Why Eiffel Tower Grows in Summer: उत्तर भारत में गर्मी का सितम जारी है. नौतपा शुरू होने से पहले ही पारा 48°C पहुंच गया है. यूपी का बांदा मिस्र के असवान और सऊदी अरब के अराफात के बाद दुनिया का तीसरा सबसे गर्म शहर बन चुका है. इस गर्मी का असर इंसानों, जानवरों और पेड़ों के अलावा एफिल टावर (Eiffel Tower) पर भी पड़ता है. सुनकर अजीब लगेगा लेकिन दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक पेरिस के इस टावर की लंबाई कड़कड़ाती धूप और भीषण गर्मी में बढ़ जाती है. ऐसा किसी जादू से नहीं बल्कि साइंस के नियम की वजह से होता है. आइए जानते हैं कि आखिर गर्मी के मौसम में इस टावर में ऐसा क्या होता है.
गर्मी आते ही क्यों लंबा हो जाता है एफिल टावर
पेरिस का तापमान जब बढ़ने लगता है और 40 डिग्री के आसपास पहुंच जाता है, तो एफिल टावर की ऊंचाई 12 से 15 सेंटीमीटर (करीब 6 इंच) तक बढ़ जाती है. यानी गर्मी के दिनों में यह टावर पहले से थोड़ा ज्यादा लंबा दिखने लगता है. इस बदलाव के पीछे जो सबसे बड़ी वैज्ञानिक वजह है, उसे थर्मल एक्सपेंशन (Thermal Expansion) कहते हैं.
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थर्मल एक्सपेंशन क्या है और इससे एफिल टावर कैसे लंबा हो जाता है
थर्मल एक्सपेंशन में जब भी किसी धातु या लोहे को बहुत तेज गर्मी मिलती है, तो वह फैलने लगती है. एफिल टावर का पूरा ढांचा करीब 7,300 टन भारी लोहे से बना है. जब सूरज की तेज धूप इस लोहे पर पड़ती है, तो इसके अंदर मौजूद छोटे-छोटे अणु (Molecules) गर्मी की वजह से बहुत तेजी से कंपन करने लगते हैं। तेजी से कंपन करने के कारण ये अणु एक-दूसरे से थोड़ा दूर चले जाते हैं. नतीजा यह होता है कि लोहा फैल जाता है और पूरा टावर कुछ सेंटीमीटर ऊपर की तरफ खिंच जाता है.
सूरज को देखकर झुक भी जाता है टावर
गर्मी का असर सिर्फ लंबाई बढ़ने तक ही सीमित नहीं रहता है. तेज धूप की वजह से एफिल टावर सूरज की विपरीत दिशा में थोड़ा सा झुक भी जाता है। इसके पीछे की वजह भी बहुत दिलचस्प है. सूरज की सीधी और तेज किरणें टावर के चारों हिस्सों पर एक साथ नहीं पड़तीं. धूप सिर्फ एक तरफ की भुजा पर ज्यादा लगती है, जिससे वह हिस्सा बाकी तीन हिस्सों के मुकाबले ज्यादा गर्म होकर फैल जाता है. इस असंतुलन की वजह से टावर का ऊपरी हिस्सा सूरज से थोड़ी दूरी बनाते हुए दूसरी तरफ झुक जाता है.
क्या इससे टावर को कोई खतरा है
बिल्कुल नहीं. यह एक पूरी तरह से प्राकृतिक प्रक्रिया है. इस टावर को डिजाइन करने वाले इंजीनियर गुस्ताफ एफिल ने करीब 135 साल पहले ही लोहे के इस व्यवहार को भांप लिया था. टावर को बनाते समय ही इसके ढांचे में ऐसा लचीलापन रखा गया था कि मौसम के इन बदलावों से इसकी मजबूती पर जरा सा भी फर्क न पड़े.
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