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इस बार कितने अलग हैं ईरान में हो रहे विरोध-प्रदर्शन, खामेनेई की सरकार के पास हैं क्या-क्या विकल्प

ईरान में आम लोगों के विरोध प्रदर्शन के बाद हालात दिन प्रतिदिन खराब होते जा रहे हैं. ऐसा नहीं है कि ईरान में पहली बार प्रदर्शन हो रहे हैं. आइए जानते हैं कि ईरान में विरोध प्रदर्शनों का इतिहास क्या रहा है. और अब ईरान के पास कैसे विकल्प बचे हुए हैं.

इस बार कितने अलग हैं ईरान में हो रहे विरोध-प्रदर्शन, खामेनेई की सरकार के पास हैं क्या-क्या विकल्प
नई दिल्ली:

ईरान में लोगों का सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन बढ़ता ही जा रहा है. ईरान पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आशंका भी बढ़ गई है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान को समझौता करने या हमला झेलने के लिए तैयार रहने को चेतावनी दे रहे हैं. इसे देखते हुए भारत समेत कई देशों ने अपने नागरिकों से ईरान छोड़ने को कहा है. यह, यह बताने के लिए काफी है कि ईरान के विरोध प्रदर्शन किस दिशा में जा रहे हैं. यह उस ईरान में हो रहा है, जहां के लिए विरोध-प्रदर्शन कोई नई बात नहीं हैं. आइए जानते हैं कि इस बार के विरोध प्रदर्शन पिछले विरोध प्रदर्शनों से अलग क्यों हैं.

ईरान में आंदोलनों का सिलसिला

अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से ही ईरान आंदोलनों और प्रदर्शनों का गवाह रहा है. आर्थिक पाबंदियों से परेशान ईरान की जनता कई बार महंगाई आदि को लेकर सड़कों पर उतरती रही है. लेकिन इस बार के प्रदर्शन हिंसक और जानलेवा हैं. इसकी वजह ईरान के अंदर पैदा हुआ आर्थिक और सामाजिक दबाव और अमेरिकी चेतावनियां या प्रदर्शनकारियों को वहां से मिला प्रदर्शन है. इस वजह से ईरानी सरकार के पास विकल्प बहुत सीमित हैं. ईरान के सामने सीरिया का उदाहरण भी है, जहां बशर अल असद की सत्ता को एक संगठित विद्रोह ने नेस्तनाबूद कर दिया था. सीरिया से केवल असल को ही नहीं बल्कि रूस और ईरान को भी भागना पड़ा था. 

ईरान में आजकल हो रहे विरोध-प्रदर्शन पिछले साल 28 दिसंबर को शुरू हुए थे. उस दिन तेहरान के मशहूर ग्रैंड बाजार में दुकानदारों ने ईरानी मुद्रा 'रियाल' की डॉलर के मुकाबले आई भारी गिरावट के खिलाफ सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया था. पहले यह केवल व्यापारियों का प्रदर्शन था. लेकिन बाद में इसमें समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग शामिल होते गए और यह देश के छोटे-बड़े शहरों में फैल गया. 

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ईरानी रियाल की रसातल में जाती कीमत

ईरानी रियाल की गिरती कीमत कोई समस्या नहीं थी, बल्कि यह लंबे समय से चली आ रही कई गंभीर समस्याओं की कड़ी थी. ईरान पहले से ही पानी की कमी, बिजली कटौती, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई से जूझ रहा था. इससे आम ईरानी का जीवन बहुत कठिन हो गया था. लेकिन 2018 में लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों ने हालात को और भी खराब कर दिया. इसने लाखों ईरानियों की जिंदगी को प्रभावित किया. ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने 2015 के परमाणु समझौते के तहत हटाए गए संयुक्त राष्ट्र की सभी पाबंदियों को सितंबर 2025 में फिर से लागू कर दिया था. इससे ईरान में खाद्य महंगाई 70 फीसदी से ज्यादा हो गई. दिसंबर में ईरानी मुद्रा रियाल डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गई. लोगों का सरकार से भरोसा उठने लगा. उन्हें भरोसा नहीं रहा कि सरकार बिगड़ती अर्थव्यवस्था सुधार पाएगी. राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने विरोध शुरू होने से पहले ही कह दिया था कि देश के आर्थिक हालत पर वो कुछ नहीं कर सकते हैं. उनका यह बयान ईरान के हालात बताने के लिए काफी था. 

ईरान में हालात पिछले साल उस समय और खराब हो गए जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जून में ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का आदेश दिया. उन्होंने पिछले साल दिसंबर में शुरू हुए विरोध-प्रदर्शन के बाद खुले तौर पर प्रदर्शनकारियों की मदद करने और ईरान पर हमले की बात दोहराई.

