पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इस वक्त हालात बेहद तनावपूर्ण हैं. आगामी 27 जुलाई को होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पूरा इलाका सुलग उठा है. इस बवाल की सबसे बड़ी जड़ हैं वहां की विधानसभा में शरणार्थियों के नाम पर आरक्षित 12 सीटें. इन सीटों को लेकर स्थानीय जनता और ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) सड़क पर है. विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं. अब तक 30 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और 200 से ज्यादा लोग घायल हैं. स्थानीय लोगों का साफ आरोप है कि 'आजाद कश्मीर' के नाम पर पाकिस्तान यहां लोकतंत्र का सिर्फ ढोंग रच रहा है.
12 आरक्षित सीटें के जरिए चुनावी धांधली का पूरा गणित
दरअसल, पीओके की कुल 45 विधानसभा सीटों में से 12 सीटें उन शरणार्थियों (रिफ्यूजियों) के लिए आरक्षित हैं, जो 1947 के बाद जम्मू-कश्मीर से विस्थापित होकर पाकिस्तान के अन्य हिस्सों (जैसे पंजाब) में जाकर बस गए थे. स्थानीय कश्मीरी जनता और आंदोलनकारियों की मांग है कि इन 12 आरक्षित सीटों को तुरंत खत्म किया जाए.
'आजाद कश्मीर' का दिखावा
कहने को पाकिस्तान इसे 'आजाद जम्मू और कश्मीर' (AJK) कहता है और इसकी अपनी एक अलग पहचान दिखाता है, लेकिन असलियत इसके बिल्कुल उलट है. पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 1 में देश के चार प्रांतों (पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा) का जिक्र है, लेकिन इसमें पीओके का कोई नाम नहीं है. इसे पाकिस्तान की संसद में भी कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला हुआ है.
पीओके का शासन 'आजाद कश्मीर अंतरिम संविधान अधिनियम 1974' के तहत चलाया जाता है. यहां कहने को एक राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री होते हैं, लेकिन उनके पास कोई वास्तविक पावर नहीं है. असली ताकत 'कश्मीर काउंसिल' के हाथ में होती है. इसका मुखिया खुद पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होता है. इस 14 सदस्यीय काउंसिल में पाकिस्तान सरकार का सीधा नियंत्रण होता है.

पाकिस्तान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई के खिलाफ विदेशों में भी प्रदर्शन हो रहे हैं.
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जबरन वफादारी की शर्त
पीओके के चुनाव और वहां के संविधान में लोकतंत्र का सबसे बड़ा मज़ाक इसकी एक अजीबोगरीब शर्त है. PoK के नियम के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति या पार्टी तब तक चुनाव नहीं लड़ सकती या राजनीति नहीं कर सकती, जब तक वह पाकिस्तान में विलय की विचारधारा का समर्थन न करे. चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार को एक हलफनामे पर दस्तखत करके पाकिस्तान के प्रति वफादारी की कसम खानी पड़ती है. जो ऐसा नहीं करता, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है.
दूसरी तरफ, भारत का इस पूरे क्षेत्र पर स्टैंड हमेशा से बेहद कड़ा और स्पष्ट रहा है. 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था. इस ऐतिहासिक प्रस्ताव में साफ कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और रहेगा. पाकिस्तान को भारत के उन सभी हिस्सों को तुरंत खाली करना होगा, जिन पर उसने अवैध और जबरन कब्जा कर रखा है.
संसाधनों का बंदरबांट
स्थानीय समुदायों में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्से की एक बड़ी वजह आर्थिक शोषण भी है. पीओके प्राकृतिक संसाधनों, जंगलों और कीमती खनिजों (जैसे संगमरमर, ग्रेफाइट और रत्नों) से समृद्ध है. यह क्षेत्र पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली के जरिए पंजाब और सिंध के खेतों के लिए 70% सिंचाई का पानी देता है. इसके अलावा, पाकिस्तान की कुल बिजली का 10 से 15 प्रतिशत हिस्सा यहीं के हाइड्रोपावर (जलविद्युत) प्रोजेक्ट्स से आता है.

PoK खूबसूरत वादियों का इलाका है. यहां नीलम घाटी, हुंजा घाटी और शौन्टर घाटी जैसे मशहूर पर्यटन स्थल है.
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कुपोषण और बदहाली से त्रस्त है जनता
पाकिस्तान के इस राजनीतिक ड्रामे और शोषण का सबसे दर्दनाक असर वहां की आम जनता की सेहत और जिंदगी पर पड़ रहा है. हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीओके की लगभग 66% आबादी खेती और पशुपालन पर निर्भर है, लेकिन वे भयंकर बदहाली में जी रहे हैं. इस क्षेत्र की लगभग 29% आबादी गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार है. ये पाकिस्तान के राष्ट्रीय औसत (19.9%) से कहीं ज्यादा है. पहाड़ी इलाकों में रहने वाले 90% परिवारों के पास खाद्य सुरक्षा नहीं है.
बच्चों की स्थिति तो और भी भयावह है. पीओके में 5 साल से कम उम्र के 39% बच्चों का शारीरिक विकास रुक चुका है और 14% बच्चे कम वजन के हैं. यही नहीं, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के कारण यहां प्रति 1000 जीवित बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 47 है, जबकि मातृ मृत्यु दर भी प्रति 1,00,000 पर 104 है.
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