- ट्रंप ने मई में ताइवान को हथियार बेचने को मोल-भाव का हिस्सा बताया था, जिससे सहयोगी देशों में आशंकाएं बढ़ीं
- जापान और ताइवान ने ट्रंप से ताइवान के प्रति अमेरिकी नीति में कोई बदलाव न करने का आग्रह किया है
- इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत ने ट्रंप से शी जिनपिंग से तिब्बत के राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की है
अगले हफ्ते चीनी नेता शी जिनपिंग की मेज़बानी करने की तैयारी कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर एशिया में अमेरिका के सहयोगी देश चिंतित हैं. उन्हें डर है कि बीजिंग के साथ आर्थिक फ़ायदा पाने के लिए ट्रंप ताइवान के प्रति अमेरिका के समर्थन को कम कर सकते हैं. वहीं तिब्बत से जुड़े संगठन इस बात की मांग कर रहे हैं कि ट्रंप को जिनपिंग के सामने ये मामला जरूर उठाना चाहिए.
किस बात का है ट्रंप से डर?
- ट्रंप की तरफ से ताइवान के मामले में रियायतें देने की चिंताएं तब और बढ़ गईं जब मई में उन्होंने चीन के दावे वाले इस लोकतांत्रिक रूप से शासित द्वीप को अमेरिकी हथियार बेचने के मुद्दे को "मोल-भाव का ज़रिया" बताया था. साथ ही, ईरान युद्ध के कारण गिरी अपनी लोकप्रियता को फिर से बढ़ाने की कोशिश भी इन चिंताओं की एक वजह है.
- ताइपे, टोक्यो और वॉशिंगटन में सरकारी अधिकारियों, सांसदों और जानकारों के साथ हुई बातचीत के अनुसार, 24 सितंबर को होने वाली संभावित बैठक में शी, ताइवान के मुद्दे पर ट्रंप पर दबाव डाल सकते हैं. अमेरिकी रुख में मामूली बदलाव भी बीजिंग का हौसला बढ़ा सकता है और इस इलाके की नाज़ुक शांति के लिए खतरा पैदा कर सकता है.
- अमेरिका के थिंक टैंक 'एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट' में पॉलिटिकल-सिक्योरिटी मामलों की डायरेक्टर एमा चैनलेट-एवरी ने कहा, "खासकर हमारे सहयोगियों के मन में इस बात को लेकर काफी चिंता है कि हमारी चीन नीति किस दिशा में जा रही है. ताइवान के मामले में नरमी का कोई भी संकेत काफी चिंताजनक होगा."
- चीन ने अमेरिका के साथ अपने रिश्तों में ताइवान को "सबसे अहम हितों का केंद्र" बताया है और इस द्वीप को अपने नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग करने की संभावना को कभी खारिज नहीं किया है. ट्रंप ने कहा है कि शी ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से भरोसा दिलाया है कि जब तक ट्रंप पद पर हैं, चीन ताइवान पर हमला नहीं करेगा. उनसे पहले के राष्ट्रपति जो बाइडन ने बार-बार कहा था कि अगर चीन हमला करता है तो अमेरिका ताइवान की रक्षा करेगा, जबकि ट्रंप ने यह बताने से इनकार कर दिया है कि क्या वह ऐसा करेंगे.

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ताइवान के साथ जापान भी सक्रिय
- मंगलवार को बीजिंग में एक रक्षा मंच पर बोलते हुए, वाशिंगटन में चीन के पूर्व राजदूत कुई तियानकाई ने कहा कि ताइवान के साथ "पुनर्मिलन" से ऐसी स्थिरता आएगी जो "अमेरिका के हित में" है. ताइवान के एक सीनियर अधिकारी शेन यू-चुंग ने सोमवार को ताइपे में पत्रकारों को बताया कि समिट से पहले ताइवान की सरकार अमेरिकी पक्ष को अपनी बात साफ-साफ बता रही है. उन्होंने कहा, "हमें उम्मीद है... ऐसी कोई स्थिति नहीं बनेगी जिससे ताइवान को नुकसान हो."
- ताइवान के विदेश मंत्री लिन चिया-लुंग ने मंगलवार को कहा कि उन्हें उम्मीद है कि शी ताइवान का मुद्दा उठाएंगे, लेकिन वाशिंगटन ने बार-बार कहा है कि इस द्वीप के प्रति उसकी नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ है. जापान की पीएम सनाए ताकाइची शी के साथ ट्रंप की मुलाकात से पहले ट्रंप तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं. यह जानकारी जापान सरकार के दो सूत्रों ने दी है. सूत्रों में से एक ने बताया कि टोक्यो चाहता है कि ट्रंप ताइवान के मामले में स्थापित कूटनीतिक भाषा का पालन करें और इसे शिखर सम्मेलन का मुख्य मुद्दा न बनाएं, जैसा कि उन्होंने पिछली बार मई में बीजिंग में शी से मुलाकात के दौरान किया था.
- जापान की सत्ताधारी पार्टी के दो सीनियर नेताओं ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि जापान को सबसे बड़ा डर यह है कि ट्रंप, अमेरिकी सामान खरीदने के लिए चीन से वादा लेने के मकसद से ताइवान के मामले में नरम रुख अपना सकते हैं. यह एक ऐसी आर्थिक जीत होगी जिसे वे अहम मध्यावधि चुनावों से पहले वोटरों के सामने पेश कर सकते हैं.

