- ईरान युद्ध के दौरान यूरोप की प्रमुख शक्तियों की आवाज अमेरिका और अन्य खिलाड़ियों द्वारा अनसुनी की जा रही है
- ब्रिटेन ने युद्ध में सैन्य भागीदारी से दूरी बनाए रखी और कूटनीतिक दौरों को प्राथमिकता दी है
- यूरोप के देश अपनी सैन्य क्षमता और तकनीकी रिसर्च में पिछड़ गए हैं, जिससे उनकी वैश्विक प्रभावशीलता कम हुई है
ईरान युद्ध में पहली बार यूरोप की आवाज सुनाई नहीं दे रही. ऐसा भी नहीं है कि यूरोप के देश बोल नहीं रहे, मगर उसकी आवाज अनसुनी कर दी जा रही है. इस युद्ध के शुरू होने से पहले तक यूरोप के ब्रिटेन, फ्रांस, इटली जैसे देशों के प्रधानमंत्रियों की एक आवाज पर एशिया और खाड़ी के देश सतर्क हो जाया करते थे. मगर युद्ध के बाद स्थिति बदल गई है और ऐसी बदली है जैसा पहले कभी नहीं हुआ. कभी दुनिया पर राज करने वाला यूरोप आज अपनी ही आवाज की खनक नहीं सुन पा रहा है.
आखिर हुआ क्या
फ्रांस से तो अमेरिका के रिश्ते खट्टे-मीठे रहे हैं. मैक्रों-बाइडेन की लड़ाई और फिर ट्रंप-मैक्रों की लड़ाई अक्सर सुर्खियां बनती रही हैं. ऐसे में फ्रांस का इस जंग में अलग-थलग पड़ना तो समझ आता है. मगर ब्रिटेन तो अमेरिका की परछाई माना जाता रहा है. जंग शुरू के बाद सभी को उम्मीद थी कि ब्रिटेन भी इसमें जरूर शामिल होगा. मगर वो नहीं हुआ. पिछले हफ्ते ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और कतर के बीच घूमते रहे, जबकि असल में महत्वपूर्ण फैसले कहीं और लिए जा रहे थे. अमेरिका और ईरान के बीच नाजुक युद्धविराम को वाशिंगटन और तेहरान में आकार दिया जा रहा था और पाकिस्तान लाइमलाइट चुरा रहा था.

ब्रिटिश सरकार का कहना है कि यह कूटनीति का समय है, सैन्य तनाव बढ़ाने का नहीं. स्टारमर ने संघर्ष में प्रत्यक्ष भागीदारी से ब्रिटेन को दूर रखने में सावधानी बरती है, वैधता, संयम और दीर्घकालिक स्थिरता की आवश्यकता पर जोर दिया है, सतही तौर पर, यह संतुलित - शायद बुद्धिमानी भरा भी - प्रतीत होता है, लेकिन प्रभाव के बिना कूटनीति केवल दिखावा है. कड़वा सच यह है कि ब्रिटेन को नजरअंदाज करना कोई संयोग नहीं है. उसे नजरअंदाज किया जा रहा है, क्योंकि अब इसका उतना महत्व नहीं रह गया है, जितना पहले था.

वहीं ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शपथ समारोह में खास तौर पर मेहमान रहीं इटली के प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी की चमक भी ईरान युद्ध में फीकी पड़ती जा रही है. जब वो ट्रंप के करीब थीं तो दुनिया के देश उनकी बातों को महत्व दे रहे थे, मगर अब सब कुछ बदल चुका है. वो शुरूआत में यूरोप से अमेरिका को जोड़ने का माध्यम बनने की कोशिश कर रही थीं, मगर जब ईरान पर अमेरिका ने हमला किया तो उन्होंने दूरी बनानी शुरू कर दी. वो इस युद्ध में शामिल नहीं हुईं और सिर्फ बयान जारी कर रही हैं. उनकी कोशिश थी कि अगले साल इटली के होने वाले चुनाव से पहले जंग में नहीं उतरा जाए. साथ ही तेल और गैस की किल्लत और महंगाई का भी ठीकरा वो अपने सिर नहीं लेना चाहती थीं. इसके साथ ही उन्होंने यूरोप के देशों का साथ देकर उन्हें भी साध लिया और ट्रंप से दूरी बना ली. हालांकि, उन्होंने कूटनीति का सही इस्तेमाल किया या चूक गईं, ये बात तो बाद में पता लगेगी, लेकिन इतना तो तय है कि ईरान युद्ध में उनकी आवाज भी अनसुनी ही है. फ्रांस और जर्मनी भी बयान जारी करने और अपील करने तक ही सीमित रह गए हैं. कुल मिलाकर कहें कि यूरोप ग्लोबल प्लेयर वाले रोल में अब नहीं रहा. उसकी आवाज को ना तो अमेरिका भाव दे रहा है और ना ही रूस, चीन. यहां तक की खाड़ी के देश भी उनकी सीमा पहचान चुके हैं.

