संविधान की 10वीं अनुसूची की व्याख्या को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. ये चुनौती सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने दी है. कपिल सिब्बल की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और कहा कि इस मामले में कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर संसद को विचार करने की जरूरत है.
कपिल सिब्बल ने यह अर्जी ऐसे समय दाखिल की है, जब आम आदमी पार्टी (AAP) के 7, तृणमूल कांग्रेस के 20 और शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों ने बीजेपी और अलग-अलग पार्टियों में मर्जर कर लिया था.
सिब्बल ने कहा कि इस मुद्दे का हमारी राजनीति पर बहुत बड़ा असर पड़ता है, क्योंकि इस नियम की वजह से एक माइनॉरिटी पार्टी मैजोरिटी बन सकती है, जबकि एक मैजोरिटी पार्टी माइनॉरिटी बन सकती है.
सिब्बल ने क्या-क्या दलील दी?
यह पूरा मामला संविधान की 10वीं अनुसूची से जुड़ा है. इसमें दल-बदल विरोधी कानून शामिल है, जिसका मकसद चुने हुए विधायकों या सांसदों को चुनाव जीतने के बाद पाला बदलने से रोकना है.
कपिल सिब्बल की याचिका विपक्षी पार्टियों के विलय से जुड़े मुद्दों से जुड़ी है. उन्होंने 10वीं अनुसूची की उस व्याख्या को चुनौती दी है, जिसके तहत अलग हुए गुट विलय का रास्ता अपनाकर दल-बदल विरोधी कानून से बच सकते हैं.
सिब्बल का कहना है कि क्या संसद का ढांचा इस तरह बदला जा सकता है जैसे इस देश में हो रहा है, फिर इसमें 10वीं अनुसूची के पैराग्राम 4 का क्या मतलब है?
उन्होंने अपनी अर्जी में कहा है, 'यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें यह डिक्लेयर करने की मांग की गई है कि 10वीं अनुसूची के पैरा 4 का मतलब यह नहीं है कि लेजिस्लेचर पार्टी के दो-तिहाई सदस्य किसी भी 'मर्जर' से डिसक्वालिफिकेशन से बच सकते हैं, जब राजनीतिक पार्टी के ज्यादातर सदस्यों ने किसी दूसरी पार्टी के साथ मर्ज नहीं किया है या मर्ज करने की कोई कोशिश नहीं की है.'
उन्होंने कहा कि ये संविधान के बुनियादी ढांचे का गंभीर उल्लंघन है, क्योंकि इसने असल में 'थोक दल-बदल', 'राजनीतिक पार्टियों को तोड़ने' और 'खरीद-फरोख्त' को बढ़ावा देने वाले पॉलिटिकल कल्चर को बढ़ावा दिया है, जिसके जरिए गैर-कानूनी तरीकों से डेमोक्रेटिक मैंडेट को पलट दिया जाता है.
सिब्बल ने यह भी कहा कि '10वीं अनुसूची दल-बदल को खत्म करने और चुनावी ईमानदारी को बचाने की अपनी कोशिश में पूरी तरह नाकाम रही है, क्योंकि 10वीं अनुसूची में कुछ अपवादों ने इस नियम को पूरी तरह खत्म कर दिया है.'
उन्होंने हालिया राजनीतिक घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि अगर मौजूदा ट्रेंड जारी रहा तो 10वीं अनुसूची के तहत दल-बदल विरोधी कानून बेअसर हो जाएगा.
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सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र को नोटिस जारी करते हुए कहा कि इसमें कई मुद्दे शामिल हैं जिन पर संसद को विचार करना होगा.
जस्टिस नरसिम्हा ने कहा, 'ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें आम तौर पर सदन में उठाया जाता है. अगर नहीं, तो किसी पॉलिटिकल पार्टी के सामने. 10वीं अनुसूची का मकसद एक मैकेनिज्म को रेगुलेट करना था. हम इसे देख रहे हैं. इसमें कई और मुद्दे भी शामिल हैं.'
क्या है 10वीं अनुसूची?
1960-70 के दशक में जब भारतीय राजनीति में बड़े पैमाने पर दल-बदल हो रहा था तो इसे रोकने के लिए दल-बदल विरोधी कानून लाया गया था.
1985 में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में 52वां संशोधन किया था और 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. इसे संविधान के अनुच्छेद 102 में शामिल किया गया है.
10वीं अनुसूची में बताया गया है कि किसी सांसद या विधायक की सदस्यता कब जा सकती है और कब नहीं. 10वीं अनुसूची कहती है कि अगर कोई सांसद या विधायक मर्जी से अपनी पार्टी छोड़ता है या फिर अपनी पार्टी की ओर से जारी व्हिप का उल्लंघन करता है. अगर कोई सांसद या विधायक किसी विषय पर वोटिंग के दौरान अपनी पार्टी के आदेशों को पालन न करे या वोटिंग से गैर-हाजिर रहे तब भी उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.
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पैरा 4 क्या कहता है?
कपिल सिब्बल ने अपनी याचिका में 10वीं अनुसूची के पैरा 4 की व्याख्या को चुनौती दी है. यही वह पैरा है जो 'मर्जर' पर दल-बदल विरोधी कानून को लागू करने से रोकता है.
10वीं अनुसूची का पैरा 4 कहता है कि अगर किसी राजनीतिक पार्टी का किसी दूसरी पार्टी में मर्जर हो जाए और उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई विधायक या सांसद इस विलय के पक्ष में हों तो सदस्यता नहीं जाएगी.
इसी अपवाद के कारण एक पार्टी के दो-तिहाई सांसद या विधायक टूटकर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं और उनकी सदस्यता भी बनी रहती है.
कपिल सिब्बल ने अपनी याचिका में पैरा 4 की व्याख्या करने की मांग की है. उन्होंने मांग की है कि यह घोषित किया जाए कि 10वीं अनुसूची के पैरा 4 का मतलब यह नहीं है कि पार्टी के दो-तिहाई सदस्य किसी भी 'मर्जर' से 'अयोग्यता' से बच सकते हैं, खासकर तब जब पार्टी के ज्यादातर सदस्यों ने दूसरी पार्टी के साथ मर्ज नहीं किया है.
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