- ईरान में अंतरिम नेतृत्व परिषद ने कमान संभाली, स्थायी सुप्रीम लीडर का चुनाव जल्द ही.
- 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स करेगी अंतिम फैसला.
- ईरान की राजनीति के इस मोड़ पर पूरा पश्चिम एशिया टकटकी लगाए बैठा है.
ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दूसरी बार देश में सुप्रीम लीडर का ट्रांसफर ऑफ पावर हो रहा है. ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कतर के मीडिया नेटवर्क को दिए इंटरव्यू में कहा कि नया सुप्रीम लीडर जल्द ही चुना जा सकता है. फिलहाल तेहरान ने एक अंतरिम नेतृत्व परिषद की घोषणा की है, जो तब तक देश की कमान संभालेगी जब तक स्थायी सुप्रीम लीडर का चुनाव नहीं हो जाता. संविधान के मुताबिक तीन सदस्यीय इस अंतरिम परिषद में राष्ट्रपति, न्यायपालिका प्रमुख और वरिष्ठ धर्मगुरु शामिल हैं. जब तक स्थायी सुप्रीम लीडर का चुनाव नहीं हो जाता ये तीनों मिलकर देश चलाते हैं.
ईरान में सुप्रीम लीडर को चुनने का अधिकार 88 सदस्यों वाली संवैधानिक संस्था के पास है. यही संस्था सुप्रीम लीडर का चुनाव और उसकी निगरानी भी करती है. हालांकि प्रक्रिया साफ है, लेकिन पूरी तरह पारदर्शी नहीं मानी जाती. आम तौर पर यह माना जाता है कि असेंबली किसी कट्टरपंथी धार्मिक विचारधारा वाले नेता को चुन सकती है. लेकिन पूर्व सीआईए डायरेक्टर और अमेरिकी जनरल डेविड पेट्रायस का कहना है कि सत्ता के अंदर कुछ व्यावहारिक, गंभीर और यथार्थवादी चेहरे भी हैं. उन्होंने कहा, “ऑपरेशन इंटेलिजेंस के लिहाज से असाधारण था, लेकिन आगे क्या होगा यह कोई नहीं जानता.”
क्या सेना का भी होगा असर?
जानकारों का मानना है कि इस बार ईरान की शक्तिशाली सेना इस्लामिक रिवोल्यूशन गार्ड की भूमिका बेहद अहम होगी. रिवोल्यूशनरी गार्ड्स का मुख्य काम इस्लामिक रिपब्लिक की सुरक्षा और उसके अस्तित्व की रक्षा करना है. इस समय ईरान बाहरी और अंदरूनी दोनों तरह के दबाव में है. ऐसे में यह देखना अहम होगा कि असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स किसी एक व्यक्ति को चुनती है या फिर एक लीडरशिप काउंसिल मॉडल अपनाया जाता है.
क्या 88 बुजुर्ग धर्मगुरु मिल पाएंगे?
यह भी एक अहम सवाल है क्योंकि ईरान इस वक्त हमलों के साये में है. ऐसे में 88 वरिष्ठ धर्मगुरुओं का एक जगह इकट्ठा होना जोखिम भरा माना जा रहा है.
क्या होगा आगे?
क्या नया नेता कट्टरपंथी होगा या व्यावहारिक? क्या सेना का दबदबा बढ़ेगा? क्या सत्ता परिवर्तन से अमेरिका-ईरान तनाव और बढ़ेगा? ईरान की राजनीति के इस मोड़ पर पूरा पश्चिम एशिया टकटकी लगाए बैठा है.
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