- नक्सली कमांडर देवजी ने 22 फरवरी को तेलंगाना पुलिस के सामने सरेंडर कर नक्सल मुक्त भारत की मुहिम को सफलता दिलाई.
- महाराष्ट्र के विधायक धर्मराव आत्राम का 1991 में माओवादी नक्सलियों ने अपहरण कर लिया था, जो चर्चित कांडों में है
- नक्सलियों ने विधायक आत्राम की रिहाई के लिए कैदियों की रिहाई और पुलिस कैंप हटाने जैसी मांगें सरकार से की थीं.
एक करोड़ के इनामी नक्सली कमांडर देवजी ने 22 फरवरी को तेलंगाना पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. देवजी का सरेंडर 'नक्सल मुक्त भारत' की मुहिम में बड़ी सफलता मानी जा रही है. देवजी माओवादी संगठन के शीर्ष कमांडर के साथ-साथ प्रमुख रणनीतिकार थे. देवजी का आतंक कई राज्यों में दशकों तक गुंजता रहा है. देवजी ने 1991 में महाराष्ट्र के विधायक धर्मराव आत्राम का अपहरण कर लिया था. यह महाराष्ट्र ही नहीं भारत के सबसे चर्चित नक्सली अपहरण कांडों में शामिल हैं. करीब दो हफ्ते तक विधायक बाबा आत्राम नक्सलियों के कब्जे में रहे. नक्सलियों की मांगों के सामने सरकार को झुकना पड़ा था, मांगे पूरी होने के बाद विधायक बाबा आत्राम की सुरक्षित रिहाई हुई थी. नक्सली देवजी के सरेंडर पर आज जानिए कांग्रेस विधायक बाबा आत्राम के अपहरण की वो कहानी, जिसने तब महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक नेताओं और अधिकारियों की नींद हराम कर दी थी.
महाराष्ट्र के विधायक बाबा आत्राम के अपहरण की कहानी
‘रघुवंशी, मैं चाहता हूँ कि तुम उसे किसी भी कीमत पर ज़िंदा ढूँढ निकालो. और अगर तुम उसे ज़िंदा नहीं ढूँढ सके, तो मुझे उसकी लाश के साथ कुछ नक्सलियों की लाशें भी देखनी चाहिए.' महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार के इस असाधारण कॉल ने एसपी कृषिपाल रघुवंशी की धड़कनें बढ़ा दीं. वह शायद अपनी गढ़चिरौली पोस्टिंग के बाद से सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे थे: सत्ताधारी कांग्रेस (I) पार्टी के मौजूदा विधायक धर्मराव आत्राम, जिन्हें बाबा आत्राम के नाम से भी जाना जाता था, उनका अपहरण. बाबा आत्राम कोई मामूली राजनेता नहीं थे; वह प्रतिष्ठित आत्राम परिवार से ताल्लुक रखते थे, जिनका गढ़चिरौली और उसके आसपास के इलाकों में गहरा प्रभाव और दबदबा था.
अहेरी विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले बाबा आत्राम की विरासत राजनीति से कहीं आगे थी. वह एक शिक्षाविद् भी थे और उन्होंने गढ़चिरौली को एक स्वतंत्र जिला बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. उनके अपहरण की खबर ने पूरे देश में हड़कंप मचा दिया, जिससे केंद्र में कांग्रेस पार्टी के बड़े नेताओं के बीच चिंता और बेचैनी पैदा हो गई. आत्राम की जबरदस्त साख और व्यापक प्रभाव ने स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा दिया था. विधायक को सुरक्षित वापस लाने के लिए कृषिपाल और उनकी टीम पर भारी दबाव था.

महाराष्ट्र के पूर्व विधायक धर्मराव आत्राम, जिनका 1991 में नक्सलियों अपहरण कर लिया था.
यह 1991 का साल था और संसदीय चुनावों की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को दो साल के अंतराल के बाद सत्ता में लौटने का पूरा भरोसा था. दो प्रधानमंत्री, वी. पी. सिंह और चंद्रशेखर, सरकार चलाने में असफल रहे थे और मध्यावधि चुनावों की घोषणा हो चुकी थी. राजीव गांधी अपनी पार्टी के प्रचार का नेतृत्व कर रहे थे और पूरे देश का दौरा कर रहे थे. केंद्र में सरकार बनाने का सपना देखने वाली किसी भी पार्टी या गठबंधन के लिए महाराष्ट्र बहुत महत्वपूर्ण था. यह राज्य लोकसभा में अड़तालीस सदस्य भेजता था, जो यूपी और अविभाजित बिहार के बाद तीसरे नंबर पर था.
