अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को ईरान के साथ जारी युद्धविराम को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया. उन्होंने इसकी घोषणा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर की. उन्होंने युद्धविराम खत्म होने से कुछ देर पहले यह घोषणा की. ईरान और अमेरिका मंगलवार को पाकिस्तान में वार्ता का दूसरा दौर शुरू करने वाले थे. लेकिन यह बातचीत नहीं हो पाई. ईरान ने कहा है कि उसके बंदरगाहों की नाकेबंदी युद्ध जैसी कार्रवाई के बराबर है. उसने इसे युद्धविराम का उल्लंघन बताया है. इसी आधार पर वह वार्ता में शामिल होने के लिए तैयार नहीं हुआ. हालांकि अमेरिका और ईरान में मुख्य तौर पर दो विषयों को लेकर पेंच फंसा हुआ है. इनमें से एक है होर्मुज स्ट्रेट और दूसरा है ईरान का परमाणु कार्यक्रम. आइए जानते हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम क्या है और क्या अमेरिका और ईरान के संबंध हमेशा से ऐसे ही थे.
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और समझौता
संयुक्त राष्ट्र परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने 2003 में खबर दी कि ईरान पिछले करीब 18 साल से एक परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है. लोगों को इस खबर पर आश्चर्य इस बात पर हुआ क्योंकि ईरान परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने वाले देशों में शामिल है. इसके बाद उसकी आलोचना होने लगी. हालांकि ईरान का कहना था कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों को लेकर है. लेकिन उसकी बातों पर किसी को यकीन नहीं हुआ, खासकर अमेरिका को. उसे लगा कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश कर रहा है. उसके बाद से अमेरिका ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के काम में लग गया. यह काम जॉर्ज डब्लू बुश से कार्यकाल से शुरू हुआ और डोनाल्ड ट्रंप तक के कार्यकाल में भी जारी है. इस बीच बराक ओबामा और जो बाइडेन भी राष्ट्रपति बन चुके हैं.
इस बीच डेमोक्रेट राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में जुलाई 2015 में ईरान और अमेरिका के बीच एक परमाणु समझौता हुआ. ईरान और अमेरिका के साथ इसमें ब्रिटेन, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी भी शामिल थे. समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और उसकी नियमित निगरानी पर सहमति जताई थी. इसके बदले में उस पर लगी पाबंदियों में राहत दी गई थी.समझौते में यूरेनियम एनरिचमेंट की सीमा 3.67 फीसद तय की गई थी. इस स्तर पर केवल परमाणु ऊर्जा का ही उत्पादन किया जा सकता है, परमाणु बम नहीं बन सकता.
समझौते के समय ईरान में नतांज और फोर्डो में यूरेनियम संवर्धन की सुविधा थी.इसका उपयोग परमाणु ऊर्जा के लिए किया जाता था. इन्हीं संयंत्रों का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में भी किया जा सकता था.समझौते में यह शर्त थी कि शोध और विकास के लिए नातांज परमाणु संयंत्र का इस्तेमाल अधिकतम आठ साल तक ही किया जा सकता है. इसके अलावा फोर्डो में अगले 15 साल तक इस तरह की शोध गतिविधियों पर रोक लगाने की बात थी. ईरान ने जनवरी 2016 में यूरेनियम केंद्रों की संख्या कम की. उसने निचले दर्जे का सैंकड़ों किलो यूरेनियम रूस भेज दिया था.

ईरान के साथ परमाणु समझौते से कब बाहर आया अमेरिका
रिपब्लिकन नेता डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका मई 2018 में इस समझौते से बाहर आ गया. ट्रंप का कहना था कि यह समझौता ईरान को परमाणु बम बनाने से रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है. उस समय ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी थे. उन्होंने परमाणु संस्थाओं को कहा कि वो औद्योगिक स्तर पर यूरेनियम संवर्धन को बढ़ावा देने की प्रक्रिया शुरू करें. इसके बाद ईरान ने यूरेनियम संवर्धन का कार्यक्रम तेज कर दिया. उसने 3.67 फीसदी की सीमा को तोड़ते हुए यूरेनियम का 60 फीसदी से अधिक सीमा तक संवर्धन किया. यह बम बनाने के लिए जरूरी 90 फीसद संवर्धन के काफी करीब है.
माना जाता है कि ईरान के पास करीब 440 किलोग्राम यूरेनियम है. आईएईए के मुताबिक इतना यूरेनियम 10 परमाणु बम बनाने के लिए काफी है. आईएईए ने पिछले साल 12 जून को कहा था कि ईरान अपने परमाणु अप्रसार दायित्वों का उल्लंघन कर रहा है. इसके अगले ही दिन इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया था. यह युद्ध 12 दिन के युद्ध के रूप में मशहूर है. ईरान का संवर्धित यूरेनियम उसके तीन परमाणु संयंत्रों में होने की बात कही जाती है. ये संयंत्र इस्फहान, नतांज और फोर्डो में स्थित हैं. इस्फहान और नतांज संयंत्र भूमिगत हैं. इन तीनों संयंत्रों पर अमेरिका ने 2025 में बम बरसाए थे.
किसने शुरू कराया था ईरान का परमाणु कार्यक्रम
यहां यह जान लेना भी महत्वपूर्ण है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अमेरिका की मदद से ही शुरू हुआ था. दरअसल अमेरिका के 34वें राष्ट्रपति ड्वाइट डी आइजनहावर ने शांति पूर्ण उद्देश्य (एटम्स फॉर पीस) से परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए इसकी तकनीकी विकासशील देशों को देने की शुरूआत की थी. इसी के तहत अमेरिका और ईरान ने पांच मार्च 1957 को परमाणु सहयोग पर एक समझौता किया था. उस समय ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी की अमेरिका परस्त सरकार थी. अमेरिका की मदद से शुरू हुआ ईरान का परमाणु कार्यक्रम आज उसके लिए ही परेशानी का सबब बन गया है.
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