कॉकरोच जनता पार्टी के प्रोटेस्ट में गाजियाबाद के मोहम्मद जुनैद ने खाना बांटकर खूब सुर्खियां बटोरीं. छात्रों की मांग पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया. इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर का धरना-प्रदर्शन जीत के जश्न में तब्दील हो गया तो सबका सवाल यही था कि जुनैद कहां गायब हैं. एनडीटीवी ने जब जुनैद से यह सवाल पूछा तो जवाब में सामने आई 24 घंटे चली अपहरण, अंधेरे, खौफ और दहशत की कहानी.
जुनैद बताते हैं कि मैं प्रोटेस्ट के आखिरी दिन दुर्भाग्यवश मौके पर मौजूद नहीं था क्योंकि उससे एक दिन पहले 24 जुलाई को रात में प्रोटेस्ट साइट पर एक कुत्ते ने मेरे पैर पर काट लिया. इलाज के लिए मैं अपने दोस्त के साथ ऑटो से दिल्ली के राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल पहुंचा क्योंकि साइट पर इंटरनेट बंद था और कैब बुक नहीं हो सकती थी.

सीजेपी प्रोटेस्ट में मोहम्मद जुनैद लोगों को फ्री में खाना खिलाते थे.
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सफेद स्कॉर्पियो, हट्टे-कट्टे लोग और दहशत!
जुनैद कहते हैं कि मैं और मेरा दोस्त आरएमएल हॉस्पिटल से रात करीब 12 बजकर 10 मिनट पर इलाज करवाने के बाद जंतर-मंतर के लिए ऑटो से निकले थे. ऑटो अभी सिर्फ 50 मीटर ही चला कि इतने में अचानक एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो आई और ऑटो के आगे खड़ी हो गई. हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही स्कॉर्पियो से चार-पांच हट्टे-कट्टे नौजवान निकलते हैं और दोनों साइड से हमें घेर लिया जाता है. हम डर गए लेकिन उन्होंने कहा कि हम दिल्ली पुलिस से हैं, घबराइओ मत. हमने उनसे उनका कार्ड मांगा तो उन्होंने इतना तेजी से दिखाकर वापस रख लिया कि उसपर क्या नाम लिखा है ये हम नहीं पढ़ पाए.
जुनैद बताते हैं कि पूरी राज गुजर गई और हमारी आंखों की पट्टी नहीं खोली गई. सुबह हुई और करीब साढ़े ग्यारह बजे मुझसे और मेरे साथी से सवाल किए गए कि यह सब क्यों कर रहे हो, कौन तुम्हारी मदद कर रहा है.

मोहम्मद जुनैद
उन्होंने आग बताया कि हमें एक जंगल जैसी जगह पर छोड़ा गया और कहा गया कि पांच मिनट तक आंख से पट्टी नहीं खोलनी है और एक घंटे तक मोबाइल फोन नहीं ऑन करना है. जब हमने पट्टी खोली तो वे जा चुके थे. वहां हमें कोई नजर नहीं आ रहा था. जब हमने एक राहगीर से पूछा तो पता चला कि हम पूरे 260 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के मसूरी में हैं. जुनैद बताते हैं कि इसके बाद हम कैब के जरिए दिल्ली आए.
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'जिंदगी भर दुख रहेगा...'
मोहम्मद जुनैद के मुताबिक उन्हें 24 जुलाई की रात दिल्ली से उठाया गया था और 25 जुलाई की शाम छोड़ा गया, उसी दिन जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपना इस्तीफा सौंपा था, इसीलिए जुनैद छात्रों के साथ जंतर-मंतर पर सेलिब्रेशन में नहीं शामिल हो पाए थे.
जुनैद कहते हैं कि मुझे पूरी जिंदगी इस बात का दुख रहेगा कि मैं आखिरी दिन जंतर-मंतर पर खुशी के लम्हों में शामिल नहीं रह सका. कई ऐसे लोगों से मुलाकात नहीं हो सकी, जिनसे मैं कभी मिल नहीं पाऊंगा. हम चाहते थे आखिरी पलों में लोगों से मुलाकात होती और उनकी बातें सुनते. रात करीब ग्यारह बजे हम दिल्ली पहुंचे, तब तक जंतर-मंतर से लोग जा चुके थे.
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