- सऊदी पर यमन के हूती विद्रोही संगठन के हमले लगातार जारी हैं और सऊदी को अपनी एक प्रमुख पाइपलाइन बंद करनी पड़ी है
- अमेरिका ने हूती पर सीधे सैन्य कार्रवाई करने से इनकार किया है और मिडिल ईस्ट में युद्ध बढ़ाने से बचना चाहता है
- पाक ने मक्का पैक्ट के तहत हूती हमलों पर सैन्य मदद से इंकार कर दिया है, जबकि तुर्की भी इस समझौते में शामिल है
सऊदी अरब पर यमन के विद्रोही संगठन हूती के हमले अब भी जारी हैं. इस बीच सऊदी अरब को बड़ा झटका लगा है. अमेरिका का कहना है कि वह हूती के खिलाफ सीधे तौर पर हमले करने का कोई विचार नहीं कर रहा है. इसके अलावा पाकिस्तान ने भी मक्का पैक्ट के हवाले से कहा है कि उस समझौते में हूती जैसे किसी संगठन के हमले पर सैन्य मदद की बात शामिल नहीं थी. इन हमलों के चलते सऊदी अरब को अपनी एक अहम पाइपलाइन भी बंद करनी पड़ी है. इसके बाद भी हूती विद्रोहियों के हमले जारी हैं और अब उसने लाल सागर में सऊदी अरब के अहम शिपिंग रूट को भी बाधित करने की बात कही है.
उसकी ओर से लगातार ड्रोन हमले जारी हैं. यह बड़ा संकट है क्योंकि हूती ऐसे समय में लाल सागर पर रूट को प्रभावित करना चाहता है, जब ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बाधा पैदा की है. लेकिन सऊदी अरब बड़ी मुश्किल में फंसता दिख रहा है. दशकों तक इस्लाम के टॉप मुल्क के तौर पर पहचान रखने वाला सऊदी अरब खुद को कमजोर महसूस कर रहा है. उसे पाकिस्तान का साथ नहीं मिल रहा है, जबकि अमेरिका ने इनकार कर दिया है. यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान ने ऐसे समय में साथ नहीं दिया है, जब कुछ महीने पहले ही दोनों ने मक्का पैक्ट किया था. इस मक्का पैक्ट में कहा गया था कि किसी एक पर होने वाला हमला दोनों पर माना जाएगा. इस पैक्ट में अब तुर्की भी शामिल हो गया है.
सऊदी अरब में अमेरिका के पूर्व राजदूत माइकल रैटने ने कहा कि हाल के घटनाक्रमों ने सऊदी किंडगम की बेचैनी बढ़ा दी है. उन्होंने कहा कि अमेरिका को एक विश्वसनीय सहयोगी सऊदी अरब नहीं मान सकता. उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप अब मिडल ईस्ट में जंग का एक और मोर्चा नहीं खोलना चाहते. इसके अलावा ईरान का हाथ भी इसमें माना जा रहा है. हूती, हमास और हिजबुल्ला तीनों ही उसके समर्थन वाले विद्रोही संगठन माने जाते हैं. जानकारों का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अपनी पकड़ कमजोर होने के बाद अब ईरान ने सऊदी अरब पर हूती के जरिए दबाव बढ़ाया है.
अमेरिका ने सीधे तौर पर झाड़ लिया पल्ला, अकेला पड़ा सऊदी अरब?
बता दें कि इजरायल और अमेरिका के हमलों के बाद ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर जैसे देशों पर हमला किया था. ऐसे में एक बार फिर से ईरान ने सऊदी अरब की मुश्किल बढ़ा दी है, लेकिन अब तक सऊदी किंगडम को किसी का साथ नहीं मिला है. सऊदी किंगडम के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने सालों तक काफी मेहनत की है. सऊदी अरब को वह एक उन्नत अर्थव्यवस्था बनाने में जुटे रहे हैं. ग्लोबल बिजनेस हब के तौर पर वह सऊदी अरब को विकसित करना चाहते हैं, लेकिन सैन्य मामलों में एक कमजोरी दिखती है. अब उसका असर भी सामने आने लगा है.
अक्टूबर 2023 के बाद से ही सऊदी अरब के लिए बदले हालात
खासतौर पर 7 अक्तूबर 2023 को हमास की ओर से इजरायल पर हुए हमले ने हालात बदल दिए हैं. इजरायल पर हमला हुआ तो उसने फिलिस्तीन में इतने हमले किए कि करीब एक लाख लोग मारे गए हैं. पूरा गाजा खंडहर में तब्दील हो गया है. इसके अलावा यह विवाद ऐसा बढ़ा कि ईरान तक हमले हुए हैं. ईरान और इजरायल की जंग का असर सऊदी अरब तक दिखा है. अब सऊदी अरब की मुश्किल यह है कि अमेरिका उसके लिए जंग को नहीं बढ़ाना चाहता. वहीं मक्का पैक्ट की शर्तों का हवाला देकर पाकिस्तान ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं. बता दें कि पाकिस्तान खुद को परमाणु संपन्न राष्ट्र बताकर मुस्लिम देशों का साधने की कोशिश करता रहा है ताकि निवेश हासिल कर सके.
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