क्या वाकई अंग्रेजों के लिए लिखा गया था 'जन-गण-मन'? टैगोर ने अपनी दो चिट्ठियों में दे दिया था जवाब
राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' को लेकर दशकों से एक विवाद रहा है कि इसे अंग्रेजों और किंग जॉर्ज V के सम्मान में गाया गया था. क्या है सच? समझते हैं.
भारत के राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' को लेकर एक बार फिर दावा किया गया है कि इसे अंग्रेजों के लिए गाया गया था. यह दावा और किसी ने नहीं, बल्कि 'शक्तिमान' के नाम से मशहूर मुकेश खन्ना ने किया है. उन्होंने यह भी मांग की है कि अब 'जन-गण-मन' की जगह 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान बनाया जाना चाहिए.
न्यूज एजेंसी IANS से बात करते हुए मुकेश खन्ना ने कहा, 'मैंने तीन साल पहले कहा था कि 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गान बनाया जाहिए. 'जन-गण-मन' हमारे देश का राष्ट्रीय गान नहीं है. यह क्वीन एलिजाबेथ को श्रद्धांजलि है. रवींद्रनाथ टैगोर ने उनकी तारीफ में एक गीत लिखा था और हमने उसे स्वीकार कर लिया.'
उन्होंने यह भी कहा कि 'जन-गण-मन' में आने वाले 'भाग्यविधाता', 'पंजाब' और 'सिंध' जैसे शब्द अपने नहीं लगते. उन्होंने कहा कि 'मैं चाहता हूं कि 'जन-गण-मन' को जल्द से जल्द हटाकर 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गान बनाया जाए.'
Mumbai, Maharashtra: On the National Song Vande Mataram being rendered during the Independence Day celebrations at the Red Fort for the first time, Actor Mukesh Khanna says, "I had said this three years ago as well; Vande Mataram should be made the national song. Jana Gana Mana… pic.twitter.com/aGo7pmzVhF
— IANS (@ians_india) August 15, 2026
हालांकि, मुकेश खन्ना पहले नहीं हैं जिन्होंने 'जन-गण-मन' को लेकर इस तरह का दावा किया है. उनसे पहले भी कई नेता ऐसा दावा कर चुके हैं. पिछले साल ही नवंबर में कर्नाटक की उत्तर कन्नड़ सीट से बीजेपी सांसद विश्वेश्वर हेगड़े ने दावा किया था कि ''जन-गण-मन' अंग्रेजों के स्वागत के लिए लिखा गया था.'
इससे पहले जुलाई 2015 में राजस्थान के तत्कालीन राज्यपाल कल्याण सिंह ने मांग की थी कि 'जन-गण-मन अधिनायक जय हो... किसके लिए है? यह अंग्रेजी शासक- यानी अंग्रेजों की तारीफ के लिए है. अब समय आ गया है कि इसमें बदलाव किया जाए और इसकी जगह 'जन-गण-मन मंगल गाए' किया जाए.'
जन-गण-मन कब लिखा गया था?
इसे बंगाली कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने 11 दिसंबर 1911 को लिखा था. इसका मूल नाम 'भारत भाग्य विधाता' था. यह पूरा गाना 5 छंदों का है और हम जो गाते हैं, वह इसका सिर्फ एक ही छंद है.
जिस साल 'जन-गण-मन' लिखा गया था, उसी साल ब्रिटेन के किंग जॉर्ज V भारत आए थे. उसी समय बंगाल की जगह दिल्ली को राजधानी बनाने का ऐलान किया गया था. किंग जॉर्ज V ने ही बंगाल विभाजन को रद्द करने की घोषणा की थी.
'जन-गण-मन' को पहली बार 27 दिसंबर 1911 को कलकत्ता में कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था. यह अधिवेशन 26 से 28 दिसंबर 1911 तक चला था. 1911 के कांग्रेस अधिवेशन के एक दस्तावेज पता चलता है कि दूसरे दिन की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर के रचित एक देशभक्ति गीत से हुई थी.

