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ईरान की सीमा पर खड़ी अमेरिकी सेना हमला क्यों नहीं कर रही? किसका कर रही इंतजार

ईरान की सीमा पर खड़ी अमेरिकी सेना के अगले कदम पर दुनिया की नजर है. क्या कूटनीति जीतेगी या सीमित टकराव होगा या इतिहास एक बड़े युद्ध का गवाह बनेगा? फिलहाल अमेरिकी सेना ईरान पर हमला नहीं कर रही है तो क्या है इसकी वजह?

ईरान की सीमा पर खड़ी अमेरिकी सेना हमला क्यों नहीं कर रही? किसका कर रही इंतजार
स्ट्राइक फाइटर स्क्वाड्रन 41 से जुड़े दो एफ/ए-18एफ सुपर हॉर्नेट अरब सागर में एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस अब्राहम लिंकन के फ्लाइट डेक से लॉन्च होने की तैयारी में खड़े हैं
AFP
  • अमेरिका-ईरान तनाव आज ऐसे मोड़ पर है जहां किसी भी कदम का पूरी दुनिया पर असर हो सकता है.
  • ईरान की सीमा पर खड़ी अमेरिकी सेना पर दुनिया की नजर है, पर वो हमला नहीं कर रही है.
  • आगे क्या होगा ये जवाब किसी के पास नहीं है, पर ये तय है कि संघर्ष हुआ तो केवल ये दोनों देश प्रभावित नहीं होंगे.
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पिछले कुछ दिनों से मध्य-पूर्व से लगातार ये खबर आ रही है कि अमेरिका ने ईरान के पास अपना सैन्य बेड़ा उतार दिया है. अमेरिकी जंगी जहाजों के सीमा पर होने से ईरान में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में तनाव का माहौल है. बीते चार दशकों से दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति रही है. यह कभी खुलकर तो कभी परोक्ष रूप से चलता रहा है.

आज स्थिति इसलिए ज्यादा संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि दोनों देश एक साथ संवाद भी कर रहे हैं और सैन्य तैयारी भी. यही द्वंद्व इसे खतरनाक बनाता है- बातचीत का दरवाजा खुला है, लेकिन हथियार भी तैयार हैं. दूसरी तरफ ईरान भी इसी समय नौसैनिक अभ्यास करता है पर जानकारों की नजर में इसे दोनों पक्षों का डिटरेंस यानी प्रतिरोधक क्षमता प्रदर्शन भर माना जा रहा है.

दरअसल, मध्य-पूर्व में चल रहा अमेरिका-ईरान तनाव दुनिया की सबसे जटिल जियो-पॉलिटिकल प्रतिस्पर्धाओं में से एक है. यह सिर्फ दो देशों की दुश्मनी नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन, ऊर्जा सुरक्षा, सैन्य रणनीति, वैचारिक टकराव और वैश्विक कूटनीति का बहुस्तरीय संघर्ष है. 

हाल ही में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनका देश समझौता चाहता है, लेकिन सुरक्षा खतरे में पड़ी तो हर विकल्प खुला रहेगा तो उसके जवाब में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अली खामेनेई ने स्पष्ट कहा कि उनका देश धमकियों के आगे नहीं झुकेगा. वहीं राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने भी साफ लहजे में कहा कि उनके देश को सम्मानजनक समझौता ही स्वीकार्य होगा. इन बयानों से ये तो स्पष्ट है कि ये टकराव सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित नहीं है बल्कि दोनों देश किसी भी वास्तविक युद्ध से पहले एक रणनीतिक मनोवैज्ञानिक लड़ाई लड़ रहे हैं.

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ईरान ने इराक के साथ 8 साल तक चले युद्ध की 44वीं वर्षगांठ पर 26 सितंबर 2024 को अपनी जमीन से हवा में मार करने वाली एस-200 मिसाइल का प्रदर्शन किया था. तब उसने भारी हथियारों का जखीरा प्रदर्शित किया था जिसमें बैलिस्टिक मिसाइलें, एयर डिफेंस सिस्टम और पायलट रहित एरियल व्हीकल शामिल थे

ईरान ने इराक के साथ 8 साल तक चले युद्ध की 44वीं वर्षगांठ पर 26 सितंबर 2024 को अपनी जमीन से हवा में मार करने वाली एस-200 मिसाइल का प्रदर्शन किया था. तब उसने भारी हथियारों का जखीरा प्रदर्शित किया था जिसमें बैलिस्टिक मिसाइलें, एयर डिफेंस सिस्टम और पायलट रहित एरियल व्हीकल शामिल थे
Photo Credit: AFP

क्या है असली विवाद?

