अमेरिका और इजरायल ने मिलकर 28 फरवरी को अचानक ईरान पर हमला बोला. जंग को 11 दिन हो चुके हैं और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मिशन साफ नहीं है. उनके बयानों में भारी विरोधाभास दिख रहा है. उन्होंने वह इसे ईरानी सैन्य ठिकानों को खत्म करने का मिशन बता रहे तो कभी शासन परिवर्तन की कवायद. दिलचस्प ये है कि पिछले साल ईरान के परमाणु ठिकानों को बर्बाद करने का दावा करने वाले ट्रंप अब ईरान से परमाणु खतरे का हवाला देकर सैन्य कार्रवाई को जायज ठहरा रहे हैं. देखिए, हर रोज ट्रंप के बयान किस तरह बदले हैं.
28 फरवरी: जंग का आगाज और 4 बड़े लक्ष्य
ट्रंप ने ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' शुरू करते हुए कहा कि इस मिशन का मुख्य मकसद ईरान की मिसाइल इंडस्ट्री को पूरी तरह नष्ट करना है. ट्रंप ने 4 प्रमुख लक्ष्य बताए- ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को खत्म करना, उसकी नौसेना को पंगु बनाना, परमाणु हथियार की आशंका खत्म करना और ईरानी समर्थित समूहों के हमलों को रोकना. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि बमबारी तब तक जारी रहेगी, जब तक मिडिल ईस्ट और दुनिया में शांति स्थापित नहीं हो जाती.
1 मार्च: 4 हफ्ते से पहले जंग खत्म!
हवाई हमले शुरू होने के दूसरे दिन ट्रंप ने डेली मेल को दिए एक इंटरव्यू में दावा कर दिया कि ईरान के खिलाफ यह संघर्ष ज्यादा लंबा नहीं चलेगा. दावा किया कि यह पूरा मिशन खत्म करने में 4 हफ्ते या उससे भी कम समय लगेगा.
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2 मार्च: जमीनी सेना भेजने का संकेत
युद्ध के तीसरे दिन ट्रंप ने रुख बदलते हुए पहली बार कहा कि जरूरी हुआ तो अमेरिका जमीनी सेना भेजने से पीछे नहीं हटेंगे. ये भी कहा कि हमने 4-5 हफ्ते का अनुमान लगाया था, लेकिन हमारे पास लंबे समय तक लड़ने की क्षमता है. विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि ईरान के ऊपर इजरायल हमला करने वाला था, ऐसे में अमेरिका ने अपने ऊपर होने वाले हमलों से बचने के लिए स्ट्राइक की.
3 मार्च: विदेश मंत्री के उलट बयान
ट्रंप ने अपने ही विदेश मंत्री रुबियो के बयान का खंडन करते हुए कहा कि युद्ध में जाने का फैसला इजराइल का नहीं, बल्कि उनका अपना फैसला था क्योंकि मुझे लगा था कि ईरान पहले हमला कर देगा. ट्रंप ने शुरुआती हमलों में ही ईरान की सैन्य शक्ति को लगभग पूरी तरह नष्ट करने का दावा किया.
5 मार्च: इन्फैंट्री भेजना वक्त की बर्बाद
ट्रंप ने जमीनी सेना भेजने को लेकर फिर से अपना बयान बदला. एनबीसी न्यूज से बातचीत में उन्होंने कहा कि इन्फेंट्री भेजना वक्त की बर्बादी हो सकती है, लेकिन संकेतों में ये भी कहा कि वह इलाके में जाकर क्लीन आउट (सब कुछ साफ) करना चाहते हैं. उनके इस विरोधाभासी बयान ने सैन्य विशेषज्ञों को उलझन में डाल दिया.
6 मार्च: सरेंडर से ही थमेगा युद्ध
तनाव बढ़ता देख ट्रंप ने कड़े शब्दों में कहा कि युद्ध तभी खत्म होगा जब ईरान बिना शर्त सरेंडर कर देगा. ईरान से सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद ट्रंप ने इशारों में कहा कि अमेरिका अब ईरान में अगले नेतृत्व और शासन परिवर्तन में भी सीधी भूमिका निभाना चाहता है.
7 मार्च: फिर से सेना भेजने का इशारा
ट्रंप ने एक बार फिर से जमीनी सेना भेजने के संकेत दिए और कहा कि ईरान के एनरिच्ड यूरेनियम भंडारों को सुरक्षित करने के लिए अमेरिकी सैनिकों को वहां उतरना पड़ सकता है. उनका कहना था कि एक दौर ऐसा आएगा, जब ये बहुत अच्छी बात होगी.
9 मार्च: 'मिशन पूरा' होने का दावा
ट्रंप ने सीबीएस न्यूज से कहा कि युद्ध "लगभग पूरा" हो चुका है. उनके इस बयान के बाद तेल की कीमतों में भारी गिरावट आ गई. हालांकि उसी शाम उन्होंने सांसदों से कहा कि वह ईरान की धार्मिक लीडरशिप के खिलाफ 'अल्टिमेट जीत' के लिए दबाव बना रहे हैं.
10 मार्च: पेंटागन बोला, जंग तेज हो रही
पेंटागन ने ट्रंप के 'मिशन कंप्लीट' वाले दावे के उलट बयान दिया. रक्षा मंत्री हेगसेथ ने पत्रकारों से कहा कि जंग अभी तेज हो रही है और आज (10 मार्च) का दिन ईरान पर हमलों का "सबसे घातक दिन" साबित होगा. युद्ध कब खत्म होगा, इस पर उनका कहना था कि ये
राष्ट्रपति ट्रंप के हाथ में है.
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