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ट्रेन हाइजैक: आतंकवाद पर 'जर्ब-ए-अज्ब ' का दिखावा आज पाकिस्तान को ही दे रहा दर्द

पाकिस्तान के बलूचिस्तान के बीहड़ों में विद्रोहियों ने जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाइजैक कर लिया और बड़ी संख्या में सैनिकों सहित 400 से अधिक यात्रियों को बंधक बना लिया.

ट्रेन हाइजैक: आतंकवाद पर 'जर्ब-ए-अज्ब ' का दिखावा आज पाकिस्तान को ही दे रहा दर्द

पाकिस्तान लहूलुहान है. फिर हिंसा की मार झेल रहा है. फिर अपना बोया काट रहा है. ऐसा नहीं है कि हिंसा कभी कम हुई थी, लेकिन एक और हिंसक घटना ने पूरी दुनिया की नजर पड़ोसी देश की तरफ मोड़ दी है. पाकिस्तान के बलूचिस्तान के बीहड़ों में विद्रोहियों ने जाफर एक्सप्रेस ट्रेन को हाइजैक कर लिया और बड़ी संख्या में सैनिकों सहित 400 से अधिक यात्रियों को बंधक बना लिया है.

पाकिस्तान किसी को दोष देने की स्थिति में नहीं है. अच्छे और बुरे आतंकी का भेद करते-करते पाकिस्तान हिंसा के उस गर्त में डूब चुका है, जिसमें से बाहर निकलने का कोई जरिया नजर नहीं आ रहा. यहां याद आ रहा आज से 11 साल पहले जून 2014 में पाकिस्तान की आर्मी द्वारा लॉन्च किया गया मिलिट्री ऑपरेशन- जर्ब-ए-अज्ब. पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज के नेता खुर्रम दस्तगीर ने कहा कि है कि आतंक पर आखिरी प्रहार लिए जर्ब-ए-अज्ब का पार्ट टू चलना चाहिए. 

आखिर आतंकवाद को खत्म करने की कसम के साथ लॉन्च किया गया ऑपरेशन किस तरह अच्छे और बुरे आतंकवाद की भेद करती आर्मी की भेंट चढ़ गया?

ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब

जर्ब-ए-अज्ब का शाब्दिक अर्थ है “तेज और काटने वाला प्रहार”. ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में सशस्त्र विद्रोही समूहों के खिलाफ पाकिस्तानी सेना की एक संयुक्त सैन्य कार्रवाई थी जिसे 2014 में शुरू किया गया था. पाकिस्तान ने दावा किया था कि अल-कायदा, तालिबान और उज्बेकिस्तान के इस्लामी आंदोलन की मौजूदगी को खत्म करने के लिए यह आखिरी प्रहार साबित होगा.

पाकिस्तान में उस समय नवाज शरीफ पीएम थे. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब का जिक्र करते हुए यह दिखाने की कोशिश की कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा. दावा कर दिया कि यह दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ा और सबसे सफल अभियान है. लेकिन क्या सच्चाई यह थी?

उत्तरी वजीरिस्तान में जब पाकिस्तान की सेना यह ऑपरेशन चला रही थी, तब किसी भी न्यूट्रल पत्रकार को इसे कवर नहीं करने दिया गया. जो भी अपडेट या आंकड़ें आए, वो सरकारी आंकड़े ही थे.

2 साल में आर्मी ने 3500 आतंकियों को मारने का दावा किया. हालांकि पाकिस्तानी आर्मी पर आरोप लगा कि उसने आतंकवाद से लड़ने के बहाने अपनी अदालतें स्थापित कर लीं. सितंबर 2016 में छपी DW की रिपोर्ट के अनुसार सैन्य अदालतों ने बीते डेढ़ साल में सैकड़ों आतंकवादियों को फांसी दे दी और इसे आतंकवादी संगठनों के लिए "बहुत बड़ा झटका" बताया. 

अच्छा तालिबान-बुरा तालिबान

इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी कमजोरी बताई गई कि पाकिस्तान की आर्मी के आतंकवाद विरोधी दृष्टिकोण में एक बुनियादी विरोधाभास था, जो आजतक बना हुआ है. वहां की आर्मी पाकिस्तान में हमले करने वालों को तो बुरा आतंकवादी मानती है और उनको निशाने पर लेती है. लेकिन वह भारत जैसे अपने विरोधियों पर हमला करने वालों को अच्छा आतंकवादी मानकर उनको संरक्षण देती है.

इस ऑपरेशन में कोई बड़ा जिहादी आतंकी नहीं मारा गया. आर्मी ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के विरोधी गुटों को तो निशाना बनाया, लेकिन उसने अन्य आतंकवादी समूहों को भारत के खिलाफ प्रॉक्सी के रूप में उपयोग करना जारी रखा. हक्कानी नेटवर्क और अफगान तालिबान अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के प्रभाव को बनाए रखने में मदद करता है. लश्कर-ए-तैयबा कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों को निशाना बनाता है. इन तीनों के खिलाफ इस ऑपरेशन में कोई कार्रवाई नहीं की गई.

याद रहे कि दिसंबर 2009 में हक्कानी नेटवर्क ने ही अमेरिकी एजेंसी CIA के फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस चैपमैन पर हमला किया था. इस बमबारी को "दशकों में CIA के खिलाफ सबसे घातक हमलों में से एक" कहा जाता है. इसमें सात अमेरिकी एजेंट की मौत हो गई थी.

2016 में जब अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी भारत आए थे तो उन्होंने भी यही राय दोहराई थी. दिल्ली में उन्होंने कहा था, "पाकिस्तान को बुरे तत्वों के पनाहगाहों को साफ करने में मदद करने के लिए हमारे साथ काम करना चाहिए जो न केवल पाकिस्तान और भारत के बीच संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता हासिल करने की अमेरिका की क्षमता को भी प्रभावित कर रहे हैं."

पाकिस्तान आर्मी के इस सेलेक्टिव ऑपरेशन की मार उत्तरी वजीरिस्तान की आम जनता को झेलनी पड़ी. इस ऑपरेशन की वजह से एक साल के अंदर कम से कम 10 लाख लोगों को अपना घर छोड़कर जाना पड़ा.

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