विज्ञापन

चीन से आई गंभीर चेतावनीः कभी भी टूट सकते हैं तिब्बत के ग्लेशियर, बड़ी आपदा का खतरा

करीब 7,000 छोटे ग्लेशियर गायब हो चुके हैं और 24 फीसद ग्लेशियर क्षेत्र घट गया है. इसका सीधा मतलब है कि हिमालयी क्षेत्र में 26 अगस्त के तरह की घटनाओं का खतरा तेजी से बढ़ रहा है.

चीन से आई गंभीर चेतावनीः कभी भी टूट सकते हैं तिब्बत के ग्लेशियर, बड़ी आपदा का खतरा
कभी भी टूट सकते हैं तिब्बत के ग्लेशियर
  • चीन के वैज्ञानिक ने चेतावनी दी है कि ग्लेशियर से जुड़ी आपदाएं बार-बार हो सकती हैं.
  • ऐसी घटनाओं के कारण उनकी तबाही और असर का दायरा भी बढ़ सकता है.
  • इसमें ये भी बताया गया है कि तिब्बती पठार पर करीब 7,000 छोटे ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो चुके हैं.

नेपाल-तिब्बत सीमा पर विनाशकारी बाढ़ के बाद चीन ने तिब्बती पठार के ग्लेशियरों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है. चीन के एक वरिष्ठ जलवायु अधिकारी ने चेतावनी दी है कि तिब्बती पठार के ग्लेशियर, आने वाले समय में और अस्थिर हो सकते हैं. इससे ग्लेशियरों के टूटने की घटनाएं बढ़ सकती हैं और पिछले हफ्ते तिब्बत-नेपाल सीमा पर आई जानलेवा अचानक बाढ़ जैसी दूसरी बड़ी आपदाएं भी पैदा हो सकती हैं.

26 अगस्त को नेपाल-तिब्बत सीमा के पास बर्फ और चट्टानों के बड़े हिस्से के अचानक टूटकर नीचे आने से फ्लैश फ्लड शुरू हुई थी. इस बाढ़ ने नेपाल के उत्तरी और मध्य हिस्सों के कस्बों और गांवों में भारी तबाही मचाई और सैकड़ों लोगों की जान चली गई.

अखबार साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की खबर के मुताबिक चीन के सरकारी संगठन नेशनल क्लाइमेट सेंटर के डिप्टी डायरेक्टर गाओ रोंग ने बताया कि, "पिछले 60 वर्षों में तिब्बती पठार पर ग्लेशियरों का क्षेत्र करीब 24 फीसद कम हुआ और करीब 7,000 छोटे ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो चुके हैं."

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने गाओ के हवाले से बताया कि आने वाले समय में पूरे तिब्बती पठार के ग्लेशियरों की संरचनात्मक स्थिरता और कम हो सकती है. ग्लेशियर से जुड़ी आपदाएं ज्यादा बार हो सकती हैं और एक के बाद एक होने वाली घटनाओं के कारण उनकी तबाही और असर का दायरा भी बढ़ सकता है.

चीन के अधिकारियों की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले हफ्ते नेपाल सीमा के तिब्बत वाले हिस्से में स्थित ग्यिरोंग पोर्ट पर आई फ्लैश फ्लड में 21 लोगों की मौत हुई है, जबकि 546 लोग अब भी लापता हैं. इन लापता लोगों में 261 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं. इनमें 49 भारतीय नागरिक और 22 अन्य देशों के नागरिक बताए गए हैं. चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने तिब्बत में हुई आधिकारिक आंकड़ों के हवाले से यह जानकारी दी.

चीन में फ्लैश फ्लड पर सार्वजनिक चर्चा प्रतिबंधित

वहीं तिब्बत की एक एडवोकेसी ग्रुप का कहना है कि पिछले हफ्ते आए फ्लैश फ्लड में तिब्बत की ओर सैकड़ों घर तबाह हो गए. इससे चीन के आधिकारिक आंकड़ों पर सवाल उठते हैं. वहीं इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत के मुताबिक हताहतों की संख्या इससे कहीं अधिक है क्योंकि उन्होंने 300 से अधिक घरों के पूरी तरह तबाह होने की बात कही है.

चीन में फ्लैश फ्लड को लेकर सार्वजनिक चर्चा को प्रतिबंधित कर दिया गया है. तिब्बत में सुरक्षा अधिकारियों ने यह घोषणा की कि कम से कम 10 लोगों के इस आपदा से जुड़ी गलत जानकारियां फैलाने के लिए दंडित किया गया है. हालांकि यह नहीं बताया गया कि दंड के रूप में उन्हें क्या दिया गया.

