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5 बार PM, 7 बार सांसद, 34 साल से MP... नेपाल की सियासत के 'शेर' ने छोड़ा सियासी मैदान

शेर बहादुर देउबा का चुनाव न लड़ने का ऐलान संकेत है कि नेपाल में युवाओं और नए नेतृत्व का दबाव अब पुराने दिग्गजों पर भारी पड़ने लगा है.

5 बार PM, 7 बार सांसद, 34 साल से MP... नेपाल की सियासत के 'शेर' ने छोड़ा सियासी मैदान
  • शेर बहादुर देउबा ने 5 मार्च को होने वाले प्रतिनिधि सभा के चुनावों में हिस्सा न लेने का फैसला किया है
  • देउबा का यह फैसला पिछले कुछ महीनों में लगातार मिल रहे राजनीतिक झटकों का नतीजा माना जा रहा है
  • देउबा का चुनावी मैदान छोड़ना नेपाली कांग्रेस में संभावित टूट को रोकने की एक रणनीति भी मानी जा रही है
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नेपाल की राजनीति के एक तरह से 'भीष्म पितामह' और 5 बार प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाल चुके शेर बहादुर देउबा के साढ़े तीन दशक लंबे चुनावी सफर पर अब एक तरह से विराम लग गया है. उनके सचिवालय ने घोषणा की है कि 79 वर्षीय देउबा 5 मार्च को होने वाले प्रतिनिधि सभा के आगामी चुनावों में हिस्सा नहीं लेंगे. इसे न सिर्फ देउबा के सियासी जीवन का अंत बल्कि नेपाल की राजनीति में एक बड़े युग के अवसान के रूप में देखा जा रहा है.

छठी बार पीएम बनने की उम्मीद लगाए थे

देउबा का यह फैसला पिछले कुछ महीनों में लगातार मिल रहे राजनीतिक झटकों का नतीजा माना जा रहा है. साल 2024 में नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के बीच हुए समझौते के तहत देउबा को छठी बार प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद थी, लेकिन पिछले साल सितंबर में हुए Gen G विद्रोह ने ओली सरकार गिरा दी और देउबा के अरमानों पर पानी फेर दिया. अब गगन थापा के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस की बगावत से देउबा हाशिए पर आ गए हैं.

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अब चुनाव न लड़ने का फैसला क्यों?

नेपाली कांग्रेस के अंदर हुए इस बड़े सत्ता परिवर्तन से देउबा डिफेंसिव मोड में आ गए थे. चुनाव आयोग के फैसले से पार्टी का आधिकारिक नाम और निशान भी उनसे छिन गया. गगन थापा की अगुआई वाली केंद्रीय कार्यसमिति ने देउबा की पारंपरिक सीट डडेलधुरा निर्वाचन क्षेत्र से उनके ही वफादार नैन सिंह महर को कैंडिडेट बनाकर उतार दिया. जानकारों का मानना है कि पार्टी के अंदर गगन थापा के बढ़ते प्रभाव और अपनों के साथ छोड़ने के बाद देउबा के पास गरिमापूर्ण विदाई के अलावा कोई विकल्प नहीं था.

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नेपाली राजनीति के अन्य दिग्गजों का क्या?

देउबा का चुनावी मैदान छोड़ना नेपाली कांग्रेस में संभावित टूट को रोकने की एक रणनीति भी मानी जा रही है. हालांकि केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' अब भी अपनी पार्टियों पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन देउबा का चुनाव न लड़ने का ऐलान संकेत है कि नेपाल में युवाओं और नए नेतृत्व का दबाव अब पुराने दिग्गजों पर भारी पड़ने लगा है. देखना ये है कि नेपाल की जनता इस बड़े बदलाव को किस तरह स्वीकार करती है.

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