जब राजीव गांधी ने अपहरण के बारे में सुना, तो उन्होंने मुख्यमंत्री पवार को फोन किया, जो कांग्रेस के सदस्य थे, और उनसे आत्राम की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने को कहा. राजीव गांधी को डर था कि अगर आत्राम चुनाव प्रचार के लिए उपलब्ध नहीं हुए, तो कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ेगा. अपनी पार्टी के अध्यक्ष के दबाव में, पवार ने पदानुक्रम और प्रोटोकॉल को दरकिनार करते हुए सीधे कृषिपाल से बात की और बचाव कार्यों की बारीकी से निगरानी कर रहे थे.

शरद पवार के साथ राजीव गांधी की तस्वीर.
यह घटना 27 अप्रैल 1991 की दोपहर को शुरू हुई. विदर्भ क्षेत्र का राजनीतिक तापमान भी मौसम की तरह गर्म था. आत्राम अपनी पार्टी के उम्मीदवार शांताराम पोटदुखे के लिए एक चुनावी सभा को संबोधित करने मेदपल्ली गाँव गए थे. आत्राम को उसी दिन एक पार्टी कार्यकर्ता की शादी में भी शामिल होना था. दिन भर में दो बड़े कार्यक्रमों की वजह से गाँव में 1,000 से ज़्यादा लोगों की भीड़ जमा थी.
आत्राम और उनके मामा रामचंद्र तालाटे ग्रामीणों से बातचीत करने के लिए एक स्कूल के पास रुके. अचानक, स्वचालित हथियार लिए पाँच आदमी भीड़ से निकले और आत्राम और तालाटे को अपने साथ चलने को कहा. ग्रामीणों ने इसका विरोध किया और हथियारबंद लोगों को घेर लिया, और आत्राम को ले जाने से मना कर दिया. गुस्साई भीड़ नक्सलियों को पीटने ही वाली थी कि उन लोगों ने नागरिकों की ओर अपनी राइफलें तान दीं और गोली चलाने की धमकी दी.
खून-खराबे के डर से आत्राम ने ग्रामीणों को शांत किया और कहा कि वह हथियारबंद लोगों के साथ जाने के लिए तैयार हैं. भीड़ ने उनकी बात मान ली और नक्सली उन दोनों को गाँव के बाहर ले गए, जहाँ हरी वर्दी में बीस और हथियारबंद आदमी इंतज़ार कर रहे थे. कुछ ग्रामीणों ने उनका पीछा किया लेकिन जब नक्सलियों ने उन्हें धमकाया तो वे पीछे हट गए. तब तक आत्राम को समझ आ गया था कि उनका अपहरण पीडीडब्ल्यूजी ने किया है.
आत्राम इस घटना से सदमे में थे. उन्होंने कभी भी नक्सलियों के खिलाफ कोई काम नहीं किया था और न ही उन्हें उकसाने वाली कोई बात कही थी, इसलिए वह कभी उनके निशाने पर नहीं रहे. आदिवासी आबादी के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए यह माना जाता था कि नक्सली उन्हें कभी नुकसान नहीं पहुँचाएँगे. अब तक नक्सलियों ने आदिवासियों के गुस्से से बचने के लिए आत्राम परिवार के किसी भी सदस्य को हाथ नहीं लगाया था. लेकिन अब उन्होंने अपना ही बनाया नियम तोड़ दिया था.
हालाँकि आत्राम के मामा को कुछ घंटों के बाद छोड़ दिया गया, लेकिन वह खुद कैद में ही रहे. जल्द ही अपहरणकर्ताओं ने एक पर्चे के ज़रिए अपनी माँगें सामने रखीं. उनकी मुख्य माँग शिवन्ना नाम के एक नक्सली और सोलह अन्य कैदियों की रिहाई थी. इसके अलावा वे चाहते थे कि जंगल के कुछ इलाकों से पुलिस कैंप हटा दिए जाएं और पुलिस कार्रवाई में क्षतिग्रस्त हुए एक माओवादी स्मारक को दोबारा बनाया जाए.