चीन की विज्ञान अकादमी के इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतियन प्लेटू रिसर्च ने नेपाल की इस त्रासदी पर अपनी रिपोर्ट में बताया कि ग्लेशियर टूटने से बना मलबे का सैलाब घाटी में करीब 22 किलोमीटर तक गया और सिर्फ सात मिनट में तिब्बत सीमा पर मौजूद ग्यिरोंग पोर्ट तक पहुंच गया.

वैज्ञानिकों की चेतावनी- आपदा का आकार बदल रहा

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब प्राकृतिक आपदाओं के खतरे का आकलन सिर्फ इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि शुरुआत में पहाड़ से कितना बर्फ या चट्टान टूटा.

ग्यिरोंग काउंटी से मिले सैटेलाइट और जमीन से जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि टूटे हुए बर्फ और चट्टानों का मलबा 22 किलोमीटर लंबी घाटी से तेजी से नीचे आया. इस दौरान उसने नदी की तलहटी को काटा, नदी के किनारों पर मौजूद मलबे को अपने साथ खींचा. इससे पहाड़ की ऊंचाई पर हुई छोटी शुरुआत एक बेहद विनाशकारी मलबे के सैलाब में बदल गई.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी शोधकर्ताओं ने इसलिए सुझाव दिया है कि ऊंचे पहाड़ी इलाकों के क्रायोस्फीयर यानी बर्फ और जमे हुए क्षेत्रों में आपदा के जोखिम का आकलन करते समय सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि ग्लेशियर का कितना टुकड़ा गिरा है.

इसके साथ यह भी देखना जरूरी है कि नीचे की घाटी में पहुंचने के दौरान मलबा कितना बढ़ सकता है और उसके रास्ते में नीचे की तरफ रहने वाली आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर कितना खतरा है.

रिपोर्ट में कहा गया, "असल खतरा सिर्फ इस बात से तय नहीं होता कि पहाड़ से कितना हिस्सा टूटा, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि घाटी में बहते समय वह कितना अतिरिक्त मलबा अपने साथ जोड़ सका और नीचे की तरफ मौजूद कितनी आबादी और महत्वपूर्ण बुनियादी सुविधाएं इस पूरी आपदा की चपेट में आती हैं."

ये भी पढ़ें: Explainer: हिमालय पिघल रहा है, समुद्र चढ़ रहा है; पर मुंबई-कोलकाता के लाखों घर खतरे में कैसे?

Latest and Breaking News on NDTV

पहले से मौजूद वार्निंग सिस्टम कामयाब नहीं

बुधवार को नेचर में प्रकाशित एक लेख ने भी भविष्य में ऐसी घटनाओं की निगरानी और पूर्वानुमान लगाने वाले सिस्टम को बेहतर बनाने की तत्काल जरूरत पर जोर दिया.

इस आपदा की भविष्यवाणी करना इसलिए मुश्किल साबित हुआ क्योंकि इसकी शुरुआत सामान्य संकेतों, जैसे बेहद तेज बारिश या ग्लेशियल झीलों के बढ़ते जलस्तर से नहीं हुई थी. इसके बजाय यह ऊंचाई वाले इलाके में मौजूद ग्लेशियर और चट्टानों की संरचना के अचानक टूटने से शुरू हुई.

नेचर से बातचीत में अमेरिका की वर्जियनिया टेक के विज्ञानी मनोचेहर शिरजई ने कहा, "ऐसी आपदाओं की भविष्यवाणी करने में पहले से मौजूद सिस्टम कामयाब नहीं रहा है. या यूं कहें कि आज के समय में पर्याप्त नहीं है."

उन्होंने अलग-अलग स्रोतों से मिलने वाली जानकारियों को एक साथ जोड़ते हुए एक बेहतर निगरानी व्यवस्था को विकसित करने पर जोर दिया.

नेचर के लेख में कहा गया कि अभी सबसे बड़ी कमी एक ऐसी क्षेत्रीय, सैटेलाइट आधारित सिस्टम की है, जो ग्लेशियरों और पहाड़ी ढलानों में तेजी से होने वाले बदलावों की निगरानी कर सके. इसके बाद इस जानकारी को सीधे नीचे की तरफ आने वाली बाढ़ और हिमस्खलन के मॉडल से जोड़ा जा सके, ताकि खतरे का पहले से बेहतर अनुमान लगाया जा सके

ये भी पढ़ें: Reporter's Diary: आसमान से दिखी त्रिशूली नदी घाटी की खौफनाक तस्वीर, नेपाल में जंग से भी बदतर तबाही

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Glaciers, China, Nepal, Nepal Flood 2026, Nepal Flood
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com