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चांद की महक कैसी है? Moon पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने जो बताया आपको चौंका देगा

The Moon Smells: 1969 से 1972 के अंत तक नासा के छह अपोलो मिशनों में कुल 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर कदम रखा. इन सबने चांद की महक को लेकर एक सी बातें बताई हैं.

चांद की महक कैसी है? Moon पर उतरने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने जो बताया आपको चौंका देगा
The Moon Smells: चांद की सतह की भी अपनी एक खास महक है

जब हम इंसान चांद को दूर से देखते हैं तो वह एकदम अलग, शांत और सूनी सी दुनिया लगता है. दूर का चंदा मामा, जहां बड़े-बड़े गड्ढे है. लेकिन अगर कोई आपसे पूछे कि चांद की सतह से कैसी गंध आती है, तो क्या आप इसका जवाब नहीं दे पाएंगे. आज हम आपको बताएंगे और इस सवाल का जवाब आपके पास आ जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि चांद पर कदम रखने वाले अंतरिक्ष यात्रियों ने वहां की मिट्टी की एक अलग गंध महसूस की थी. उनका अनुभव इतना अजीब था कि इसे सुनकर आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि क्या सचमुच ऐसा महकता है अपना चांद?

चांद पर उतरने वाले अंतरिक्षयात्रियों ने क्या बताया?

हिस्ट्री डॉट कॉम की रिपोर्ट के अनुसार 1969 में गए अपोलो 11 मिशन के दौरान अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि चांद की सतह कैसी होगी. वैज्ञानिकों को डर था कि लैंडर के पैर कहीं किसी चांद की नरम जमीन में धंस न जाएं. लेकिन जब पहली बार नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज एल्ड्रिन चांद पर उतरे, तो सतह ठोस निकली. वैसे चांद की सतह से जुड़ा असली हैरान करने वाला अनुभव कुछ और था.

चांद की मिट्टी बेहद बारीक और चिपकने वाली होती है. इसे स्पेससूट से आसानी से हटाना मुश्किल था. इसलिए जब आर्मस्ट्रॉन्ग और एल्ड्रिन वापस लूनर मॉड्यूल में पहुंचे, तो उनके सूट पर चिपकी चांद की मिट्टी भी उनके साथ अंदर आ गई. लूनर मॉड्यूल में हवा का दबाव सामान्य होने के बाद अंतरिक्ष यात्रियों ने उस मिट्टी की गंध महसूस की. उन्होंने इसकी तुलना गीली राख या पटाखे फोड़ने के बाद हवा में जैसी गंध होती है, वैसी ही जलने की गंध से की.

इसी तरह अपोलो 17 मिशन के अंतरिक्ष यात्री हैरिसन "जैक" श्मिट ने भी चांद की मिट्टी की गंध के बारे में बताया. 2014 में स्पेस डॉट कॉम से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि चांद पर चलने वाले सभी अंतरिक्ष यात्रियों की तुरंत यही राय थी कि ताजा चांद की मिट्टी चली हुई बारूद जैसी महकती है. श्मिट ने यह भी कहा कि यह गंध धातु जैसी या बहुत तेज जलन वाली नहीं थी. उन्हें यह खास तौर पर इस्तेमाल हो चुके बारूद जैसी लगी.

लेकिन इस पूरी कहानी का एक और रहस्यमयी हिस्सा अभी बाकी था.

धरती पर नहीं आया गंध

हिस्ट्री डॉट कॉम की रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक इस गंध की धरती पर ठीक से जांच नहीं कर पाए. चांद से लाई गई मिट्टी और चट्टानों के नमूने सीलबंद डिब्बों में रखकर धरती पर लाए गए थे. लेकिन जब इन डिब्बों को धरती पर खोलकर जांच की गई, तब तक वह गंध गायब हो चुकी थी. यानी अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद पर जिस गंध को महसूस किया था, वह गंध धरती तक नहीं पहुंची. मून मिशन पर फेमस किताब One Giant Leap लिखने वाले लेखक चार्ल्स फिशमैन ने इस बात को बेहद दिलचस्प तरीके से बताया कि चांद की गंध चांद पर ही रह गई.

बता दें कि 1969 से 1972 के अंत तक नासा के छह अपोलो मिशनों में कुल 12 अंतरिक्ष यात्रियों ने चांद की सतह पर कदम रखा.

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