उस समय कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार थी. इसलिए उसने ब्रिटिश राजा के प्रति का स्वागत करने का फैसला किया. कांग्रेस अधिवेशन के दूसरे दिन ही एक और गीत गाया गया था. यह गीत था- 'बादशाह हमारा', जिसे पंजाब कांग्रेस के नेता रामभज दत्ता ने लिखा था. रामभज दत्ता, रवींद्रनाथ टैगोर के भतीजे थे.
यहीं से शुरू हुआ कन्फ्यूजन
'जन-गण-मन' अंग्रेजों के लिए गाया गया था... इसे लेकर कन्फ्यूजन इसलिए फैला क्योंकि उस समय कई अंग्रेजी अखबरों ने गलत रिपोर्टिंग की थी.
1911 के कांग्रेस के अधिवेशन में 'जन-गण-मन' गाया गया था और उसके बाद 'बादशाह हमारा' और अंग्रेजी अखबारों ने इन दोनों को जोड़ दिया.
28 दिसंबर 1911 को अंग्रेजी अखबार 'द इंग्लिशमैन' ने लिखा कि 'कार्यक्रम की शुरुआत रवींद्रनाथ टैगोर के गीत से हुई, जिसे उन्होंने सम्राट के सम्मान में लिखा.' एक और अंग्रेजी अखबार 'द स्टेट्समैन' ने लिखा 'बंगाली कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने सम्राट के स्वागत के लिए लिखा गीत गाया.'
इसी गलत रिपोर्टिंग से कन्फ्यूजन फैला कि किंग जॉर्ज V के स्वागत में 'जन-गण-मन' गाया गया था.
खुद टैगोर ने बताई थी इसकी सच्चाई
'जन-गण-मन' को लेकर विवाद शुरू से ही रहा है. आजादी से पहले भी टैगोर पर ऐसे आरोप लगते रहे कि उन्होंने किंग जॉर्ज V के लिए इस गीत को गाया था और उन्हें 'भारत भाग्य विधाता' बताया था. हालांकि, टैगोर ने खुद इन आरोपों को खारिज कर दिया था. 20 नवंबर 1937 को उन्होंने अपने दोस्त पीबी सेन को एक चिट्ठी लिखकर इसकी सच्चाई बताई थी.
इसके बाद 29 मार्च 1939 को उन्होंने एक और चिट्ठी में लिखा, 'अगर कोई सोचता है कि मैं जॉर्ज V की तारीफ में ऐसा गीत लिखने की मूर्खता कर सकता हूं तो मैं केवल यही कहूंगा कि मैं ऐसे लोगों को जवाब देकर मैं केवल अपना ही अपमान करूंगा.'

1937 और 1939 में लिखे अपनी चिट्ठियों में रवींद्रनाथ टैगोर ने सफ कर दिया था कि उन्होंने 'जन-गण-मन' गीत किंग जॉर्ज V की तारीफ में लिखा था और यह भी कहा था कि गीत में 'अधिनायक' शब्द का मतलब किंग जॉर्ज V नहीं है.
'जन-गण-मन' कैसे बना राष्ट्रगान?
महात्मा गांधी 'जन-गण-मन' को एक गीत नहीं, बल्कि 'भक्ति गीत' के रूप में देखते थे. जनवरी 1912 में बंगाली मैग्जीन 'तत्वबोधिनी' में पहली बार 'भारत विधाता' नाम से यह गीत छपा था. इस मैग्जीन के संपादक रवींद्रनाथ टैगोर ही थे. उन्होंने 1919 में इसका अंग्रेजी में 'The Morning Song of India' टाइटल से अनुवाद किया था.
1942 में सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद सरकार ने इस गीत का हिंदुस्तानी में अनुवाद किया और इसे अपने राष्ट्रगान के रूप में अपनाया.
आजादी के बाद 15 अगस्त 1947 को संविधान सभा के सत्र में 'जन-गण-मन' को गाया गया था.

आखिरकार 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाया. संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इसकी घोषणा की थी. उन्होंने ही यह भी घोषणा की थी कि 'वंदे मातरम्' को 'जन-गण-मन' के बराबर सम्मान दिया जाएगा.
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ और 'जन-गण-मन' को राष्ट्रीय गान और 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गीत का दर्जा मिल गया.
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