- ब्रिटिश म्यूजियम में भारत की लगभग आठ हजार से तीस हजार प्राचीन और बेशकीमती कलाकृतियां संग्रहित हैं
- MP के धार जिले में स्थापित मां वाग्देवी की मूर्ति की असली प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है
- ब्रिटिश म्यूजियम 1963 के तहत म्यूजियम को अपनी वस्तुएं किसी दूसरे देश को कानूनी रूप से सौंपने से रोका गया है
भारत कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था. एक समय था जब हिंदुस्तान खुले आसमान के नीचे आजादी की सांस लेता था. बेशुमार दौलत,धन-धान्य से भरपूर लेकिन मुगलों और बाद में अंग्रेजों ने भारत की सारी खुशियां ही छीन लीं. जिसने भी भारत पर हुकूमत की उसने सिर्फ हमारे देश को नुकसान ही पहुंचाया. साल 1700 के आसपास ब्रिटिशर्स ने भारत पर धावा बोला और क्रूरता,लूट का ऐसा नाच किया कि हम 1947 तक बेड़ियों में ही जकड़े रहे. अंग्रेज भारत से समय के साथ कई बेशकीमती धरोहरें, नायाब चीजें लूट ले गए जो आज उनके संग्रहालय की शान हैं. जो मूर्तियां, प्रतिमाएं और बेशकीमती कोहिनूर हीरा हमारी शान था वो अब उनके म्यूजियम में चार चांद लगा रहा है. लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में न जाने कितनी करोड़ों कलाकृतियां कैद हैं जिन्हें भारत और बाकी देश से लूटकर अंग्रेज अपने साथ ले गए. ऐसा इसलिए भी क्योंकि मध्य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित करने के बाद वहां स्थापित होने वाली मां वाग्देवी की असली मूर्ति लंदन के ही ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है. एमपी हाई कोर्ट ने सरकार को इसे लाने के प्रयास को तेज करने को कहा है. तो आज बात उस लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की होगी.
भारत के कौन सी धरोहरें ब्रिटिश म्यूजियम में कैद हैं?
ब्रिटिश म्यूजियम की आधिकारिक वेबसाइट की मानें तो उसके पास लगभग 8 मिलियन(80 लाख) संग्रह है. इसमें से 80 हजार चीजें संग्रहालय में देखने के लिए सजाई जाती हैं, जबकि बाकी सहेजकर प्राइवेट आर्काइव में रखी हैं. अब इनमें भारत की कौन-कौन सी हैं? हिंदुइनफोपीडिया (hinduinfopedia) की मानें तो ब्रिटिश म्यूजियम (British Museum) में भारत के हजारों प्राचीन और बेशकीमती आर्टिफैक्ट्स मौजूद हैं जिनकी सटीक संख्या लगभग 8,000 से 30,000 के बीच आंकी जाती है,म्यूजियम के पास कुल 80 लाख से अधिक वस्तुओं का संग्रह है, जिसमें से अधिकांश ऐतिहासिक भारतीय वस्तुएं औपनिवेशिक काल के दौरान वहां पहुंची थीं.
इनमें प्रमुख हैं
➔मां वाग्देवी की मूर्ति
लंदन के बीचों-बीच स्थित मशहूर 'ब्रिटिश म्यूजियम' की गैलरी संख्या 33 में, 11वीं सदी की सफेद संगमरमर से बनी अंबिका की एक मूल मूर्ति रखी हुई है.इस म्यूजियम में मौजूद करीब 80 लाख ऐतिहासिक चीजों में से यह भी एक है.कई लोगों का मानना है कि इस मूर्ति का संबंध मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला की प्रसिद्ध वाग्देवी (देवी सरस्वती) की मूर्ति से है.
➔अमरावती मार्बल्स
वर्तमान में यह ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन मैं है.यह 120 बेहद बारीकी से तराशी गई चूना पत्थर (लाइमस्टोन) की मूर्तियों और शिलालेखों का शानदार संग्रह है. यह संग्रह ईसा पूर्व पहली सदी से लेकर तीसरी सदी के बीच का माना जाता है. ये कलाकृतियां पहले आंध्र प्रदेश स्थित महान अमरावती स्तूप के चारों ओर लगी हुई थीं, जो प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्मारकों में से एक था.
