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तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे, भारत के लिए कैसा रहेगा रुख, क्या मायने?

Tarique Rahman Returns Bangladesh: बांग्लादेश में लंबे समय तक शासन करने वाले परिवार के उत्तराधिकारी और मौजूदा वक्त में यहां की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी के नेता, तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद वतन लौट आए हैं.

तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटे, भारत के लिए कैसा रहेगा रुख, क्या मायने?
Tarique Rahman Returns to Bangladesh: तारिक रहमान 17 साल बाद बांग्लादेश लौटें
  • बीमार पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौट आए हैं
  • तारिक रहमान आगामी फरवरी 2026 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के प्रमुख उम्मीदवार माने जा रहे हैं
  • बांग्लादेश में राजनीतिक माहौल संवेदनशील है और भारत के लिए इस चुनाव का क्षेत्रीय सुरक्षा महत्व है

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के कार्यवाहक अध्यक्ष तारिक रहमान आखिरकार 17 साल के वनवास के बाद अपने वतन लौट (Tarique Rahman Returns Bangladesh) आए हैं. बीमार पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के 60 वर्षीय बेटे रहमान आगामी फरवरी में होने वाले आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं. 17 साल तक खुद से लंदन में निर्वासन की जिंदगी गुजारने के बाद रहमान गुरुवार, 25 दिसंबर को बांग्लादेश पहुंचे हैं और इसके साथ BNP नेताओं और कार्यकर्ताओं का लंबा इंतजार खत्म हुआ है. यह हिंसा प्रभावित बांग्लादेश के लिए निर्णायक क्षण माना जा रहा है, जो उस फरवरी 2026 के महत्वपूर्ण चुनाव से ठीक पहले आया है, जो भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण है.

दिल्ली की नजर रहमान की वापसी पर करीबी से होगी क्योंकि उनका वापस लौटना न सिर्फ बांग्लादेश की राजनीति के लिए बल्कि भारत के लिए भी बहुत मायने रखता है. खासकर उस समय जब भारत समर्थक अवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया, शेख हसीना भारत में शरण लेने को मजबूर हैं और BNP की सुप्रीमो जिया खुद अस्पताल में भर्ती हैं.

जमात के सामने अब BNP भारत को उदार लगेगी

यह मौका संवेदनशील है. इस समय बांग्लादेश एक चौराहे पर खड़ा है. वहां कट्टरपंथी तत्व बेलगाम हो रहे हैं और अंतरिम प्रमुख मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में भारत विरोधी नफरत फैला रहे हैं. भारत की खास चिंता जमात-ए-इस्लामी को लेकर है है, जिसे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की कठपुतली माना जाता है. जमात पूरी तैयारी में है कि वो इस चुनाव में बाजी मार ले और बांग्लादेश में अपनी सरकार बना ले. उसने अपने नेतृत्व में 8 इस्लामी पार्टियों का गठबंधन भी बनाया है और सीटों का बंटवारा भी लगभग तय कर लिया है. वो शुरुआती बढ़त लेने की फिराक में है.

परिस्थिति ऐसी है कि भले BNP का ऐतिहासिक रूप से दिल्ली के साथ तनावपूर्ण संबंध रहा हो, मौजूदा वक्त में BNP को ही भारत अधिक उदार और लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देख रहा है. अवामी लीग का पत्ता पहले ही काटा जा चुका है और ऐसे में नई दिल्ली को उम्मीद होगी कि रहमान की वापसी से BNP कार्यकर्ताओं में जोश आएगा और पार्टी अगली सरकार बनाएगी. यहां दिल्ली के लिए स्थिति ऐसी है कि उसे दो बुरे में से कम बुरा चुनना है.

पाकिस्तान इसका ठीक उलट चाह रहा होगा. उसने हमेशा दो बुरे में से ज्यादा बुरा चुना है. शेख हसीना ने पाकिस्तान से सुरक्षित दूरी बनाए रखी थी लेकिन उनके तख्तापलट के बाद यूनुस के नेतृत्व में बांग्लादेश ने यू-टर्न ले लिया है. जिस भारत ने आजादी दिलाई, उसी से दूर होकर आज बांग्लादेश ने पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंधों पर जोर दिया है. जमात की सरकार आने पर यह साठगांठ और मजबूत होने का डर है.

भारत BNP को दे रहा ग्रीन सिग्नल

1 दिसंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने गंभीर रूप से बीमार खालिदा जिया के स्वास्थ्य पर चिंता जाहिर की थी और भारत के समर्थन की पेशकश की थी. जवाब में BNP ने भी ईमानदारी से आभार जताया. नई दिल्ली और BNP के बीच वर्षों में जैसे कठिन संबंध रहे हैं, उसके बाद यह राजनीतिक गर्मजोशी का एक दुर्लभ उदाहरण था. BNP भी चुनाव से पहले जमात के पिच पर नहीं खेलना चाहती. हाल ही में इकबाल मंच के नेता उस्मान हाद की हत्या के बाद बांग्लादेश में जिस तरह हिंसा देखी गई, जैसे एक हिंदू युवक की लिंचिंग कर उसकी हत्या की गई, BNP ने उसकी आलोचना की है. जमात से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.

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Ashutosh Kumar Singh
Chief Sub Editor
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