ऊपरी तौर पर विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का आरोप है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है. वहीं ईरान ये कहता आया है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जैसे कि ऊर्जा, चिकित्सा और वैज्ञानिक शोध. लेकिन जानकारों का मानना है कि असली मुद्दा तकनीक नहीं बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन है. अमेरिका चाहता है कि मध्य-पूर्व में उसकी रणनीतिक बढ़त बनी रहे, जबकि ईरान खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है.

परमाणु समझौते की कहानी

2015 में बराक ओबामा प्रशासन के दौरान ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था. इस समझौते में ईरान ने यूरेनियम संवर्धन सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार करने पर सहमति दी थी, बदले में आर्थिक प्रतिबंध हटाए गए. लेकिन 2018 में अमेरिका समझौते से बाहर निकल गया और प्रतिबंध फिर लगा दिए. इसके बाद भरोसा टूट गया. ईरान ने धीरे-धीरे समझौते की शर्तें कम मानना शुरू कर दिया. साथ ही, इस दौरान दोनों पक्ष एक-दूसरे पर धोखा देने का आरोप लगाते रहे हैं. जानकारों की नजर में यही भरोसे की कमी आज के संकट की सबसे बड़ी वजह है.

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ईरान का समुद्री भूगोल- संघर्ष का एक संवेदनशील मोर्चा

मध्य-पूर्व का भूगोल इस टकराव को और जोखिम भरा बनाता है. खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के एक सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है. आंकड़ों के मुताबिक दुनिया भर में सप्लाई किए जाने वाला तेल का करीब हर पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. तो अगर यहां सैन्य टकराव हुआ तो सबसे पहले तो सप्लाई चेन प्रभावित हो सकता है. जानकारों के मुताबिक बड़े हमले की स्थिति में ईरान होर्मुज स्ट्रेट बंद कर सकता है, इससे पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति बाधित होगी और विभिन्न अर्थव्यवस्थाओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. तेल की कीमतें अचानक बढ़ सकती हैं और साथ ही वैश्विक शेयर बाजार में गिरावट आ सकती है. 

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हमले के लिए अमेरिका किसका इंतजार कर रहा है?

फरवरी 2026 की वर्तमान स्थिति के अनुसार, अमेरिकी सेना ईरान की सीमा के पास हमले की तैयारी में तो है, लेकिन  उसके अभी हमला न करने के पीछे कई रणनीतिक और कूटनीतिक कारण हैं. दोनों देशों के बीच बढ़ते तनाव के बीच ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल बुसैदी ने इसकी पुष्टि की कि जिनेवा में 26 फरवरी से उनके बीच फिर बातचीत होगी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को 10 से 15 दिनों की भीतर समझौता करने की चेतावनी मिल चुकी है. ऐसे में जानकारों के मुताबिक अमेरिकी सेना की तैनाती खासकर ईरान पर दबाव बनाने की उद्देश्य से की गई है, ताकि वो परमाणु कार्यक्रम और अन्य मुद्दों पर ट्रंप की शर्तें मान ले.

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Photo Credit: US Navy

युद्ध या सर्जिकल स्ट्राइक जैसा हमला- ट्रंप को लेना है फैसला

उधर ट्रंप प्रशासन भी इस पर विचार कर रहा है कि अगर कोई समझौता नहीं हुआ तो हमला किस रूप में किया जाना चाहिए. क्या यह सीमित हमला जैसे कि सर्जिकल स्ट्राइक हो सकता है या एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया जाएगा, इसे लेकर अमेरिका ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है. 

भले ही अमेरिका ने दो एयरक्राफ्ट कैरियर और भारी संख्या में लड़ाकू विमान ईरान की सीमा पर तैनात कर दिए हैं पर जानकारों की मानें तो अगर ये युद्ध लंबा चला तो अमेरिका को उसके लिए और तैयारी करनी होगी, साथ ही उसे सहयोगियों के समर्थन की जरूरत भी पड़ सकती है.

ऐसे में फिलहाल अमेरिका अभी 'रुको और देखो' की. स्थिति में है और फिलहाल 26 फरवरी की जिनेवा वार्ता पर सबकी निगाहें टिकी हैं कि परमाणु समझौते को लेकर ईरान का रुख क्या होता है. क्योंकि युद्ध होगा या नहीं यह बहुत हद तक इसी जिनेवा वार्ता के नतीजों पर निर्भर होगा.

यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों से अमेरिकी सेना की ईरान की सीमा के पास मौजूदगी के बावजूद अब तक हमला नहीं किया है.

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