नेपाल सरकार की ओर से एक दशक पहले खरीदे गए चीनी विमानों का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है. इस विवादित सौदे पर नेपाल के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को 'कारण बताओ' नोटिस जारी किया है. अदालत ने सरकार से पूछा है कि इस घाटे के सौदे की अब तक जांच क्यों नहीं की गई. इस सौदे ने सरकारी एयरलाइंस को अरबों रुपये के कर्ज के दलदल में धकेल दिया है. कभी घरेलू उड़ानों की तस्वीर बदलने के नाम पर लाए गए ये विमान आज नेपाल के लिए 'सफेद हाथी' साबित हो रहे हैं.
यह पूरा मामला साल 2014 से 2018 के बीच का है, जब नेपाल ने चीन से अनुदान और रियायती कर्ज के तौर पर करीब 6.66 अरब नेपाली रुपये के छह विमान हासिल किए थे. इनमें चार 17 सीटों वाले Y12E विमान और दो 56 सीटों वाले MA60 टर्बोप्रॉप विमान शामिल थे.
रनवे हादसे के बाद कबाड़ बना छठा विमान
इन छह विमानों में से छठा विमान मार्च 2020 में नेपालगंज हवाई अड्डे पर एक रनवे हादसे का शिकार हो गया था. तब से वह विमान वहीं मलबे के रूप में पड़ा हुआ है.
नेपाल एयरलाइंस कॉरपोरेशन (NAC) की निदेशक अर्चना खड़का ने बताया कि इस दुर्घटनाग्रस्त विमान का बीमा क्लेम तो मिल चुका है, लेकिन अब यह केवल स्क्रैप यानी कबाड़ बनकर रह गया है. बाकी बचे पांच विमानों के लिए एयरलाइंस को लगातार पार्किंग चार्ज भुगतना पड़ रहा है, जिससे घाटा हर दिन बढ़ रहा है.
इसके अलावा नेपाल के पहाड़ी और दुर्गम इलाकों के हवाई अड्डों के लिए ये चीनी विमान तकनीकी रूप से भी अनुपयुक्त साबित हुए.
पायलटों की कमी को लेकर उठे सवाल
नेपाल एयरलाइंस के पास इन चीनी विमानों को उड़ाने के लिए प्रशिक्षित पायलटों, इंस्ट्रक्टर पायलटों और योग्य मेंटेनेंस इंजीनियरों की भी भारी कमी थी. स्पेयर पार्ट्स की सप्लाई समय पर न होना भी एक बड़ा सिरदर्द बना.
नेपाल सरकार ने डोमेस्टिक फ्लाइट्स को बढ़ावा देने के लिए यह सौदा किया था, लेकिन यह फैसला पूरी तरह उलटा पड़ गया. चीन के कर्ज से बने पोखरा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की तरह ही इस चीनी विमान सौदे को भी अब एक अदूरदर्शी और आत्मघाती आर्थिक फैसला माना जा रहा है.
इस भारी वित्तीय नुकसान के खिलाफ चार्टर्ड अकाउंटेंट और सामाजिक कार्यकर्ता भेष राज लुइंटेल ने 25 जून को सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की. याचिका में मांग की गई कि इस पूरे खरीद सौदे की उच्च स्तरीय और व्यापक जांच होनी चाहिए क्योंकि इसने देश को अरबों रुपये का चूना लगाया है.
याचिकाकर्ता का आरोप है कि इतने बड़े घोटाले और भ्रष्टाचार के स्पष्ट संकेत होने के बावजूद नेपाल की भ्रष्टाचार निरोधक संस्था 'अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग' (CIAA) ने इस पर चुप्पी साधे रखी.
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