आखिर ऐसा हुआ क्यों
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इन सभी देशों ने अमेरिका की छत्रछाया स्वीकार कर ली. नाटो बन गया. उन्हें लगा कि अब तो कोई देश उन पर हमला करेगा नहीं और वो अमेरिका के साथ मिलकर किसी भी देश पर दबाव बना देंगे. इस चक्कर में वो अपनी सेना कम करते गए. सैन्य साजो-सामान पर भी खर्च कम कर दिया. यहां तक की कभी रिसर्च में अव्वल रहने वाला यूरोप उसमें भी पिछड़ता गया. यूरोप समय के साथ नहीं बदला और देखते-देखते अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश उससे बहुत आगे निकल गए. ट्रंप के आने से पहले तक अमेरिका के सभी राष्ट्रपति यूरोप को महत्व देते रहे थे तो यूरोप को कभी अपनी सही ताकत का अंदाजा नहीं हुआ. हालांकि, ट्रंप ने धीरे-धीरे जब यूरोप को झिड़कना शुरू किया तो उन्हें अपनी हैसियत का अंदाजा होने लगा. मगर तब तक देर हो चुकी थी. यूरोप आज के समय में किसी भी ताकतवर देश से लड़कर जीतने की स्थिति में नहीं है. ईरान युद्ध में नाटो ने एंट्री नहीं करके ट्रंप को और ज्यादा आक्रामक कर दिया. वो उन्हें कायर तक कह चुके हैं. जाहिर है यूरोप का अमेरिका से रिश्तों में इतना तनाव पूरी दुनिया देख और समझ रही है. सो अब दुनिया भी यूरोप की ताकत के हिसाब से उसे भाव दे रही है.
अब आगे यूरोप का क्या होगा
ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी जैसे देश अपनी सेना को अब मजबूत करने में जुट गए हैं. वो छठी पीढ़ी के फाइटर जेट भी बनाने में जुटे हुए हैं. इसी तरह रिसर्च में भी पैसा लगाना शुरू कर चुके हैं. मगर अब देर इतनी हो गई है कि उन्हें सालों लग जाएंगे अपने को खड़ा करने में. साथ ही यूरोप की अर्थव्यवस्था भी अब डगमगा रही है. जर्मनी को छोड़ दें तो यूरोप के सभी देशों की हालत बहुत अच्छी नहीं है. साथ ही जनसंख्या के मामले में भी वो बहुत कम हैं. यूरोप के लोग अब सेना में भर्ती नहीं होना चाहते. ऐसे में इन सभी मोर्चों को संभालने में यूरोप को दशकों लग जाएंगे, फिर भी वो शायद ही अपना खोया हुआ रुतबा पा सके.
ऐसी स्थिति में आने वाले समय में यूरोप को अपनी साख बचाना बहुत मुश्किल हो जाएगा. बिजनेस से लेकर अपनी सीमा की रक्षा करने में भी उन्हें मुश्किलें आएंगी. क्योंकि ट्रंप कह चुके हैं ईरान युद्ध में नाटो का नहीं आना अमेरिका याद रखेगा. यूरोप के लिए दिक्कत ये भी है कि रूस से उसका छत्तीस का आंकड़ा है. चीन से भी उसकी नहीं बनती और अब अमेरिका भी उसे पसंद नहीं करता. ऐसे में उसके लिए दिखावे के लिए ही सही अपनी मौजूदगी बनाए रखना बेहद मुश्किल रहेगा.
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