➔कुलु वास (Kulu Vase)
यह भी ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में रखा है.यह एक दुर्लभ कांस्य (ब्रॉन्ज) से बना बर्तन है, जो हिमाचल प्रदेश की कुलु घाटी में मिला था.यह वास ईसा पूर्व पहली सदी (1st century BCE) का माना जाता है.इसकी खासियत यह है कि इस पर एक शाही जुलूस (royal procession) का बेहद बारीक और सुंदर चित्र उकेरा गया है. इस कलाकृति के माध्यम से हमें उस समय के कपड़े,संगीत और रथों के डिजाइन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है.
➔इलाहाबाद का जेड कछुआ (Jade Terrapin of Allahabad)
इस वक्त यह ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन में है.यह एक हरी जेड (कीमती पत्थर) से बना बेहद खूबसूरत और जीवंत कछुए का मॉडल है, जिसे 17वीं सदी की शुरुआत में एक ही पत्थर से तराशा गया था.यह कलाकृति इलाहाबाद (प्रयागराज) में एक प्राचीन जल संरचना (टैंक) के नीचे से खोजी गई थी. इसे मुगल काल की सबसे बड़ी और उत्कृष्ट जेड नक्काशी में से एक माना जाता है.
➔कोणार्क की सूर्य प्रतिमा (Surya Sculpture of Konark)
वर्तमान स्थान ब्रिटिश म्यूजियम, लंदन है.यह प्रतिमा लगभग 1200 ईस्वी के आसपास हरे क्लोराइट पत्थर से तराशी गई एक बेहद बारीक और आकर्षक कलाकृति है. यह सूर्य देवता सूर्य को दर्शाती है और इसका मूल स्थान ओडिशा के प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर में था, जिसे राजा नरसिंहदेव प्रथम ने बनवाया था. इस प्रतिमा में सूर्य देव को शाही और दिव्य स्वरूप में दिखाया गया है, उनके साथ सहायक (attendants) भी दिखाई देते हैं, और आसपास ग्रहों (planets) के छोटे‑छोटे प्रतीक भी उकेरे गए हैं.
➔हरिहर की बलुआ पत्थर की मूर्ति (The Harihara Sandstone Idol)
मध्य प्रदेश की यह मूर्ति लगभग 1000 ईस्वी पुरानी है.इंसान के कद जितनी बड़ी (life-sized) यह मूर्ति बलुआ पत्थर (sandstone) की एक ही बड़ी चट्टान को तराशकर बनाई गई है.यह मूर्ति 'हरिहर' को दर्शाती है, जो कि बाईं ओर भगवान विष्णु (हरि) और दाईं ओर भगवान शिव (हर) का एक मिला-जुला रूप है.यह मूर्ति शुरुआती मध्यकालीन भारत की धार्मिक और दार्शनिक सोच के एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव को दिखाती है.
➔वृंदावनी वस्त्र के टुकड़े (The Vrindavani Vastra Fragments)
यह रेशम (silk) का एक बहुत बड़ा कपड़ा है, जिसे 16वीं शताब्दी में असम के महान संत और विद्वान श्रीमंत शंकरदेव की देखरेख में तैयार किया गया था.इस कपड़े पर भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं (भागवत पुराण की कहानियों) को बेहद बारीक और सुंदर तरीके से बुना गया है.आज इसके जो भी टुकड़े बचे हैं, वे मध्यकालीन भारत के कपड़ा उद्योग (textile technology) और वैष्णव भक्ति परंपरा के सबसे बेहतरीन उदाहरण हैं.
➔शिव नटराज
शिव नटराज की कांस्य मूर्ति चोल काल की अद्भुत कला का नमूना है. भगवान शिव को तांडव करते हुए दिखाने वाली यह प्रतिमा संतुलन और गति का प्रतीक है. यह मूर्ति सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि आस्था से जुड़ा प्रतीक है, जिसे भारत से बाहर ले जाना आज भी विवाद का विषय है.
इनके अलावा, हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म से जुड़ी कई प्राचीन मूर्तियां और पांडुलिपियां इस संग्रहालय का हिस्सा हैं.भारत सरकार और कई संगठनों द्वारा लगातार इन धरोहरों को वापस देश लाने की मांग की जाती रही है.

भारत के अलावा और किन देशों के आर्टिफैक्टस रखे हैं?
इराक (मेसोपोटामिया): म्यूजियम में सबसे ज्यादा आर्टिफैक्ट्स इराक से ही आए हैं. इनकी संख्या लगभग 1.6 लाख से अधिक है. इनमें 'साइरस सिलेंडर' (Cyrus Cylinder) और 'लियोन हंट ऑफ असुरबनिपाल' (Lion Hunt of Ashurbanipal) प्रमुख हैं.