तिब्बत की क्या है मांग
- 'इंटरनेशनल कैंपेन फॉर तिब्बत' (ICT) ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से अपील की है कि वे तिब्बत के मुद्दे पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर सार्वजनिक रूप से दबाव डालें और पंचेन लामा की रिहाई की मांग करें. संगठन ने तिब्बती समूहों की AI-आधारित निगरानी की खबरों पर भी चिंता जताई है. इस संगठन ने शी की प्रस्तावित वाशिंगटन यात्रा से पहले बुधवार (स्थानीय समय) को यह अपील जारी की. संगठन ने दलाई लामा के प्रतिनिधियों और चुने हुए तिब्बती नेताओं के साथ बिना किसी शर्त के बातचीत करने और उन नीतियों को खत्म करने की मांग की, जिन्हें उसने 'जबरन आत्मसात' करने वाली नीतियां बताया है.
- ICT की अध्यक्ष तेनचो ग्यात्सो ने कहा कि ट्रंप को इस बैठक का इस्तेमाल बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए. उन्होंने कहा, "इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप को इस नीति को बनाए रखना चाहिए और शी के साथ अपनी बैठक का इस्तेमाल चीन-तिब्बत बातचीत को फिर से शुरू करने के लिए दबाव डालने में करना चाहिए -- खासकर ऐसे अहम मोड़ पर, जब चीन का नया, तथाकथित 'जातीय एकता और प्रगति कानून' तिब्बती पहचान की नींव के लिए खतरा पैदा कर रहा है."
- ICT ने 11वें पंचेन लामा, गेधुन चोएकी न्यिमा और अन्य राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग की. अगर उनकी रिहाई नहीं होती है, तो संगठन ने बीजिंग से आग्रह किया कि वह अमेरिकी अधिकारियों को उनसे स्वतंत्र रूप से मिलने की अनुमति दे. संगठन ने कहा कि चीनी अधिकारियों ने उन्हें 31 साल से भी पहले गायब कर दिया था.

चीन पर लगाए गंभीर आरोप
एक अलग बयान में, ICT ने 'एन्थ्रोपिक थ्रेट इंटेलिजेंस' रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें दिसंबर 2025 और अगस्त 2026 के बीच उसके 'क्लाउड AI' (Claude AI) मॉडल के गलत इस्तेमाल का जिक्र है. इसने 'एथनिक यूनिटी एंड प्रोग्रेस लॉ' को रद्द करने की भी मांग की. ICT ने बौद्ध संस्थानों में राजनीतिक दखल, मठों में रहने की जगहों को तोड़ने और सरकारी बोर्डिंग स्कूलों के ज़रिए तिब्बती बच्चों को उनके परिवारों से अलग करने का आरोप लगाया. यह संगठन 28 अन्य मानवाधिकार समूहों के साथ मिलकर शी (जिनपिंग) को एक पत्र लिखने में शामिल हुआ, जिसमें उनसे विचारों के कारण जेल में बंद लोगों को रिहा करने और सीमा-पार दमन खत्म करने की अपील की गई. इन समूहों ने उन कानूनों में बदलाव की भी मांग की जिनका इस्तेमाल शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति, धार्मिक रीति-रिवाजों और असहमति को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए किया जाता है.
ICT के अनुसार, चीन में मौजूद और सरकार के करीबी लोगों ने सेंट्रल तिब्बती एडमिनिस्ट्रेशन, तिब्बती बौद्ध नागरिक समाज, ICT और 'स्टूडेंट्स फॉर ए फ्री तिब्बत' को निशाना बनाया. बयान में कहा गया है कि ऑपरेटर्स ने कई भाषाओं वाली सामग्री को चीनी भाषा की खुफिया फाइलों, संगठनात्मक डेटासेट और रोज़ाना की रिपोर्ट में बदलने के लिए 'क्लाउड' का इस्तेमाल किया. उन्होंने व्यक्तिगत जानकारी भी इकट्ठा की, सोशल मीडिया पर नज़र रखी और धार्मिक स्थलों के फ्लोर प्लान और संरचना से जुड़ी जानकारी जुटाई.
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