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चांद पर गिरी '6 मंजिला इमारत' जैसी आफत, अगर धरती से टकराता यह विशाल पत्थर, तो मच जाती भारी तबाही

चांद पर मिला 730 फीट चौड़ा रहस्यमयी गड्ढा, NASA बोला- ऐसी टक्कर सदी में एक बार होती है

चांद पर गिरी '6 मंजिला इमारत' जैसी आफत, अगर धरती से टकराता यह विशाल पत्थर, तो मच जाती भारी तबाही
चांद पर मिला विशाल गड्ढा
NASA

NASA के वैज्ञानिकों को चांद पर एक ऐसा विशाल गड्ढा (क्रेटर) मिला है, जो बेहद दुर्लभ माना जा रहा है. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इतनी बड़ी टक्कर से बनने वाला गड्ढा चांद पर 'सदी में एक बार या उससे भी लंबे समय में' बनता है. इस नए गड्ढे का नाम मैकगेचिन रखा गया है और इसकी चौड़ाई करीब 222 मीटर यानी 730 फीट है. माना जा रहा है कि यह गड्ढा 2024 में किसी धूमकेतु या एस्टेरॉयड के चांद से टकराने के बाद बना था. जिस अंतरिक्ष चट्टान ने यह गड्ढा बनाया, उसका आकार तीन से छह मंजिला इमारत जितना बताया जा रहा है. इस टक्कर से चांद की सतह पर करीब 728 फीट चौड़ा और 141 फीट गहरा गड्ढा बन गया.

डेटा चेक के दौरान हुई बड़ी खोज

यह खोज NASA के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) मिशन के दौरान हुई. दरअसल, वैज्ञानिक रॉबर्ट वैगनर चांद के मैप की जांच कर रहे थे. इसी दौरान उनकी नजर एक बड़े चमकीले धब्बे पर पड़ी, जिसके चारों ओर गहरा घेरा दिखाई दे रहा था. इससे संकेत मिला कि उस इलाके में हाल ही में कोई बड़ा बदलाव हुआ है.

पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करने पर वैज्ञानिकों को पता चला कि यह सौरमंडल में अब तक खोजा गया सबसे बड़ा नया क्रेटर है. इस खोज की जानकारी साइंस एडवांसेज जर्नल में छापी गई है.

बांयी ओर वाली तस्वीर 2025 की है, जिसमें बड़ा गड्ढा दिख रहा है. दाईं ओर वाली 2011 की, जिसमें क्रेटर नहीं दिख रहा.

बांयी ओर वाली तस्वीर 2025 की है, जिसमें बड़ा गड्ढा दिख रहा है. दाईं ओर वाली 2011 की, जिसमें क्रेटर नहीं दिख रहा.
Photo Credit: NASA

कब बना इतना बड़ा गड्ढा?

वैज्ञानिकों के मुताबिक यह गड्ढा 11 अप्रैल और 22 मई 2024 के बीच चांद के पूर्वी हिस्से में बना. टक्कर इतनी शक्तिशाली थी कि सिर्फ गड्ढा ही नहीं बना, बल्कि आसपास का बड़ा इलाका भी प्रभावित हुआ. टक्कर के बाद निकला मलबा कई किलोमीटर तक फैल गया और सतह की बनावट बदल गई.

चांद पर टक्करें क्यों होती हैं?

पृथ्वी के विपरीत चांद के पास कोई वायुमंडल नहीं है. इसलिए अंतरिक्ष से आने वाले पत्थर और मलबे को रोकने या जलाने वाला कोई प्राकृतिक कवच नहीं होता. नतीजतन एस्टेरॉयड और अन्य वस्तुएं सीधे उसकी सतह से टकरा जाती हैं.

NASA का LRO मिशन 2009 से चांद की स्टडी कर रहा है. इस दौरान वैज्ञानिक 1000 से ज्यादा नए क्रेटर और 1 लाख से ज्यादा सतही बदलावों की पहचान कर चुके हैं. हालांकि मैकगेचिन जैसा बड़ा गड्ढा बेहद दुर्लभ है.

अगर यह आफत धरती पर गिरती... तो क्या होता?

अगर छह मंजिला इमारत जितना बड़ा यह पत्थर हमारी पृथ्वी की तरफ रुख करता, तो नजारा बेहद खौफनाक होता. जैसे ही यह एस्टेरॉयड हमारी धरती के वायुमंडल में प्रवेश करता, हवा के फ्रिक्शन और प्रेशर के कारण इसमें भयानक आग लग जाती. यह आसमान में एक तैरते हुए धधकते हुए पहाड़ जैसा दिखता. वहीं पृथ्वी की ग्रैविटी इसे तेजी से सतह की ओर खींचती जिससे इसकी रफ्तार और ज्यादा बढ़ जाती.  पृथ्वी का वायुमंडल इसके कुछ हिस्से को हवा में ही जलाकर राख कर देता, लेकिन इसका मुख्य और भारी हिस्सा सीधे जमीन से टकराता. यह टक्कर किसी बड़े परमाणु धमाके से कम नहीं होती.

अगर यह एस्टेरॉयड दिल्ली, मुंबई या न्यूयॉर्क जैसे किसी घने बसे शहर पर गिरता, तो चंद सेकंड के भीतर कई किलोमीटर का इलाका मलबे के ढेर में बदल जाता.

यह एनिमेटेड इमेज सेट चंद्रमा के पूर्वी हिस्से के एक इलाके को दिखाता है, जहां 11 अप्रैल और 22 मई 2024 के बीच मैकगेचिन क्रेटर बना था.

यह एनिमेटेड इमेज सेट चंद्रमा के पूर्वी हिस्से के एक इलाके को दिखाता है, जहां 11 अप्रैल और 22 मई 2024 के बीच मैकगेचिन क्रेटर बना था.
Photo Credit: NASA

वैज्ञानिकों को मिला एक और बड़ा सुराग

गड्ढे की खोज के बाद वैज्ञानिकों ने LRO के थर्मल इंस्ट्रूमेंट 'डिवाइनर' की मदद से उस इलाके का अध्ययन किया. उन्हें क्रेटर के आसपास करीब 4 मील चौड़ा एक ऐसा क्षेत्र मिला, जो आसपास की सतह की तुलना में रात के समय लगभग 16 डिग्री फारेनहाइट ज्यादा ठंडा रहता है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि टक्कर के कारण वहां की मिट्टी ज्यादा भुरभुरी हो गई, जिससे वह गर्मी को पहले की तरह रोक नहीं पा रही है. इस खोज से यह भी पता चला कि बड़ी टक्करों का असर सिर्फ क्रेटर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास के बड़े इलाके की संरचना भी बदल जाती है.

मैकगेचिन क्रेटर का क्लोजअप व्यू

मैकगेचिन क्रेटर का क्लोजअप व्यू
Photo Credit: NASA

भविष्य के मून मिशनों के लिए अहम

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तरह के नए क्रेटरों का अध्ययन चांद की भू-संरचना को समझने में मदद करेगा. साथ ही भविष्य में इंसानों और रोबोटिक मिशनों को चांद पर भेजने की तैयारी भी बेहतर हो सकेगी. 

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