इटली: रोमन साम्राज्य और प्राचीन काल के लगभग 1.4 लाख से अधिक कलाकृतियां यहां मौजूद हैं.
मिस्र (Egypt): प्राचीन मिस्र की कला और ममी का अद्भुत संग्रह है.यहां रखी 'रोसेटा स्टोन' (Rosetta Stone) और 'रा' (Ra) की प्रतिमाएं इसके मुख्य आकर्षण हैं.
ग्रीस: प्राचीन ग्रीस (यूनान) की मूर्तिकला, विशेष रूप से 'पार्थेनन मार्बल्स/एल्गिन मार्बल्स' (Parthenon Sculptures) यहां के प्रसिद्ध संग्रहों में से एक हैं.
चीन: चीनी राजवंशों की प्राचीन वस्तुएं, पेंटिंग्स और चीनी मिट्टी के बर्तन मिल जाएंगे.
ईरान: प्राचीन फारस (Persia) से जुड़े अवशेष जैसे 'ऑक्सस ट्रेजर' (Oxus Treasure)
तुर्की: प्राचीन अनातोलिया और ऑटोमन साम्राज्य से जुड़ी वस्तुएं यहां हैं.
नाइजीरिया: 'बेनिन ब्रोंज़' (Benin Bronzes) के रूप में मशहूर विश्व प्रसिद्ध कलाकृतियां भी मौजूद हैं

भारत की धरोहरों की वतन वापसी में आड़े आता है ये कानून
धार जिले के भोजशाला मंदिर में जिस मां वाग्देवी की प्रतिमा लगनी है वह असल में तो लंदन के इसी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है. वाग्देवी को मां सरस्वती का रूप कहा जाता है. एमपी हाईकोर्ट ने तो भारत सरकार को इसे वापस मांगने को तो कह दिया है पर इसमें कानूनी अड़चन है. भारत की धरोहर लौटाने के लिए ब्रिटिश संग्रहालय 1963 के 'ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट' से बंधा है जो कहता है कि संग्रहालयों को अपने संग्रह से कोई भी वस्तु किसी दूसरे देश को कानूनी रूप से नहीं सौंपना है. यानी ये कानून ऐसी चीजें करने से रोकता है. ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963 के तहत ऐसी किसी भी रिक्वेस्ट को मानने न मानने का अधिकार पूरी तरह से फॉरेन एंड कॉमनवेल्थ ऑफिस को है.
ब्रिटिश म्यूजियम के रखरखाव का खर्चा
ब्रिटिश म्यूजियम की आधिकारिक वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटिश म्यूजियम (British Museum) दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने संग्रहालयों में से एक है.इसकी विशालता, लाखों कलाकृतियों की सुरक्षा और मुफ्त प्रवेश की नीति के कारण इसका सालाना रखरखाव का खर्च बेहद भारी-भरकम होता है.
1. सालाना कुल खर्च (Annual Operating Expenditure)
ब्रिटिश म्यूजियम को चलाने का सालाना खर्च औसतन £100 मिलियन से £110 मिलियन (भारतीय रुपयों में लगभग 1,100 करोड़ से 1,200 करोड़ रुपये) के बीच आता है.इस भारी-भरकम बजट का इस्तेमाल मुख्य रूप से स्टाफ की सैलरी, गैलरी के रखरखाव और सुरक्षा पर होता है.
2. खर्चे के मुख्य हिस्से (Major Expenditure Breakdown)
स्टाफ की सैलरी और पेंशन (Staff Costs): यह म्यूजियम के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा होता है.म्यूजियम में करीब 1,000 से अधिक परमानेंट और कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी काम करते हैं (जैसे- क्यूरेटर, रिसर्चर्स, सिक्योरिटी गार्ड और प्रशासनिक स्टाफ). इस पर सालाना करीब £45 मिलियन से £50 मिलियन (लगभग 500-550 करोड़ रुपये) खर्च होते हैं.
गैलरी और पुरानी इमारतों का रखरखाव (Estate & Building Maintenance): ब्रिटिश म्यूजियम की मुख्य इमारत खुद एक ऐतिहासिक धरोहर है. इसकी छतों, वेंटिलेशन सिस्टम और गैलरी के तापमान को नियंत्रित (Climate Control) रखने पर सालाना £20 मिलियन से £25 मिलियन खर्च होते हैं.
सुरक्षा और तकनीक (Security & IT): दुनिया भर की बेशकीमती और विवादित धरोहरों (जैसे कोहिनूर, रोजेटा स्टोन) के होने के कारण यहां की सुरक्षा बेहद कड़ी और आधुनिक है.सुरक्षा गार्ड्स, सीसीटीवी नेटवर्क और साइबर सुरक्षा पर सालाना £10 मिलियन से £15 मिलियन का खर्च आता है.
रिसर्च और कंजर्वेशन (Research & Conservation): प्राचीन कलाकृतियों को सड़ने या खराब होने से बचाने के लिए दुनिया की सबसे बेहतरीन लैब्स यहां हैं.वैज्ञानिक तरीकों से इतिहास को सहेजने पर भी करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.
यह खर्च कहां से पूरा होता है?
चूंकि ब्रिटिश म्यूजियम में आम जनता के लिए परमानेंट गैलरी देखने की एंट्री बिल्कुल मुफ्त है, इसलिए इस खर्च को पूरा करने के लिए म्यूजियम तीन मुख्य रास्तों पर निर्भर है.
ब्रिटिश सरकार से ग्रांट (Government Grant-in-Aid): ब्रिटिश सरकार का संस्कृति विभाग (DCMS) कुल खर्च का लगभग 40% से 50% हिस्सा सरकारी ग्रांट के रूप में देता है.
डोनेशन और स्पॉन्सरशिप (Donations & Corporate Sponsorship): दुनिया भर के अमीर परोपकारी लोग, ट्रस्ट और बड़ी कंपनियां (जैसे बीपी या बड़े बैंक) म्यूजियम को भारी डोनेशन देते हैं.
कमर्शियल आमदनी (Commercial Revenue): म्यूजियम के अंदर चलने वाले कैफे, सोवेनियर शॉप्स (गिफ्ट शॉप्स) और कुछ खास 'पेड' प्रदर्शनियों (Special Exhibitions) के टिकटों से होने वाली कमाई.

लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की ये बातें पढ़ गुस्सा आएगा
ब्रिटिश म्यूजियम दुनिया भर के पर्यटकों के लिए एक आकर्षक जगह हो सकता है, लेकिन इसके इतिहास, नीतियों और हालिया घटनाओं को लेकर इसकी भारी आलोचना होती रही है.य
1. "चोरी की कलाकृतियों का गोदाम" (औपनिवेशिक लूट)
➔म्यूजियम की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि इसकी अधिकांश बेशकीमती कलाकृतियाँ ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में अन्य देशों से जबरन, युद्ध के लूटपाट (Spolia) या धोखे से लाई गई थीं. आलोचक इसे दुनिया की सबसे बड़ी लूट का घर भी कहते हैं. मिस्र का रोजेटा स्टोन, ग्रीस के पार्थेनन मार्बल्स (एल्गिन मार्बल्स), नाइजीरिया के बेनिन ब्रोंजेस और भारत के अमरावती मार्बल्स जैसी ऐतिहासिक धरोहरें शामिल हैं, जिन्हें उनके मूल देशों की सहमति के बिना लंदन लाया गया.
2. कलाकृतियों को वापस करने से सख्त इनकार (Repatriation Denial)
➔भारत, ग्रीस, मिस्र, नाइजीरिया और चिली जैसे कई देश सालों से अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक धरोहरों को वापस मांग रहे हैं, लेकिन ब्रिटिश म्यूजियम इन्हें लौटाने से साफ इनकार करता रहा है. इसके पीछे वे 'ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963' का हवाला देते हैं, जो म्यूजियम के ट्रस्टियों को कानूनन किसी भी कलाकृति को स्थायी रूप से अपनी इन्वेंट्री से हटाने या वापस करने से रोकता है.आलोचक इस कानून को एक सुरक्षा कवच की तरह देखते हैं जो औपनिवेशिक लूट को वैध बनाए रखने के लिए इस्तेमाल होता है.
3. कलाकृतियों का गलत रखरखाव और इतिहास को तोड़ना-मरोड़ना
➔नइतिहासकारों का आरोप है कि अतीत में म्यूजियम ने कई कलाकृतियों को नुकसान पहुंचाया है.उदाहरण के लिए, 19वीं और 20वीं सदी में ग्रीस की संगमरमर की मूर्तियों (Parthenon Marbles) को अधिक सफेद दिखाने के लिए उन्हें रसायनों और तारों के ब्रश से रगड़ा गया, जिससे उनकी मूल बनावट और प्राचीन सतह को भारी नुकसान पहुंचा.इसके अलावा, कई वस्तुओं के मूल इतिहास और उनके औपनिवेशिक संदर्भ को उनकी विवरण पट्टियों (Labels) पर ठीक से नहीं लिखा जाता.

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