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चर्चिल, जॉर्ज बुश से इंदिरा तक एक ही कहानी - WAR हीरो, चुनाव ZERO; ट्रंप-नेतन्याहू का क्या होगा?

दो विश्व युद्ध और उसके बाद की दुनिया के युद्ध नतीजों और चुनाव नतीजों का हाल देख ट्रंप-नेतन्याहू को संभल जाना चाहिए.

चर्चिल, जॉर्ज बुश से इंदिरा तक एक ही कहानी - WAR हीरो,  चुनाव ZERO;  ट्रंप-नेतन्याहू का क्या होगा?
  • युद्ध जीतने वाले नेता हमेशा चुनाव में नहीं जीतते हैं. दुनिया में विंस्‍टन चर्चिल से लेकर ऐसे कई उदाहरण हैं.
  • माना जा रहा है कि ट्रंप और नेतन्याहू इस युद्ध का इस्तेमाल आगामी चुनाव में अपने प्रचार के लिए कर सकते हैं.
  • अमेरिका में मिडटर्म चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की जीत ट्रंप की राजनीतिक मजबूती के लिए जरूरी मानी जा रही है.

नाम पढ़कर आपको कुछ अंदाजा तो लग ही गया होगा कि आखिर हमारी कहानी क्या है? कहानी सीधी सी है कि जो नेता युद्ध जीतते हैं क्या वो चुनाव भी जीत पाते हैं ? दुनिया में विचारकों का एक वर्ग ऐसा है जो कहता कि नेता सत्ता के लिए देश को युद्ध में झोंक देते हैं. ईरान-इजरायल और अमेरिका के युद्ध में भी ये दावा किया जा रहा है. ट्रंप और नेतन्याहू इस युद्ध का इस्तेमाल आगामी चुनाव में अपने प्रचार के लिए करेंगे. अमेरिका में नवंबर 2026 में मध्यावधि चुनाव हैं. इजरायल में अक्टूबर महीने में आम संसदीय चुनाव हैं.

अब सवाल ये उठता है कि क्या चुनाव जीतने के लिए कोई नेता अपने देश को भीषण खतरे में डाल सकता है? क्या नेता अपनी राजनीति को चमकाने के लिए युद्ध करने से भी नहीं हिचकते हैं?

राजनीति बिना खून खराबे का युद्ध है और युद्ध खून खराबे वाली राजनीति.

माओत्‍से तुंग

चीनी विचारक

तो क्या दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि इतिहास में ऐसे शासक जो सत्ता के लिए युद्ध का जोखिम टाल नहीं पाते उनके सामने चुनावी हार जीत के खाने में क्या लिखा रहता है? क्या युद्ध जीतने वालों को जनता चुनाव में विजयी बनाती है? जो नेता युद्ध के नायक होते हैं क्या वो इलेक्शन में विजयी हो पाते हैं? दो विश्व युद्ध और उसके बाद की दुनिया में हमने इस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश की है और नतीजे चौंकाने वाले हैं. 

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विंस्टन चर्चिल युद्ध जीते, चुनाव हार गए

एक तरफ हिटलर, मुसोलिनी और जापान थे. दूसरी ओर ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, रूस और चीन थे. दोनों ही तरफ छोटे मोटे बहुत से देश थे. जर्मनी का हिटलर पूरे यूरोप पर कब्जा कर चुका था. 1940 खत्म होते होते जर्मनी के आगे फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड्स ने घुटने टेक दिए. अब ब्रिटेन की बारी थी. जर्मनी की ब्लित्जक्रिग प्रहार शैली के आगे सब पत्तों की तरह बिखर रहे थे. जर्मनी ब्रिटेन पर जमीनी हमला करना चाहता था. इसके लिए उसे ब्रिटेन की वायुसेना को खत्म करना था. जर्मनी ने ब्रिटेन पर बम गिराए. पूरा शहर बंकर में आ गया. लेकिन शेल्टर होम में रह कर भी ब्रिटेन के लोग काम पर जाते रहे. शहर एक्टिव बना रहा. इसके लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को श्रेय दिया जाता है- जिनका नाम था विंस्टन चर्चिल. चर्चिल ने अपने देशवासियों का आत्मबल नहीं टूटने दिया. उन्होंने लगातार कहा कि  "हम कभी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे". यूनाइटेड किंगडम "सागर के किनारों पर युद्ध लडेगा".

