- अमेरिका और ईरान के टकराव के कारण भारत में रुपया कमजोर हुआ और विदेशी निवेशकों ने बाजार से पैसा निकाला.
- मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई, जिससे भारत के आयात खर्च में वृद्धि हुई.
- ईंधन और गैस सिलेंडरों की कमी के कारण घरेलू आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे आम जनता की जीवनशैली बाधित हुई
अमेरिका-ईरान टकराव भले भारत से दूर हुआ, लेकिन इसके आर्थिक झटके सीधे देश के अंदर महसूस किए गए. करीब 40 दिनों में हालात ऐसे बदले कि रुपया दबाव में आ गया, कच्चा तेल महंगा हो गया और शेयर बाजार बार-बार डगमगाया. यानी बिना जंग लड़े भी भारत को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी.
रुपया: दबाव में फिसलती अर्थव्यवस्था की झलक
जंग के दौरान जैसे ही वैश्विक अनिश्चितता बढ़ी, विदेशी निवेशकों ने उभरते बाजारों से पैसा निकालना शुरू कर दिया. इसका असर भारतीय रुपये पर साफ दिखा, जो डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ. रुपये की कमजोरी का मतलब है कि आयात महंगा हो जाता है, जिससे महंगाई का दबाव बढ़ता है. यानी आम आदमी से लेकर सरकार तक, हर किसी पर इसका असर पड़ा.
कच्चा तेल: भारत की सबसे बड़ी चिंता
मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए हर डॉलर की बढ़ोतरी सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डालती है. तेल महंगा होने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ट्रांसपोर्ट से लेकर रोजमर्रा के सामान तक सब कुछ महंगा हो जाता है.
यह भी पढ़ें- अमेरिका और ईरान की जंग 2 हफ्ते के लिए रुकी, सीजफायर पर राजी दोनों देश, होर्मुज भी खुला
शेयर बाजार: डर और अनिश्चितता का असर
जंग के माहौल में शेयर बाजार हमेशा सबसे पहले प्रतिक्रिया देता है. इस दौरान भी निवेशकों में घबराहट दिखी और बाजार में बिकवाली बढ़ी. सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट आई, खासकर बैंकिंग, एविएशन और FMCG सेक्टर दबाव में रहे. हालांकि बाद में कुछ सुधार हुआ, लेकिन बाजार में अस्थिरता लगातार बनी रही.
भारत की जेब पर ‘ट्रिपल मार'
इन 40 दिनों में भारत को एक साथ तीन तरफ से झटका लगा- महंगा होता आयात (तेल), कमजोर होती मुद्रा (रुपया) और डगमगाता निवेश (शेयर बाजार). ये एक तरह की ‘ट्रिपल मार' थी, जिसने अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाया, भले ही देश सीधे जंग में शामिल नहीं था.
फिर भी क्यों नहीं बिगड़े हालात पूरी तरह?
इन चुनौतियों के बावजूद भारत की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण से बाहर नहीं गई. इसके पीछे रिजर्व बैंक की सक्रियता, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार और अलग-अलग देशों से तेल खरीदने की रणनीति रही. साथ ही, घरेलू मांग मजबूत होने से अर्थव्यवस्था को सहारा मिला.
सिर्फ आर्थिक ही नहीं, भारत ने जान का नुकसान भी झेला
इस युद्ध की कीमत भारत ने सिर्फ आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि मानवीय स्तर पर भी चुकाई. संसाधनों पर भारी दबाव पड़ा, विकास कार्य प्रभावित हुए और देश की अर्थव्यवस्था को झटका लगा. लेकिन इन आंकड़ों से कहीं बड़ी कीमत वह थी, जो आम लोगों और सैनिकों ने अपने खून से अदा की. युद्ध के दौरान जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया और परिवारों को अपूरणीय क्षति झेलनी पड़ी. इस जंग में मारे गए या घायल होने वालों में भारतीय भी शामिल थे.
यह भी पढ़ें- ट्रंप झुके या मोज्तबा? ईरान और अमेरिका के बीच आखिरी घंटों में संघर्षविराम पर कैसे बनी बात, जानें इनसाइड स्टोरी
पेट्रोल और गैस सिलेंडर की किल्लत से भी जूझा भारत
भारत में इस दौरान पेट्रोल और गैस सिलेंडर को लेकर भी आपदा जैसी स्थिति देखने को मिली. आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से ईंधन की कमी पैदा हुई, जिससे आम लोगों की रोजमर्रा की ज़िंदगी बुरी तरह प्रभावित हुई. कई जगहों पर लंबी कतारें लगीं, कालाबाजारी बढ़ी और कीमतों में तेज उछाल आया. परिवहन, खेती और छोटे उद्योगों पर इसका सीधा असर पड़ा, जिससे पहले से दबाव में चल रही अर्थव्यवस्था और कमजोर हुई.
गैस सिलेंडरों की कमी ने घरेलू मोर्चे पर संकट खड़ा कर दिया. कई घरों में चूल्हा जलाना मुश्किल हो गया और लोगों को वैकल्पिक, असुरक्षित साधनों का सहारा लेना पड़ा.
यह भी पढ़ें- 'सब जगह फायरिंग रुकी...' अमेरिका, इजरायल, ईरान के बीच युद्धविराम, जानें- जंग थमने पर किसने क्या कहा?
ये 40 दिन एक बार फिर दिखाते हैं कि आज की वैश्विक दुनिया में कोई भी जंग सीमित नहीं रहती. उसका असर सीमाओं से बाहर निकलकर हर देश की अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं