- सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट नियमों का पालन न करने पर बिजली-पानी काटने का आदेश दिया है
- केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 से बल्क वेस्ट जनरेटर की परिभाषा और उनके लिए कचरा प्रबंधन नियम लागू किए हैं
- भारत में हर रोज डेढ़ लाख टन से ज्यादा कचरा उत्पन्न होता है, जिसमें से एक बड़ी मात्रा यहीं से आती है
सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ते कचरे के संकट को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए साफ कर दिया है कि अगर बड़ी कंपनियां और दफ्तर नियमों का पालन नहीं करते हैं तो उनकी बिजली-पानी काट दी जाए. अदालत ने 18 अगस्त को देशभर के कलेक्टरों से कहा कि वे 6 हफ्ते के भीतर बल्क वेस्ट जनरेटर (BWG) की पहचान करें और अगर ऐसी संस्थाएं सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2026 का पालन नहीं करती हैं तो उनकी खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए. जरूरत पड़े तो बिजली-पानी भी काट दी जाए.
जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2026 को लागू करने से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी. बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि इन नियमों को ठीक से लागू करने की जिम्मेदारी सिर्फ नगर निगम अधिकारियों की ही नहीं, बल्कि उन लोगों की भी तय की जानी चाहिए जो बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर जिला कलेक्टर को अपने इलाके में आने वाले हर BWG को लिखित रूप से उनकी जिम्मेदारियों के बारे में बताना होगा. उन्हें बताना होगा कि उनके यहां पैदा होने वाले कचरे को अलग-अलग करना, स्टोर करना और उसे सौंपने की जिम्मेदारी उनकी होगी.
कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि नियमों का पालन नहीं करने पर जिला कलेक्टर के आदेश से पानी और बिजली काट दी जाएगी और तभी बहाल होगी जब नियमों के पालन का सर्टिफिकेट जमा किया जाएगा.
लेकिन कौन होगा BWG?
केंद्र सरकार ने 1 अप्रैल 2026 से ही नए नियमों को लागू किया है. इसमें BWG यानी बल्क वेस्ट जनरेटर की परिभाषा तय की गई है. इसके मुताबिक, BWG उन्हें माना जाएगा-
- जिनका फ्लोर एरिया 20,000 वर्ग मीटर या उससे ज्यादा होगा.
- जहां हर दिन 40 हजार लीटर से ज्यादा पानी की खपत होगी.
- जहां से हर दिन 100 किलो या उससे ज्यादा कचरा निकलेगा.
BWG में केंद्र और राज्य सरकार के विभाग, स्थानीय निकाय, सरकारी कंपनियां, कमर्शियल और रिहायशी सोसायटियां.
इन BWG को अपने यहां से निकलने वाला कचरा खुद इकट्ठा करना होगा, प्रोसेस करना होगा और उसे ट्रांसपोर्ट करना होगा. नियमों का मकसद BWG को जवाबदेह बनाना है, क्योंकि भारत में जितना कचरा निकलता है, उसमें से 30% कचरा यहीं से आता है.
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कितना कचरा पैदा कर रहा भारत?
भारत में हर दिन इतना कचरा पैदा होता है, जिसकी शायद कल्पना भी नहीं की जा सकती. तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है.
PIB की ओर से इस साल 31 जनवरी को जारी प्रेस रिलीज में बताया गया था कि भारतीय शहरों से हर दिन 1.62 लाख टन कचरा निकल रहा है.
हालांकि, पिछले साल 1 दिसंबर को केंद्र सरकार ने सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के हवाले से बताया था कि 2023-24 में हर दिन 1,85,195 टन कचरा निकला. इसमें से 1,79,479 टन कचरे को इकट्ठा कर लिया गया. अब जो कचरा इकट्ठा किया गया, उसमें से 1,14,110 टन तो प्रोसेस हो गया और बाकी 39,629 टन कचरा लैंडफिल साइट में चला गया. इसका मतलब हुआ कि 1,53,739 टन कचरे का तो हिसाब है लेकिन बाकी का 31,456 टन कचरे का कोई हिसाब नहीं है.

भारत में हर रोज कितना कचरा पैदा हो रहा है? इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक एशियाई हाथी का औसतन वजन 5 टन होता है. इस हिसाब से हर दिन 37 हजार हाथियों के बराबर का वजन भारत में पैदा हो रहा है. अगर 1.62 लाख टन कचरे से हिसाब लगाया जाए तो ये भी 32,400 हाथियों के बराबर होता है.
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लेकिन क्या सिर्फ इतनी ही समस्या है?
हर दिन कचरा पैदा हो रहा है... उसे इकट्ठा किया जा रहा है... लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं होती. समस्या है- पुराना कचरा जो हर दिन बढ़ता जा रहा है. भारत में सालों से पुराना कचरा भी पड़ा हुआ है.
PIB की 31 जनवरी की प्रेस रिलीज के मुताबिक, देशभर में लगभग 2,479 डंप साइट पर 1 हजार टन या उससे ज्यादा पुराना कचरा पड़ा हुआ है. इन डंपसाइट पर कुल मिलाकर 25 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा है, जो करीब 15 हजार एकड़ जमीन पर फैला हुआ है.
हालांकि, अच्छी बात यह है कि अब तेजी से सुधार भी हो रहा है. अभी देश भर में 1,428 डंपसाइट्स पर सुधार का काम चल रहा है. 62% से ज्यादा पुराना कचरा पहले ही प्रोसेस किया जा चुका है. इन साइट्स पर लगभग 8.6 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा है. PIB के मुताबिक, साल 2025 में 26 राज्यों के 438 शहरों में 459 डंपसाइट्स को पूरी तरह से साफ कर दिया गया है, जिसमें 1.83 करोड़ मीट्रिक टन कचरा जमा था.
सरकार का दावा है कि इस कचरे को खत्म करने के लिए दोहरी नीति अपनाई जा रही है. पहली- पुराने डंपसाइट्स को साफ किया जा रहा है. और दूसरी- कचरा प्रोसेसिंग फैसिलिटी बनाकर नई डंपसाइट को बनने से रोका जा रहा है.

इस कचरे से कैसे निपटा जा रहा है?
कुछ आंकड़े हैं जो बताते हैं कि कचरे की इस समस्या पर धीरे-धीरे ही सही लेकिन काबू पाया जा रहा है. अब ज्यादातर घरों से कचरा इकट्ठा किया जा रहा है.
इसी साल मई में स्वच्छ भारत मिशन- अर्बन 2.0 की रिव्यू मीटिंग हुई थी. इसके बाद PIB ने एक प्रेस रिलीज जारी कर बताया था कि अब 97% वार्डों में घर-घर जाकर कचरा इकट्ठा किया जा रहा है और लो टू-बिन, फोर-बिन और यहां तक कि 6-बिन वाले सिस्टम के जरिए कचरे को अलग-अलग करने के तरीके को तेजी से अपना रहे हैं.
बीते एक दशक में कचरे की प्रोसेसिंग में भी काफी तेजी से सुधार हुआ है. PIB के मुताबिक, 2014 में जहां सिर्फ 16% कचरा ही वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस होता था, वहीं मई 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर 81% हो गया है.
और तो और, डंपसाइट्स को भी साफ किया जा रहा है. मई की प्रेस रिलीज बताती है कि 2,482 डंपसाइट्स पर मौजूद कुल 26 करोड़ मीट्रिक टन कचरे में से 65% का निपटारा किया जा चुका है. इससे 9,000 एकड़ जमीन कचरे से फ्री हो गई है.
लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ी चिंता ये है कि जिस तरह से शहरीकरण बढ़ रहा है, उस हिसाब से कचरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है. अनुमान है कि 2030 तक सालभर में 16.5 करोड़ टन कचरा पैदा हो सकता है. 2050 तक तो यह बढ़कर 43.6 करोड़ टन होने का अनुमान है.
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