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पेरिस के किंडरगार्टन में स्कूल सहायक ने मासूम बच्चे का किया रेप, अब देश भर में हो रही जांच

आंकड़े बताते हैं कि फ्रांस में हर साल करीब 1.60 लाख बच्चे इस तरह के यौन शोषण का शिकार होते हैं. फ्रांस में तीन साल की उम्र से नर्सरी स्कूल जाना अनिवार्य है.

पेरिस के किंडरगार्टन में स्कूल सहायक ने मासूम बच्चे का किया रेप, अब देश भर में हो रही जांच
प्रतीकात्मक तस्वीर
Pixabay

पेरिस में एक सुबह एक तीन साल का बच्चा अपने स्कूल के बाहर कांपता हुआ खड़ा था. उसने अपनी मां से कह दिया वह स्कूल के अंदर नहीं जाएगा. मां उसकी ऐसा हालत देखकर सहम गई. आखिरकार स्कूल के प्रिंसिपल बाहर आए और बच्चे को जबरदस्ती स्कूल के भीतर ले गए. उस वक्त तो किसी को कुछ समझ नहीं आया कि आखिर हुआ क्या. लेकिन बाद में पता चला कि बच्चे के साथ स्कूल में कथित तौर पर बलात्कार होता था और ये हैवानियत स्कूल के निगरानीकर्ता (स्कूल सहायक या स्कूल मॉनिटर) ने किया.

अब आरोपी स्कूल मॉनिटर के खिलाफ मंगलवार (26 मई 2026) को अदालत में मुकदमा शुरू हो गया. पेरिस में हाल के दिनों में बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के कई मामले सामने आने के बाद यह पहला ऐसा मुकदमा है, जिसकी खुली अदालत में जनसुनवाई हो रही है. इस मामले ने पूरे पेरिस को हिलाकर रख दिया है और माता-पिता अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद खौफजदा हैं.

दरअसल, पिछले कुछ महीनों में पेरिस के कई स्कूलों से ऐसी शिकायतें आई हैं, जहां क्लास के बाहर जैसे लंच ब्रेक (रिसेस) या छुट्टी के वक्त बच्चों की देखभाल करने वाले सुपरवाइज़रों पर ही मासूमों के साथ मारपीट और यौन शोषण के गंभीर आरोप लगे हैं. इस पूरे विवाद के बीच पेरिस के नए मेयर इमैनुएल ग्रेगोइरे ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है. मेयर खुद भी बचपन में इस तरह के दर्द से गुजर चुके हैं, इसलिए उन्होंने इस मामले में दर्जनों कर्मचारियों को सस्पेंड करने का आदेश जारी किया है.

अदालत में आरोपी की हुई पेशी 

इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी 36 साल का डेविड जी. है. वह पेशे से एक फ्रीलांस पत्रकार है और तंगी के दिनों में जेबखर्च चलाने के लिए किंडरगार्टन में स्कूल सहायक की नौकरी कर रहा था. डेविड पर सितंबर 2024 से अप्रैल 2025 के बीच तीन से पांच साल की उम्र के पांच मासूम बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न करने और अपनी दो महिला सहकर्मियों को प्रताड़ित करने के संगीन इल्जाम हैं. हालांकि, आरोपी इन सभी आरोपों से साफ मुकर रहा है. जब मंगलवार दोपहर उसे खचाखच भरी अदालत में पेश किया गया, तो वह मीडिया के कैमरों से अपना चेहरा छिपाने के लिए एक पीले रंग की फाइल का सहारा लेता दिखा.

आरोपी खुद को बता रहा बेकसूर

दूसरी तरफ, आरोपी के वकील ने इस मामले पर फिलहाल कोई भी बयान देने से इनकार कर दिया है. हालांकि, डेविड खुद को बेकसूर बता रहा है, लेकिन उसने यह जरूर कबूल किया है कि उसने स्कूल के नियमों का उल्लंघन किया था. नियमों के मुताबिक किसी भी सहायक को बच्चों को अपनी गोद में नहीं बैठाना चाहिए, लेकिन वह ऐसा करता था. इसके अलावा, चार अन्य परिवारों ने भी उस पर अपने बच्चों के साथ बदसलूकी के आरोप लगाए हैं.

पेरिस के दर्जनों स्कूलों की जांच

हालात की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन भी अब कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है. मेयर के मुताबिक, साल 2026 के शुरुआती तीन महीनों में ही पेरिस प्रशासन ने एक्शन लेते हुए 78 स्कूल सहायकों को सस्पेंड कर दिया है, जिनमें से 31 कर्मचारियों पर सीधे तौर पर यौन शोषण के गंभीर आरोप हैं.

एक स्वतंत्र आयोग (CIIVISE) के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि फ्रांस में हर साल करीब 1.60 लाख बच्चे इस तरह के यौन शोषण का शिकार होते हैं और बेहद अफसोस की बात यह है कि इनमें से 10 में से 8 मामलों में गुनहगार कोई बाहर का नहीं, बल्कि खुद परिवार का ही कोई सदस्य होता है.

स्कूल मॉनिटर कौन होते हैं?

स्कूल मॉनिटर ऐसे वयस्क होते हैं जो दोपहर के भोजन, विश्राम, अवकाश और स्कूल के बाद की गतिविधियों के दौरान बच्चों की देखरेख के लिए जिम्मेदार होते हैं. कुछ मामलों में, वे छोटे बच्चों के साथ उनके कक्षा शिक्षकों से भी अधिक समय बिताते हैं.

वे सीधे स्कूलों या फ्रांसीसी शिक्षा मंत्रालय की तरफ से नियोजित नहीं हैं. इसके बजाय, उन्हें स्थानीय परिषदों और नगर अधिकारियों द्वारा भर्ती किया जाता है, अक्सर बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण या पेशेवर योग्यता के. इनमें से कई को अस्थायी, प्रति घंटा के आधार पर अनुबंध पर रखा जाता है.

फ्रांस में तीन साल की उम्र से नर्सरी स्कूल जाना अनिवार्य है. इसलिए, तीन से ग्यारह साल की उम्र के लाखों बच्चों के लिए स्कूल में निगरानी करने वाले लोग नियमित रूप से हर दिन मौजूद रहते हैं.

द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रांस भर में माता-पिता ने बताया है कि बच्चों पर आक्रामक तरीके से चिल्लाया गया, उन्हें धक्का दिया गया और उनके बाल खींचे गए. कुछ बच्चों को कथित तौर पर खाना नहीं दिया गया, जबकि अन्य को तब तक जबरदस्ती खिलाया गया जब तक कि वे बीमार न पड़ गए. सबसे गंभीर मामलों में, बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न या बलात्कार की खबरें सामने आई हैं.

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