विंस्टन चर्चिल के नेतृत्व और ग्रेट ब्रिटेन की जनता के धैर्य ने ऐसा कॉम्बिनेशन बनाया कि जर्मनी के हिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी. इसमें जर्मनी का रूस से युद्ध और ब्रिटेन के लिए अमेरिका की मदद ने भी निर्णायक भूमिका निभाई.

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Photo Credit: X.Com/@Gentleman_Ways

“युद्ध में सत्य को झूठ की पहरेदारी में रहना चाहिए"

विंस्टन चर्चिल ने ब्रिटेन की विजय के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया. तरह तरह की रणनीति बनाई. युद्ध इतिहास की किताबों में लिखा है कि विंस्टन चर्चिल ने दुश्मनों को गुमराह करने के लिए झूठ और अफवाहों को बनाने और फैलाने में खूब भूमिका निभाई. वो कहते थे कि "युद्ध में सत्य को झूठ की पहरेदारी में रहना चाहिए". पूरे युद्ध में ब्रिटेन के साथ चर्चिल और ब्रिटेन चर्चिल के साथ खड़ा रहा. 7 मई को जर्मनी ने समर्पण कर दिया. यूरोप युद्ध से आजाद हो गया. 8 मई को विजय दिवस माना गया. 5 जुलाई 1945 ब्रिटेन में आम चुनावों के लिए मतदान हुए. 26 जुलाई, 1945 को चुनाव के रिजल्ट आए. वॉर हीरो विंस्टन चर्चिल चुनाव हार गए. वॉर हीरो, इलेक्‍शन जीरो. युद्ध में जो जनता समर्थन में खड़ी रही. हर बात सुनती रही उसने तुरंत बाद हुए चुनाव में चर्चिल को देश चलाने के लायक नहीं माना.

इजरायल-अमेरिका में चुनाव और ईरान युद्ध

विंस्टन चर्चिल अकेले ऐसे वॉर हीरो नहीं हैं. जो वॉर जीते लेकिन चुनाव हार गए.देश में ऐसे कई बड़े नेता हैं. जिनके बारे में हम आपको विस्तार से बताएंगे. वॉर हीरो, इलेक्‍शन जीरो की इस लिस्ट पर आगे बढ़ें, उससे पहल आपको ईरान-इजरायल और अमेरिका के युद्ध में इस समीकरण के बारे में कुछ बता देते हैं. जिससे आपको ये समझने में मदद  मिलेगी कि क्या सच में चुनावी हार-जीत के लिए चुनाव का इस्तेमाल किया जाता है. या फिर ये सब बस एक घटनाक्रम है, जिसमें युद्ध की विजय और चुनाव की पराजय आगे पीछे खड़े हैं. असल में इनके बीच कोई रिश्ता नहीं है.

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इलेक्शन का डर युद्ध का डबल इंजन

डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका के राष्ट्रपति. बेंजामिन नेतन्याहू, इजरायल के प्रधानमंत्री इन दोनो के बीच में दो कॉमन शब्द हैं, वो हैं युद्ध और इलेक्शन. ट्रंप और नेतन्याहू ईरान में युद्ध लड़ रहे हैं. लेकिन इन दोनों को अपने अपने देश में चुनाव भी लड़ना है. ट्रंप जहां विदेशी मोर्चे पर ईरान पर डील का दबाव बना रहे हैं. वहीं घरेलू मोर्चे पर उनके ऊपर वोटर्स की डील की दबाव है. नेतन्याहू ईरान और हिजबुल्‍लाह से युद्ध लड़ रहे हैं. लेकिन घर में चुनाव हैं. इसलिए दोनों ही अपने-अपने वोटर्स के सामने एक विजेता की तरह जाना चाहते हैं. शायद यही वजह है कि इतिहास में पहली बार इजरायल लेबनान के साथ अमेरिका में वार्ता कर रहा है और ट्रंप, ईरान पर जल्द से जल्द बड़ी डील का दबाव बना रहे हैं.

ईरान का युद्ध और अमेरिका के मिडटर्म चुनाव

डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को नवंबर 2026 में मिडटर्म चुनाव का सामना करना है. चुनाव में हार का मतलब कमजोर ट्रंप. चुनाव में जीत का मतलब मजबूत ट्रंप. अमेरिका में राष्ट्रपति चार साल के लिए चुना जाता है. दो साल बाद मिडटर्म चुनाव होते हैं. अमेरिका में इस चनाव को राष्ट्रपति की नीतियों और फैसलों पर जनमत संग्रह की मान्यता है.

मिडटर्म चुनाव में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव्‍स के सभी 435 सदस्यों का चुनाव होता है. बहुमत के लिए 218 का आंकड़ा जरूरी है. सीनेट में 100 सीट हैं. लगभग एक तिहाई सीनेटर्स का चुनाव होता है. सीनेटर का कार्यकाल 6 वर्ष होता है. सीनेट में बहुमत का मैजिक नंबर 51 है. इसके अलावा मिडटर्म में अलग अलग राज्यों में राज्य स्तर के चुनाव. कई राज्यों में गवर्नर, राज्य विधानसभाओं, मेयर या शेरिफ के चुनाव भी होते हैं. इसमें राष्ट्रपति का चुनाव नहीं होता है क्योंकि उसे चार साल के लिए चुना जाता है.


युद्ध विजय से जरूरी है मिडटर्म इलेक्शन विजय वर्ना...

मिडटर्म चुनाव में ट्रंप को बहुमत की व्यवस्था करनी पड़ेगी  क्योंकि अगर उनकी पार्टी बहुमत से दूर रहती है तो फिर उन्हें टैरिफ, इमिग्रेशन, ट्रेड और वॉर पर नीतियों के डिफेंड करना मुश्किल होगा. ट्रंप के फैसलों की जांच के लिए कमेटी का गठन हो सकता है. सुनवाई शुरू हो सकती है. बजट और नीतियों को ब्लॉक किया जा सकता है. संघीय खर्च और बजट पर कांग्रेस कठोर शर्ते लगा सकती है. असहमति या गतिरोध की स्थिति में गवर्नमेंट शटडाउन की आशंका रहती है. ट्रंप पर राजनीतिक और कानूनी दबाव बढ़ सकता है. महाभियोग की राजनीति हो सकती है.

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युद्ध में कैद है नेतन्याहू की किस्मत?

इजरायल में नेतन्याहू को अक्टूबर 2026 मे आम चुनाव का सामना करना है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि नेतन्याहू के लिए चुनावी जीत बहुत जरूरी है. क्योंकि उनके खिलाफ तीन प्रमुख आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. फैसला खिलाफ गया तो नेतन्याहू का राजनीतिक करियर खत्म भी हो सकता है.

  • नेतन्याहू पर पहला मुकदमा है- केस 1000- इसे गिफ्ट केस कहा जाता है. महंगे तोहफों के बदले राजनीतिक मदद का आरोप है.
  • नेतन्याहू पर दूसरा मुकदमा है- केस 2000- इसे मीडिया डील केस कहा जाता है. अपने पक्ष में कवरेज के लिए कानून में बदलाव का आरोप है.
  • नेतन्याहू पर तीसरा मुकदमा है- केस 4000-  इसे बीजेक केस कहा जाता है. पक्ष में मीडिया करवरेज के लिए टेलिकम्यूनिकेशन कंपनी को फायदा देने का आरोप.

किसी भी मामले में सजा हुई तो नेतन्याहू के चुनाव लड़ने पर पाबंदी लग सकती है. ऐसे में इजरायल के पीएम के पास पास दो रास्ते होंगे पहला जेल. दूसरा जेल से बचने के लिए खुद ही राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दें.

युद्ध के नतीजों में कैद है ट्रंप और नेतन्याहू का करियर

दुनिया भर के विचारक और एक्सपर्ट लगातार ये बात कह रहे हैं कि अब ईरान युद्ध जहां पहुंच गया है वहां से आगे दो ही रास्ते हैं, पहला अगर बात नहीं बनी तो भीषण विनाश और दूसरा सहमति बनी तो दुनिया के डिप्लोमैटिक नक्शे में बदलाव. एक तीसरी बात भी है और वो ये कि ईरान की मिसाइल क्षमता को विकलांग कर दिया जाए और परमाणु बम विकास का विनाश कर दिया जाए. लेकिन इस सबसे आगे एक चौथी बात है और वो है अमेरिका की मसल पॉवर का भव्य प्रदर्शन. अमेरिका की संहार, प्रहार क्षमता का प्रचार. इसके पीछे है पांचवीं बात और वो है अमेरिका के मिडटर्म चुनाव. माना जा रहा है कि ट्रंप ने युद्ध का ट्रीटमेंट चेंज कर दिया है. युद्ध पर हर क्षण इतने बयान और अपडेट दिए जा रहे हैं, जिससे लगता है कि ये युद्ध का असली मकसद ईरान के खतरे को मिटाना नहीं है, बल्कि अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रंप का प्रचार करना है. बार बार ये साबित करने की कोशिश हो रही है कि युद्ध में अमेरिका का कोई नुकसान नहीं हो रहा है. बल्कि उसका तो फायदा हो रहा है. ट्रंप बार बार कहते हैं कि अमेरिका की वापसी हो रही है, अमेरिका फिर महान बन रहा है. लेकिन क्या अमेरिका की जनता इस बात पर विश्वास करेगी? क्या ईरान युद्ध चुनाव में ट्रंप की कोई मदद कर पाएगा?

1991 ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म और बुश सीनियर की हार?

अमेरिका ने इराक पर हमला किया. इसे नाम दिया गया था ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म. तब अमेरिका के राष्ट्रपति थे जॉर्ज एच डब्‍ल्‍यू बुश . जिन्हें बुश सीनियर के नाम से भी जानते हैं. बुश सीनियर रिपब्लिकन पार्टी के नेता थे. तेल के व्यापारी थे. पूर्व सैनिक भी थे. इतिहास में पहली बार पूरी दुनिया ने अपने ड्राइंगरूम में बैठ कर युद्ध का सीधा प्रसारण देखा. स्कड और पैट्रियाट मिसाइलें हर जुबान पर चढ़ गई. अमेरिका की ताकत को सबने देखा. काफी प्रसिद्धी मिली, तब हमला करने का आदेश संयुक्त राष्ट्र ने दिया था. हमले में अमेरिका के साथ यूरोप और दुनिया के 30 से अधिक देश शामिल थे. हमले का कारण था कुवैत पर इराक का कब्जा. इसमें अन्तरराष्ट्रीय कानून टूटा था. दुनियाभर में तेल की सप्लाई के लिए खतरा पैदा हो गया था, क्योंकि कुवैत एक तेल संपन्न मुल्क था और इराक भी. मिडिल ईस्ट में शक्ति संतुलन बिगड़ा सो अलग. इराक के पास बड़ी सेना थी. केमिकल वेपन का आरोप था. संयुक्त राष्ट्र और 30 देश ने मिलकर कुवैत को आजादी दिलाई. 28 फरवरी, 1991 को युद्ध विराम का ऐलान हुआ. बुश की एप्रूवल रेटिंग्स भी बहुत अच्छी थी. इसके 614 दिन बाद अमेरिका में चुनाव हुए. रिपब्लिकन पार्टी चुनाव हार गई. डेमोक्रेटिक पार्टी के बिल क्लिंटन चुनाव जीत गए, जिनका विश्वप्रसिद्ध नारा था-  "it is economy stupid". कहा जाता है कि गल्फ वॉर के बाद अमेरिका में गंभीर मंदी आई, बेरोजगारी बढ़ी और बुश ने नया टैक्स भी लगाया. जबकि चुनाव प्रचार में वो कह रहे थे कि "read my lips no new tax" इकोनॉमी की हार युद्ध की जीत पर भारी पड़ी. वॉर के हीरो इलेक्शन में जीरो हो गए. ऐसे में सवाल है कि अमेरिका में युद्ध के साथ चुनावी जीत का 36 का आंकड़ा क्यों है?

अमेरिका के नागरिक दूसरों से ज्यादा खुद पर जोर देते हैं. ट्रंप की जीत के पीछे भी ऐसी ही सोच वाले MAGA समर्थक हैं, जो अमेरिका को ग्रेट इसलिए बनाना चाहते है कि उनकी अपनी जिंदगी दुनिया में सबसे अच्छी हो. दुनिया अमेरिका को महान कहे. ईरान के साथ युद्ध में ट्रंप इकोनॉमी पर बहुत जोर दे रहे हैं. ट्रंप बार बार कह रहे हैं कि वो बहुत बड़ी डील करेंगे. वो संकेत दे रहे हैं कि इसके बाद अमेरिका दुनिया में तेल का और बड़ा रेग्यूलेटर हो जाएगा. ट्रंप अपने मागा समर्थकों को अमेरिका के फिर से महान हो जाने के सबूत भी दे रहे हैं. वो बार बार ऐसे बयान देते हैं जिससे साबित हो कि अमेरिका से ज्यादा पॉवरफुल तो कोई है ही नहीं. समुद्र, जमीन और हवा हर जगह अमेरिका से कोई टक्कर नहीं ले सकता है. NATO सहित दुनिया का हर देश उनके साथ नहीं है, फिर भी अमेरिका अकेले दम पर ईरान की नाक पर नकेल कस रहा है. ट्रंप अमेरिका को ये भी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान की जीत अमेरिका के डॉलर को मजबूत करेगी. डॉलर के खिलाफ चीनी मुद्रा युआन को कमजोर करेगी, लेकिन इस पर अमेरिका की जनता क्या सोचती है संकेत ठीक नहीं है. युद्ध के मुद्दे पर अमेरिका में ट्रंप का बड़े से बड़ा समर्थक उनके खिलाफ होता जा रहा है. ट्रंप भी सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना कर रहे हैं. ट्रंप की एप्रूवल रेटिंग्स भी गिरी हैं.


1968 वियतनाम युद्ध जॉनसन हटे, डेमोक्रेट हारे

वियतनाम के खिलाफ युद्ध में अमेरिकी सेना को जमीन पर उतारा गया. नतीजे अमेरिका के खिलाफ रहे. युद्ध बहुत लंबा था. अमेरिका की जनता का विरोध इतना उग्र था कि जॉनसन को सत्ता छोड़नी पड़ी. डेमोक्रेट्स में फूट पड़ गई. 1968 में राष्ट्रपति के चुनाव हुए. डेमोक्रेट्स ने ह्यूबर्ट हम्फ्रे को प्रत्याशी बनाया था. रिपब्लिकन पार्टी ने रिचर्ड निक्सन को प्रत्याशी बनाया. डेमोक्रेट्स हार गए. रिपब्लिकन जीत गए. रिपब्लिकन ने वियतनाम से अमेरिकी सेना की वापसी शुरू कर दी. 1972 के अगले राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिक पार्टी के रिचर्ड निक्सन ऐतिहासिक मतों से जीते थे. हार जीत के कारण कई हो सकते हैं, लेकिन ये एक संयोग से ज्यादा लगता है कि हर बार युद्ध करने वाला नेता हारता है और शांति लाने वाला जीत जाता है.

2001 ओसामा का हमला, बुश जूनियर की जंग

अमेरिका के इतिहास में पहली बार किसी ने घर में घुस कर हमला किया. दुनिया में इस हमले को 9/11 के नाम से जाना जाता है. अमेरिका के अजेय होने की ब्रांडिंग हिल गई. राष्ट्रपति जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश थे, जिन्हें बुश जूनियर के नाम से जानते हैं. अमेरिका के ट्विन टॉवर पर हमले का मास्टरमाइंड अलकायदा का चीफ ओसामा बिन लादेन निकला. अमेरिका ने आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई छेड़ दी. अल-कायदा को नष्ट करने के लिए अमेरिकी सेना अफगानिस्तान में जमीन पर उतरी. 2004 में जॉर्ज डब्‍ल्‍यू बुश उर्फ बुश जूनियर फिर चुनाव जीत गए.

2003 इराक युद्ध- जॉर्ज डब्ल्यू बुश

लेकिन इसी बीच दो घटनाए हुईं. 2003 में इराक में वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन का अमेरिकी दावा झूठा साबित हुआ. लंबे युद्ध का अमेरिका में विरोध हुआ. 2008 में चुनाव हुए. बुश की रिपब्लिकन पार्टी हार गई और डेमोक्रेट उम्मीदवार बराक ओबामा अमेरिका  के नए राष्ट्रपति बने.

चुनाव के डर से दूर हैं अमेरिका के साथी...?

खास बात ये है इन सभी अभियानों में अमेरिका का साथ संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के दूसरे 42 से 52 देशों ने भी दिया था. लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिका का साथ अन्य देश नहीं दे रहे हैं तो क्या इसके पीछे भी ये डर हो सकता है कि युद्ध जीतने वाले चुनाव हार जाते हैं?

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1971 पाकिस्तान युद्ध- इंदिरा गांधी

1971 एशिया में एक ऐतिहासिक घटना हुई. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. पाकिस्तान हारा.एक नए देश ने जन्म लिया. देश का नाम था बांग्लादेश. बांग्लादेश के निर्माण में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूमिका को बहुत अहम माना गया. 1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो पाकिस्तान नाम का एक अलग देश भी बना था. वो पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में बंटा हुआ था. पूर्वी पाकिस्तान ही 1971 के बाद बांग्लादेश बन गया.क्योंकि वहां पर बांग्ला बोलने वाले बांग्लादेशी अपनी सांस्कृतिक पहचान अलग देखते थे. पश्चिमी पाकिस्तान ने बांग्लादेशियों पर अत्याचार किया. नतीजा बगावत हुई. भारत की शांतिवाहिनी ने बांग्लादेशियों की मदद की. बांग्लादेश का जन्म हुआ. इसके बाद इंदिरा गांधी का सम्मान और रसूख बहुत बढ़ गया, तब अमेरिका में रिचर्ड निक्सन राष्ट्रपति थे. वो इंदिरा गांधी से बहुत नाराज थे. फिर भी इंदिरा गांधी को राष्ट्रहित में जो सही लगा वो उन्होंने किया. इसके बाद भारत के घटनाक्रम तेजी से बदले. 1975 में इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी का एलान कर दिया. 1977 में फिर चुनाव हुए और इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं.पाकिस्तान विजय की बढ़त उनके किसी काम नहीं आई.

चुनाव के मैदान में रणवीर क्यों ढेर?

यहां ये समझना जरूरी है कि युद्ध के बाद चुनाव अक्सर झटका क्यों देते हैं? होता ये है कि युद्ध की जीत देशवासियों की उम्मीद बहुत बढ़ा देती है, लेकिन युद्ध का विरोध करने वाले सरकार की हर कमी को युद्ध का नतीजा बताने लगते हैं. ऐसे में समर्थक और विरोधियों का घमासान सत्ता के बने बनाए राजनीतिक समीकरण को बिगाड़ देता है. इसलिए अगर युद्ध की जीत और चुनाव की तारीख के बीच में लंबा अंतर हो तो फिर समीकरण युद्ध जीतने वाले के खिलाफ बनने ही लगते हैं. युद्ध छेड़ने वाले देश में आर्थिक बदलाव भी शुरू हो जाते हैं. खर्चा बढ़ता है. डिफेंस बजट बढ़ता है. इसकी वजह से दूसरी जरूरतों में कटौती शुरू होती है या कटौती की आशंका हो जाती है. मंदी भी पैर बढ़ाने शुरू कर देती है. जमाखोरी, कालाबाजारी ज्यादा होने लगती है और अगर सरकार कोई कंट्रोल रिजीम लाती है तो लोग और भड़क जाते हैं. ऐसे मे युद्ध के हीरो फाइनली इलेक्शन में जीरो हो जाते हैं.

युद्ध विजेताओं के चुनाव हारने का पुराना इतिहास:-

पहले विश्वयुद्ध में भी युद्ध के हीरो इलेक्शन में जीरो का ट्रेंड देखने को मिला है. डेविड लॉयड जॉर्ज, लिबरल पार्टी के नेता थे.  1916 से 1922 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे. पहला विश्वयुद्ध 1914 से 1919 तक चला. ब्रिटेन युद्ध जीतने वाले मित्र राष्ट्र में शामिल था, लेकिन 1922 में जब चुनाव हुए तो डेविड लॉयड जॉर्ज की पार्टी चुनाव हार गई. य़ुद्ध के दौरान लॉयड ने वादा किया था कि वो ब्रिटेन को वीरों के लिए बेहतर देश बनाएंगे “LAND HIT FOR HEROES”  लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और हड़ताल ने लोगों का मोहभंग कर दिया. 1922 में जब लॉयड तुर्की से जुड़े ‘चनक क्राइसेस' में उलझे तो देश को उनकी विदेश  नीति में गर्व कम, जोखिम ज्यादा नजर आया. चुनाव नतीजे आए तो उनकी पार्टी चुनाव हार गई.

न्‍यूजीलैंड के पीएम पीटर फ्रेजर

न्यूज़ीलैंड के प्रधानमंत्री पीटर फ्रेजर भी सेकेंड वर्ल्ड वॉर  के बाद हुए 1949 के चुनाव में अपनी पार्टी को बढ़त नहीं दिला पाए थे. 

फ्रांस के चार्ल्स डी गॉल

सेकेंड वर्ल्ड वॉर में फ्री फ्रांस के नेता चार्ल्स डी गॉल को भी छात्र आंदोलन और सामाजिक बदलाव के कारण जनमत संग्रह हारे और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था.

अब तक ये रिपोर्ट पढ़ने के बाद आपको क्या लगता है? ईरान-इजरायल और अमेरिका के नेताओं के लिए इसमें क्या संदेश है. अमेरिका में तो साफ है कि अगर खतरा देश की जमीन तक पहुंचता है तो अमेरिकी नागरिक अपने नेता के साथ खड़े रहते हैं. इसके अलावा अगर युद्ध की वजह से उनके अपने जीवन में असर पड़ने लगता है तो वो युद्ध के खिलाफ हो जाते हैं. लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि अमेरिका के लगभग हर राष्ट्रपति ने दुनिया में कही न कहीं सैनिक अभियान या युद्ध लड़े हैं. इजरायल का तो वजूद ही युद्ध पर निर्भर लगता है. इजरायल कब युद्ध के मोड में नहीं होता ये कहना मुश्किल है. बचा ईरान. ये देश भी मानसिक रूप से युद्ध की तैयारी में बना रहता है. खासकर एपिक फ्यूरी के बाद ईरान के बारे में यही कहा गया कि युद्ध के लिए उसकी लंबी और बड़ी तैयारी है, लेकिन इजरायल और अमेरिका युद्ध की तबाही को आधार बनाकर ईरान में सत्ता पलट का प्लान भी तैयार कर रहे हैं. इराक,लीबिया और सीरिया में ऐसा हुआ भी है.

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Nikhil Dubey
Reporter
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