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क्या डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को युद्ध में फंसा दिया है, मंडरा रहे हैं कौन कौन से खतरे

अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लगा था कि यह जल्द ही खत्म हो जाएगा. लेकिन ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है. इसका असर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिख रहा है. क्या अमेरिका ने दुनिया को इस युद्ध में उलझा दिया है.

क्या डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया को युद्ध में फंसा दिया है, मंडरा रहे हैं कौन कौन से खतरे
नई दिल्ली:

इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का बुधवार को 11वां दिन है. देखते ही देखते यह युद्ध कई देशों में फैल गया युद्ध का असर अब दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर नजर आ रहा है.युद्ध का सबसे अधिक असर तेल के बाजार पर देखा जा रहा है. बुधवार को क्रूड की कीमत करीब 88 डॉलर प्रति बैरल थी. यह तब है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हमले को सीमित युद्ध बताया था. लेकिन अभी इस युद्ध के अंत की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है. ईरान ने अमेरिका को इस युद्ध में बुरी तरह फंसा दिया है.   

क्या युद्ध से गर्म है कच्चे तेल का बाजार

युद्ध शुरू होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं. सोमवार को कच्चे तेल की कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. लेकिन बुधवार तक ये घटकर करीब 88 डॉलर प्रति बैरल तक आ गईं. इस बीच गोल्डमैन सैक्स ने रिपोर्ट दी है कि अगर अगले 48 घंटों में तनाव कम नहीं हुआ, तो कच्चे तेल की कीमतें 155 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं. कच्चे तेल की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए  अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) दो महीने में 40 करोड़ बैरल तेल जारी करने की सिफारिश कर सकती है. इस संगठन की 1970 में हुई स्थापना के बाद पहली बार इतनी अधिक मात्रा में तेल जारी किया जाएगा. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता. इससे परिवहन लागत, खाद्य कीमतें और औद्योगिक उत्पादन सभी प्रभावित होगा. 

क्या अमेरिका-इजरायल ने बातचीत के रास्ते बंद कर दिए हैं

जून 2025 में भी इजरायल-ईरान के बीच 12 दिन तक युद्ध चला था. इसमें इजरायल-अमेरिका ने ईरान के नतांज, फोर्डो और इस्फहान में स्थित परमाणु और सैन्य ठिकानों पर बमबारी की थी. ये हमले विनाशकारी थे, लेकिन लक्ष्यों की सीमित प्रकृति के कारण बातचीत की गुंजाइश बनी रही.ओमान की मध्यस्थता के बाद 24 जून को यह संघर्ष खत्म हुआ था. ओमान उस समय जिनेवा में चल रही अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता में भी शामिल रहा. लेकिन इस बार अमेरिका-इजरायल ने हमला कर ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई सैन्य कमांडरों की हत्या कर दी. यह हमला ईरान में सत्ता परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अब ईरान ने खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता चुन लिया है. ऐसा लगता है कि अमेरिका ने ईरान की सैन्य रणनीति को समझने में भूल कर दी है. विश्लेषकों का कहना है कि तेहरान पिछले दो दशक से इस युद्ध की तैयारी कर रहा था.ईरान ने सेना के साथ-साथ सर्वोच्च नेता के 'फोर्थ सक्सेसर' (चौथे उत्तराधिकारी) के बैकअप की योजना भी बनाई. इससे शीर्ष नेता के मारे जाने पर भी नेतृत्व का संकट पैदा नहीं हुआ है. यह तब हो रहा है जब डोनाल्ड ट्रंप कई बार यह दावा कर चुके हैं कि ईरान की नौसेना और वायुसेना तबाह हो चुकी है.अब ईरानी नेता अमेरिका और इजरायल को बातचीत के लिए विश्वसनीय नहीं बता रहे हैं, जबकि ट्रंप बातचीत की संभावनाएं तलाश रहे हैं.

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होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना कितना बड़ा संकट है

ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से किसी भी समुद्री जहाज के गुजरने पर पाबंदी लगा दी है.  अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक 2025 में प्रतिदिन करीब 20 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल और तेल उत्पाद इस रास्ते से होकर गुजरे थे. इसके अलावा समुद्र से पैदा होने वाले तेल के 25 फीसदी हिस्से इसी रास्ते से गुजरा. आईईए का कहना है कि अगर स्थितियां सामान्य नहीं हुईं तो तेल और लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) की आपूर्ती पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. ईरान खाड़ी देशों की रिफाइनरियों पर भी हमला कर रहा है. इसने भी कच्चे तेल के संकट को और गहरा किया है. 

क्या युद्ध की वजह से अमेरिका में भी बढ़ रही है महंगाई 

अमेरिका के युद्ध में शामिल होने का असर अमेरिका में भी देखा जा रहा है. अमेरिका में गैस की औसत कीमत 4.15 डॉलर प्रति गैलन हो गई हैं. इससे अमेरिकी घरेलू बाजार में महंगाई दर में 1.2 फीसदी की अचानक वृद्धि दर्ज की गई है.इसके साथ ही शेयर बाजारों में हाहाकार मचा हुआ है. युद्ध को लेकर ट्रंप के बयान के बाद वॉल स्ट्रीट (S&P 500) में 3.4 फीसदी और भारत-जापान के बाजार में औसतन 2.8 फीसदी की भारी गिरावट देखी गई है. इस वजह से निवेशकों का एक ही दिन में 2.1 ट्रिलियन डॉलर स्वाहा हो गए. 

क्या युद्ध से कमजोर हो रहा है भारत का रुपया

इस युद्ध का असर भारत के रुपये पर भी देखा जा रहा है. बुधवार को रुपया 16 पैसे टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 92.01 पर बंद हुआ. विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और डॉलर के मजबूत होने से घरेलू मुद्रा पर दबाव बढ़ा है.मंगलवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से जोरदार वापसी करते हुए 36 पैसे चढ़कर 91.85 पर बंद हुआ था. भारत का कच्चा तेल आयात बिल चालू वित्त वर्ष के बजट अनुमान से 18 फीसदी ऊपर निकल गया है. इसका असर भी रुपये की सेहत पर पड़ा है. 

क्या शिपिंग इंश्योरेंस का प्रीमियम बढ़ने से महंगाई बढेगी

युद्ध का असर शिपिंग इंश्योरेंस के प्रीमियम पर पड़ रहा है. कुछ रिपोर्टों के मुताबिक इसमें 400 फीसदी से अधिक तक का इजाफा हुआ है.इसका सीधा असर आयात और निर्यात होने वाली हर वस्तु पर पड़ेगा.युद्ध की वजह से निवेशकों को खरीदार नहीं मिल रहे हैं और जो ऑर्डर है उसकी सप्लाई की  कीमत प्रीमियम बढ़ने से और बढ़ गई है. ऑर्डर देना वाली कंपनियों ने ऑर्डर को होल्ड पर रख दिया है. निर्यातकों का कहना है कि अगर जंग नहीं रुकी तो उनकी हालत और खराब हो जाएगी. इसे देखते हुए सरकार भारतीय शिपिंग कंपनियों और निर्यातकों को सहायता देने के संभावित उपायों पर विचार कर रही है. 

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