्क्रीन पर सैंडपेपर रगड़ दिया हो.
ज्वालामुखी की राख बाहरी सेंसर को जाम या खराब भी कर सकती है, जिससे गलत रीडिंग मिल सकती है, और यह हवाई जहाज के वेंटिलेशन सिस्टम में भी घुस सकती है. इससे केबिन की हवा की क्वालिटी पर असर पड़ सकता है और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है.
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लेकिन सबसे बड़ी समस्या तो ये है
असल में मुख्य समस्या यह है कि ज्वालामुखी की राख का इंजन पर क्या असर पड़ता है? ज्वालामुखी से निकलने वाली राख में बहुत ज्यादा सिलिका होता है, जो कांच के बारीक टुकड़ों जैसा होता है.
अब होता यह है कि राख इंजन के अंदर जा सकती है और इंजन के अंदर का तापमान लगभग 1400 से 1700 डिग्री सेल्सियस होता है. ऐसे में जैसे ही यह सिलिका वाले कण अंदर आएंगे, वे पिघलकर कांच बन जाएंगे.
इसके बाद जैसे ही यह पिघला हुआ कांच आगे टरबाइन ब्लेड्स और नोजल पर पहुंचता है, वहां ठंडा होकर जम जाएगा. इससे हवा का फ्लो रुक सकता है और उड़ान के बीच में ही इंजन बंद हो जाएगा.

साल 1982 में ब्रिटिश एयरवेज का एक विमान इंडोनेशिया के ऊपर से उड़ रहा था और तभी वह ज्वालामुखी से निकली राख के संपर्क में आ गया. इससे उसके चारों इंजन बंद हो गए थे. अच्छी बात यह रही कि पायलट इंजन को दोबारा चालू करने में कामयाब रहा. हालांकि, पायलट विंडस्क्रीन से कुछ देख नहीं पा रहे थे. फिर भी किसी तरह फ्लाइट की सेफ लैंडिंग हो गई.
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ज्वालामुखी फटने के बाद निकलता गुबार.
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कब उड़ना है, कब नहीं? कैसे होता है तय
ज्वालामुखी फटने के बाद उड़ान को रद्द करना है या नहीं? इसका फैसला हर एयरलाइन का ऑपरेशनल स्टाफ करता है. हर एयरलाइन की ऑपरेशनल टीम हालात पर नजर रखती है और रिस्क असेसमेंट के आधार पर फैसला लेती है.
अलग-अलग एयरलाइंस रिस्क मैनेजमेंट को थोड़े अलग-अलग तरीकों से संभाल सकती हैं. हो सकता है कि कुछ एयरलाइंस दूसरों की तुलना में पहले ही उड़ानें रद्द कर दें.
ज्यादातर मामलों में राख के गुबार के आधार पर फैसला लिया जाता है. यानी राख का बादल कितना बड़ा है और किस तरफ जा रहा है. इस बात का भी ध्यान रखा जाता है कि हवा की रफ्तार और दिशा बदलती रहती है. जैसे-जैसे ऊंचाई पर हवा तेज होती है, वैसे-वैसे राख काफी दूर तक फैल सकती है.
ज्वालामुखी फटने के बाद उड़ानें फिर से शुरू करने के लिए इस बात का ध्यान रखा जाता है कि राख का गुबार साफ हुआ या नहीं और ज्वालामुखी के दोबारा फटने की संभावना है या नहीं? लेकिन इन सबसे ऊपर यात्रियों की सुरक्षा मायने रखती है.
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