पेरमिली दलम के सदस्य शिवन्ना को तीन साल पहले कड़े आतंकवाद और विध्वंसक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (टाडा) के तहत गिरफ्तार किया गया था. कई सरकारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों की हत्या में शामिल होने के अलावा वह अपने समूह का पैसा भी संभालता था. शिवन्ना ने बांस के ठेकेदारों से भारी वसूली की थी और प्रति टन बांस पर 10 रुपये तक की माँग की थी. वह बांस ठेकेदारों और उनके मज़दूरों के साथ बदतमीज़ी से बात करने के लिए जाना जाता था.
एक बार जब उसने कुछ मज़दूरों के साथ दुर्व्यवहार किया, तो उन्होंने पुलिस को उसके ठिकाने की सूचना दे दी. जाल बिछाया गया. जब शिवन्ना चंद्रपुर में पैसे लेने आया, तो उसे हिरासत में ले लिया गया. इतने महत्वपूर्ण नेता की गिरफ्तारी स्थानीय नक्सली आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका थी.
महाराष्ट्र में नक्सलियों ने अपनी माँगें मनवाने के लिए महत्वपूर्ण व्यक्तियों का अपहरण करने का यह तरीका बार-बार अपनाया था. कुछ दिन पहले ही पीडीडब्ल्यूजी के सदस्यों ने एक जूनियर सरकारी इंजीनियर और एक अन्य अधिकारी का अपहरण कर लिया था. एक अन्य घटना में पीडीडब्ल्यूजी कैडरों ने पड़ोसी भंडारा जिले के एक कांस्टेबल को बंधक बना लिया था. माँगें पूरी होने के बाद उन्होंने उसे छोड़ दिया. हालाँकि यह पहली बार था जब इतने बड़े कद के किसी राजनेता का उनके द्वारा अपहरण किया गया था.
आत्राम के अपहरण के समय कृषिपाल अपने वरिष्ठ अधिकारियों से मिलने नागपुर में थे. घटना के बारे में वायरलेस संदेश मिलने के बाद वह तुरंत गढ़चिरौली वापस भागे. कृषिपाल को आश्चर्य हुआ कि नक्सलियों ने आत्राम का अपहरण किया है. अफवाहों के अनुसार विधायक ने अपना पिछला चुनाव उनके समर्थन से जीता था.
चुनाव प्रक्रिया के साथ नक्सलियों का रिश्ता अजीब था. वे चुनावों का विरोध करते थे और मतदान और गिनती के दिनों में हिंसा करते थे. उनकी नज़रों में चुनाव वर्ग शत्रुओं को मज़बूत करने का एक छद्म लोकतांत्रिक तरीका मात्र था. दूसरी ओर वे उन उम्मीदवारों से पैसा लेने को तैयार थे जो उनकी मंज़ूरी चाहते थे. असल में उम्मीदवार गढ़चिरौली में तभी प्रचार कर सकते थे जब वे पैसे दें.

कृषिपाल ने अंदाज़ा लगाया कि शायद आत्राम नक्सलियों से किए गए कुछ वादे पूरे करने में विफल रहे होंगे, जिसकी वजह से उनका अपहरण हुआ. हालाँकि आत्राम ने लगातार इस बात से इनकार किया था कि उन्हें नक्सलियों का कोई समर्थन मिला है और उनका कहना था कि यह उनके विरोधियों द्वारा फैलाई गई एक झूठी कहानी है.
गढ़चिरौली पहुँचते ही कृषिपाल ने नक्सल विरोधी विशेष बल सी-60 कमांडो को अपने कार्यालय में बुलाया. उनमें से कुछ को अपहरण को लेकर संदेह था. ‘सर, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि नक्सली कभी बाबा आत्राम का अपहरण करेंगे. यह पूरी घटना सोची-समझी लगती है. क्या आपको लगता है कि यह आपसी सहमति वाला अपहरण हो सकता है?' एक कमांडो ने पूछा. आपसी सहमति वाले अपहरण वे मामले होते हैं जहाँ अपहरणकर्ता और अपहृत व्यक्ति मिले हुए होते हैं और किसी गुप्त मक़सद के लिए मिलकर काम करते हैं.
कृषिपाल ने कड़ाई से जवाब दिया, ‘तुम सही हो सकते हो. हमें जो शुरुआती जानकारी मिली है वह संदिग्ध लग सकती है, लेकिन हम इसे फर्जी मामला मानकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकते. कागज़ों पर एक विधायक को नक्सलियों ने बंदूक की नोक पर अगवा किया है और हमें उनके ठिकाने का पता नहीं है. उन्हें ढूँढना हमारी ज़िम्मेदारी है. उनकी जान सचमुच खतरे में हो सकती है. अगर उन्हें कुछ हो गया, तो हमारी बदनामी होगी.'