आम लोगों के प्रदर्शन पर ईरानी सरकार का रुख

प्रदर्शन शुरू होने के बाद ईरान की सरकार ने लोगों की नाराजगी शांत करने के लिए कुछ आर्थिक सुधारों की घोषणा की. इनमें केंद्रीय बैंक के गवर्नर को बदलना और जरूरी सामान के आयात पर लगने वाले शुल्क को खत्म करना शामिल था. इसके बदले सरकार ने हर व्यक्ति को हर महीने करीब सात डॉलर मासिक की नकद देने का वादा किया.लेकिन सरकार के कदम लोगों के गुस्से को कम नहीं कर सके. 

जैसे-जैसे लोगों का विरोध बढ़ा, वैसे-वैसे सरकारी सुरक्षा बलों का दमन भी बढ़ा. सरकार ने आठ जनवरी के बाद कम्यूनिकेशन करीब-करीब बंद कर दिया. इंटरनेट और मोबाइल सेवाओं पर पाबंदियां लगा दीं और हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया.इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान कितने आम लोगों मौत हुई है, इसका कोई सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं हैं.लेकिन सरकार ने माना है कि अब तक 100 से अधिक सुरक्षा कर्मियों की मौत हुई है. न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने एक ईरानी सुरक्षा अधिकारी के हवाले से बताया था कि मरने वालों की संख्या करीब दो हजार हो सकती है.

ईरान में लोगों के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में इटली के मिलान में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन करते लोग.

ईरान में लोगों के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में इटली के मिलान में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन करते लोग.

राजनीतिक  विश्लेष्कों का कहना है कि यह पहली बार नहीं है जब ईरानी सरकार ने सख्त कदम उठाए हों. लेकिन इस बार फर्क यह है कि सरकार के पास आगे बढ़ने का कोई साफ रास्ता नहीं दिख रहा है. भले ही वह इस आंदोलन को दबाने में सफल क्यों न हो जाए.

आंदोलनों से जनता को मिली राहत

इससे पहले हुए आंदोलनों के बाद ईरान की सरकार ने लोगों को कुछ राहत देने की कोशिशें की थीं.
2009 के बड़े प्रदर्शनों के बाद ईरान ने पश्चिमी देशों से बातचीत कर परमाणु समझौता किया.
2019 में आर्थिक कारणों से हुए आंदोलनों के बाद सरकार ने सब्सिडी जारी रखी.
2022 में महिलाओं के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों के बाद कुछ सामाजिक नियमों में ढील दी गई.

लेकिन आज ईरान की सरकार के पास आर्थिक समस्याओं को हल करने के ज्यादा विकल्प नहीं हैं. इससे यह एहसास पैदा हो रहा है कि सरकार एक तरह अपने अंत की ओर बढ़ रही है. इसकी वजह यह है कि ईरान केवल आंतरिक नहीं बल्कि बाहरी दबाब से भी परेशान है. उसकी परेशानी यह भी है कि उसके 'एक्सिस  ऑफ रेजिस्टेंस' नॉन स्टेट एक्टर काफी कमजोर पड़ चुके हैं. अक्तूबर 2023 में हुए हमले के बाद से इजरायल ने 'एक्सिस  ऑफ रेजिस्टेंस' में शामिल नॉन स्टेट एक्टर को चुन-चुन कर निशाना बनाया है, इसमें गजा का हमास, यमन के हूती और लेबनान का हिजबुल्लाह शामिल है. इजरायल के साथ पिछले साल जून में हुए 12 दिन के युद्ध से भी ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ा है. वह कमजोर हुआ है. ताजा विरोध प्रदर्शन को विशेषज्ञ उस 12 दिन के युद्ध का अगला चरण मान रहे हैं.

ईरान का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व व्यवस्था एकजुट दिखाई दे रहा है. सेना में किसी बड़े विद्रोह की खबर नहीं है. लेकिन गहराते आर्थिक संकट और बाहरी हस्तक्षेप की आशंका के बीच ईरान के पास रणनीतिक विकल्प बेहद कम होते जा रहे हैं.

विश्लेषकों को मानना है कि ईरान के पास विकल्प बहुत सीमित हैं,या तो वह युद्ध में उलझे या वेनेजुएला जैसा अमेरिका के साथ किसी समझौते में शामिल हो, जिसकी बात राष्ट्रपति ट्रंप लगातार कह रहे हैं. अमेरिका के साथ समझौते में ईरान में सत्ता परिवर्तन हो सकता है, भले ही शासन की मूल व्यवस्था पुरानी ही रहे. इसमें भी देखने वाली बात यह होगी अमेरिका ईरान के लिए वेनेजुएला वाला मॉडल अपनाता है या बांग्लादेश वाला. 

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