मिडिल ईस्ट में जारी जंग के बीच अमेरिका और इजरायल की स्थिति अब पहले जैसी मजबूत नहीं दिख रही. पुख्ता सूत्रों और रक्षा विश्लेषकों के इनपुट बताते हैं कि एक महीने के भीतर ही दोनों देशों को संसाधन और रणनीति दोनों मोर्चों पर दबाव झेलना पड़ रहा है. वहीं ईरान के लगातार आक्रामक हमलों ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है.
अमेरिका: ‘अनलिमिटेड हथियार' के दावे से कमी तक
जंग की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रंप और उनके रक्षा अधिकारियों ने दावा किया था कि अमेरिका के पास 'लगभग असीमित' हथियार और गोला-बारूद है. लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है. रक्षा विशेषज्ञ सेथ जी. जोन्स ने साफ कहा है कि अमेरिका में गोला-बारूद की कमी 'सोच से ज्यादा गंभीर' है. लगातार हाई-इंटेंसिटी हमलों, एयर डिफेंस इंटरसेप्शन और लंबी तैनाती ने अमेरिकी स्टॉकपाइल पर भारी दबाव डाला है. यही वजह है कि अब सप्लाई चेन और डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस की क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं.
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इजरायल: सैनिकों की कमी और मल्टी-फ्रंट दबाव
दूसरी तरफ इजरायल भी अभूतपूर्व दबाव में है. वहां के सेना प्रमुख ने संकेत दिए हैं कि लगातार युद्ध और कई मोर्चों पर तैनाती के कारण सैनिकों की कमी महसूस हो रही है. रिजर्व फोर्स को बार-बार सक्रिय करना पड़ रहा है, जिससे ऑपरेशनल थकान और रिसोर्स मैनेजमेंट बड़ी चुनौती बन गई है. गाजा से लेकर उत्तरी सीमाओं तक तनाव ने सेना की क्षमता को खींचकर रख दिया है.
ईरान की नई रणनीति: सीधे अमेरिकी ठिकाने निशाने पर
ईरान ने इस जंग में सबसे बड़ा बदलाव अपनी रणनीति में किया है. अब वह प्रॉक्सी के बजाय सीधे हमले कर रहा है. हाल ही में सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर हमला हुआ, जिसमें भारी नुकसान की खबर है. इस तरह के हमले यह दिखाते हैं कि ईरान अब जंग को व्यापक बनाकर अमेरिका पर सीधे दबाव बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है.
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क्यों बिगड़ी अमेरिका-इजरायल की हालत?
इस जंग में दोनों देशों की स्थिति कमजोर पड़ने के पीछे कई बड़े कारण उभरकर सामने आ रहे हैं.
पहला, युद्ध की अवधि जो शुरुआत में तेज और सीमित ऑपरेशन माना जा रहा था, वह लंबी खिंचती लड़ाई में बदल गया.
दूसरा, संसाधनों की खपत. लगातार मिसाइल, ड्रोन और एयर डिफेंस के इस्तेमाल ने स्टॉक तेजी से कम किए.
तीसरा, ईरान की आक्रामक रणनीति. जिसने युद्ध को अप्रत्यक्ष से सीधे टकराव में बदल दिया.
चौथा, मल्टी-फ्रंट दबाव. खासकर इजरायल के लिए, जहां अलग-अलग सीमाओं पर एक साथ तनाव बना हुआ है.
एक महीने के भीतर ही यह साफ हो गया है कि यह जंग आसान नहीं रहने वाली. अमेरिका और इजरायल दोनों को अब अपनी रणनीति, संसाधन और सैन्य क्षमता को नए सिरे से आंकना पड़ रहा है, जबकि ईरान लगातार दबाव बढ़ाने में लगा है. आने वाले दिनों में यही तय करेगा कि यह संघर्ष सीमित रहेगा या और बड़े युद्ध में बदल जाएगा.
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