इस बीच कृषिपाल के कुछ वरिष्ठ अधिकारी आगे की कार्रवाई पर चर्चा करने के लिए अल्लापल्ली पहुँच गए थे. उन्होंने आत्राम का पता लगाने के लिए उपलब्ध सभी पुलिस कर्मियों को तैनात करने का फैसला किया. सी-60 टीम के अलावा कृषिपाल के पास एसआरपी की सात कंपनियाँ मौजूद थीं. उन्हें अतिरिक्त जवान और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की एक कंपनी भी दी गई.
उनके तहत विभिन्न कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कुल चौबीस कंपनियाँ तैनात की गईं. चूँकि आत्राम के अल्लापल्ली के पास होने की संभावना थी, इसलिए अभियान का बेस कैंप वहाँ वन विभाग के गेस्ट हाउस में बनाया गया. डीजीपी ने कृषिपाल के दो वरिष्ठों, आईजी और डीआईजी को कैंप में मौजूद रहने के लिए कहा.

तेलंगाना पुलिस के सामने नक्सली देवजी के सरेंडर के दौरान की तस्वीर.
आमतौर पर इस तरह के ऑपरेशनों से पहले टोपोग्राफिक मैप (नक्शों) की मदद ली जाती थी, जिससे पूरे इलाके का बारीकी से अंदाज़ा मिल जाता था. लेकिन इतने कम समय में कोई टोपो-शीट उपलब्ध नहीं थी, इसलिए कृषिपाल को बचाव की योजना बनाने के लिए पूरी तरह से इंसानी जानकारी (ह्यूमन इंटेलिजेंस) पर निर्भर रहना पड़ा. कुछ अधिकारियों को जानकारी जुटाने के काम पर लगाया गया, जबकि अन्य ने जंगल के अंदर तलाशी शुरू की.
कृषिपाल की टीम को आत्राम की लोकेशन के बारे में अलग-अलग और उलझाने वाली खबरें मिल रही थीं. एक मुखबिर ने दावा किया कि उसने आत्राम को किडनैपर्स के साथ अल्लापल्ली के उत्तर की ओर देखा है, जबकि दूसरे का कहना था कि वे दक्षिण में थे. कृषिपाल को समझ आ गया कि यह ऑपरेशन कई दिनों तक खिंच सकता है, इसलिए उन्होंने अपने जवानों को दिन और रात की शिफ्टों में बाँट दिया.
हालाँकि नक्सलियों ने अपनी माँगें मानने के लिए सरकार को केवल एक दिन का समय दिया था, लेकिन पुलिस बातचीत से अलग अपने स्तर पर ऑपरेशन के फैसले ले रही थी. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के नागपुर कार्यालय से टोपो-शीट मँगवाने में ही उन्हें दो दिन लग गए.
जब पुलिस लगातार जंगलों की खाक छान रही थी, आत्राम और उनके अपहरणकर्ता केवल अंधेरा होने के बाद ही आगे बढ़ते थे. वे दिन के समय छिपे रहते थे और बारी-बारी से पुलिस की हलचल पर नज़र रखते थे. नक्सलियों का अपना खुफिया नेटवर्क था जो उन्हें सर्च पार्टियों के पास आने पर सतर्क कर देता था. कुछ मौके ऐसे भी आए जब पुलिस इतनी करीब आ गई थी कि आत्राम उन्हें देख सकते थे, लेकिन वह मदद के लिए पुकार नहीं सकते थे क्योंकि जब भी कोई पुलिस टीम आसपास होती, उनके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया जाता था.

हालाँकि, किडनैपर्स ने आत्राम को प्रताड़ित नहीं किया और उनके साथ विनम्रता से व्यवहार किया, यहाँ तक कि उन्हें वही खाना दिया जो वे खुद खाते थे. आत्राम के लिए इकलौती परेशानी बहुत ज़्यादा पैदल चलना था. नक्सली लगातार ठिकाने बदलते रहते थे और हर रोज़ तीस से चालीस किलोमीटर जंगल पार करते थे. एक बार जब वे मध्य प्रदेश की सीमा पर पहुँचे, तो उन्होंने फिर से अपना रास्ता बदल लिया और किसी दूसरी जगह की ओर निकल गए.
भले ही नक्सलियों ने उन्हें डराया या उनके साथ बदतमीज़ी नहीं की थी, लेकिन आत्राम को डर था कि अगर माँगें पूरी नहीं हुईं तो उन्हें मार दिया जाएगा. दलम कमांडर को उनके ठिकानों पर आने वाले मुखबिरों के ज़रिए हर हलचल की जानकारी मिल रही थी. जब मुखबिरों ने उसे बताया कि सरकार उनकी माँगों पर विचार करने में समय ले रही है, तो वह गुस्से में गालियाँ बकने लगता था. ऐसे मौकों पर कमांडर का गुस्से से भरा चेहरा देखकर आत्राम बुरी तरह डर जाते थे. उन्हें यह भी डर था कि नक्सलियों और पुलिस के बीच होने वाली मुठभेड़ में वह कहीं क्रॉसफ़ायर का शिकार न हो जाएँ.
रविवार की समय-सीमा गुज़र जाने के बाद भी सरकार ने माँगों पर कोई फैसला नहीं लिया था. बदले में नक्सलियों की तरफ से भी आत्राम की स्थिति के बारे में कोई खबर नहीं थी. जब तलाशी दल के हाथ कुछ नहीं लगा, तो पुलिस ने नक्सलियों से अपील जारी की और कुछ और समय माँगा. रोज़ाना आने वाले अखबारों ने सरकार की सुस्ती की आलोचना की और विपक्षी दलों ने इस तनाव का फायदा उठाया.
पूर्व सांसद और जनता दल के नेता विश्वेश्वर राव ने मुख्यमंत्री पवार के इस्तीफे की माँग करते हुए कहा कि "कांग्रेस को स्थिर सरकार देने का दावा करने का कोई हक नहीं है, जब वह अपने ही विधायक को सुरक्षा नहीं दे पा रही है." बीजेपी नेता सुधीर मुनगंटीवार ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि "आत्राम का अपहरण राज्य की प्रशासनिक मशीनरी के ठप हो जाने का नतीजा है."
2 मई को, आत्राम के अपहरण के विरोध में विभिन्न संगठनों द्वारा नागपुर बंद का आह्वान किया गया. उस दिन बाज़ार, स्कूल, कॉलेज, भोजनालय और बस सेवाएँ पूरी तरह बंद रहीं. भाजपा नेता प्रकाश जावड़ेकर ने मांग की कि चुनावों के दौरान केंद्र सरकार के सुरक्षा बलों को तैनात किया जाए, क्योंकि सुरक्षा के लिए महाराष्ट्र पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता था. उन्हें डर था कि नक्सली खतरे के कारण लोग वोट डालने बाहर नहीं निकलेंगे.

स्थिति और भी नाज़ुक होती जा रही थी. मुख्यमंत्री तलाशी अभियान की प्रगति जानने के लिए कृषिपाल को हर रोज़ दो बार फोन करते थे. पवार एक जनसभा को संबोधित करने के लिए अहेरी जाने वाले थे. अपनी यात्रा से पहले, उन्होंने कृषिपाल को फोन किया और गंभीरता से पूछा, "मुझे बिना किसी झिझक के बताओ, क्या आत्राम को अड़तालीस घंटों के भीतर छुड़ाना मुमकिन है? अगर हाँ, तो मैं सभा में इसका ऐलान कर दूँगा."
कृषिपाल जानते थे कि वह ऐसा कोई वादा नहीं कर सकते. ‘सर, हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं लेकिन मैं आपको इस बारे में कोई आश्वासन नहीं दे सकता कि बचाव में कितना समय लगेगा.' तभी पवार ने उनसे कहा कि अगर आत्राम ज़िंदा नहीं मिले, तो उनकी लाश के साथ कुछ नक्सलियों की लाशें भी मिलनी चाहिए.
कई दिनों तक लुकाछिपी का खेल चलता रहा. करीब दो हफ्ते बाद सरकार ने नक्सलियों की मांगों को मान लिया. जिसके बाद विधायक बाबा आत्राम की सकुशल रिहाई हो सकी थी. नक्सलियों के साथ बीते विधायक बाबा आत्राम के इन दिनों पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनी है.
यह भी पढ़ें - देवजी-मल्ला राजिरेड्डी सरेंडर के बाद अब कितने नक्सली बचे, 31 मार्च 2026 से पहले किनका हुआ खात्मा?
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं