अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब समेत कई खाड़ी देशों पर अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर करने का दबाव डाला है. हालांकि पाकिस्तान की ओर से इस समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि ये पाकिस्तान की विचारधारा को नामंजूर है. पाकिस्तान ने कहा कि वह ऐसी मांगों को स्वीकार करने के लिए किसी भी तरह से बाध्य नहीं है और उसने दोहराया कि इजरायल को मान्यता देना एक संप्रभु फिलिस्तीनी राज्य के निर्माण से जुड़ा हुआ है.
देश के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने समझौतों में शामिल होने के विचार की आलोचना की और इजरायल की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए पूछा, "आप उन लोगों के साथ कैसे बैठेंगे जिनके शब्दों पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?"
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लेकिन पाकिस्तान के सुर बदलने में देर नहीं लगते हैं. जानकार बताते हैं कि पाकिस्तान सऊदी अरब की आस में बैठा है और उसी का पिछलग्गू बन कर इस मुसीबत से पार पाना चाहता है. दूसरी ओर ट्रंप लगातार दबाव बना रहे हैं. ऐसे में अगर पाकिस्तान ट्रंप के प्रेशर के आगे घुटने टेकता है तो उसे अपने पासपोर्ट में बदलाव करना पड़ेगा. यानी पाकिस्तान अगर इजरायल को मान्यता देता है तो उसे पासपोर्ट में बदलाव करना पड़ेगा.
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क्यों पासपोर्ट बदलना पड़ेगा?
यानी अगर इजरायल और पाकिस्तान में कभी राजनयिक संबंध स्थापित होते हैं तो उसे अपना पासपोर्ट बदलना होगा. नए पासपोर्ट में 'इजरायल को छोड़कर' वाली लाइन हटानी होगी.
अब्राहम समझौता क्या है?
अब्राहम समझौता अमेरिका की मध्यस्थता में 2020 में हुआ एक ऐतिहासिक शांति समझौता है. इसका मकसद इज़रायल और कई अरब देशों के बीच दशकों पुरानी रंजिश को खत्म कर राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है. इसके अलावा पश्चिम एशिया को बैलेंस और अमन-चैन की लिए ये शांति समझौता अमल में लाया गया था. इस समझौते का अहम लक्ष्य मध्य पूर्व में ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकना और अमेरिका के नेतृत्व में एक नया क्षेत्रीय समीकरण तैयार करना है.
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