- यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्य चीन की डंपिंग नीति से निपटने के लिए कठोर ट्रेड नीति लागू करने का दबाव दे रहे हैं
- दस्तावेज में चीन की प्रणालीगत औद्योगिक डंपिंग के खिलाफ अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया की वकालत की गई है
- प्रस्तावित नीति में आपातकालीन टैरिफ, सुरक्षा उपाय और नए उल्लंघनों पर कार्रवाई के अधिकार शामिल हैं
यूरोपीय संघ के प्रमुख सदस्य देशों का एक गठबंधन चीन की डंपिंग नीति से निपटने केलिए से कठोर ट्रेड नीति लागू करने का दबाव डाल रहा है. इसमें आपातकालीन टैरिफ को तेजी से लागू करना, व्यापक सुरक्षा उपाय और नए तरह के उल्लंघन पर कार्रवाई के अधिकार शामिल हैं. ब्रसेल्स में चीन पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण मीटिंग से कुछ दिन पहले स्पेन, इटली, नीदरलैंड, फ्रांस और लिथुआनिया की तरफ से हस्ताक्षरित एक दस्तावेज में कहा गया है कि यूरोपीय संघ को "सिस्टमेटिक और स्ट्रक्चरल इंडस्ट्रियल डंपिंग" के प्रति अधिक आक्रामक प्रतिक्रिया देनी चाहिए - ये वाक्यांश अक्सर बीजिंग के संदर्भ में इस्तेमाल किए जाते हैं.
यह हस्तक्षेप ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय आयोग शुक्रवार को चीन नीति दिशा-निर्देश पर बहस की तैयारी कर रहा है. इस बहस का उद्देश्य सरकारों और उद्योगों द्वारा चीनी प्रतिस्पर्धा के कारण उत्पन्न आर्थिक दबाव के बारे में बढ़ती शिकायतों के मद्देनजर एक नया मार्ग तैयार करना है.
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इस दस्तावेज को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और इसकी जानकारी सबसे पहले फाइनेंशियल टाइम्स ने दी थी. यह दस्तावेज उत्पाद-दर-उत्पाद एंटी-डंपिंग मामलों के बजाय, सेक्टर वाइज डंपिंग के लिए यूरोपीय संघ के सुरक्षा उपायों के अधिक आक्रामक उपयोग का आह्वान करता है.
क्यों यूरोप हुआ चीन से नाराज
इन प्रावधानों के तहत इंपोर्ट में अचानक हुई वृद्धि से स्थानीय उद्योग को नुकसान पहुंचने की आशंका होने पर टैरिफ या कोटा लागू किया जा सकता है. अतीत में इनका प्रयोग सीमित रूप से किया गया है, विशेष रूप से स्टील उद्योग में उपयोग होने वाले चीनी स्टील और लौह मिश्र धातुओं की अचानक वृद्धि को रोकने के लिए.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट द्वारा देखे गए इस लेख में एक नए "लचीलापन टूल" को अपनाने का प्रस्ताव है, जिसे "यूरोपीय सप्लाई सोर्सेज के एक निर्धारित सीमा से अधिक केंद्रित होने पर सक्रिय किया जाएगा."
यह शुक्रवार को होने वाली चीन संबंधी मीटिंग के दौरान व्यापार अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले एक प्रस्ताव का मौन समर्थन प्रतीत होता है, जिसकी अध्यक्षता यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन करेंगी. इससे महत्वपूर्ण उद्योगों में इंपोर्टरों को कम से कम दो देशों में कम से कम तीन सप्लायर्स से आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, ताकि अत्यधिक निर्भरता को रोका जा सके.
फ्रांस का रुख पहले से है क्लियर
फ्रांस का रुख पहले से सबको पता है. राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने शुक्रवार को यूरोपीय "धारा 301" टूल की मांग की, जो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन के खिलाफ अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले टैरिफ तंत्र की तरह है. अब फ्रांस के अलावा अन्य प्रमुख सदस्य देशों इटली, नीदरलैंड और स्पेन भी अपने चीन नीति में बदलाव कर रहे हैं. जाहिर है इस नीति को बड़ा समर्थन मिल सकता है. हालांकि स्पेन हाल के वर्षों में चीन के करीब आया है और चीनी निवेश के लिए एक लोकप्रिय स्थान है.

जर्मनी भी आ सकता है पक्ष में
नीदरलैंड्स, परंपरागत रूप से मुक्त व्यापार का प्रबल समर्थक होने के बावजूद, एएसएमएल और नेक्सपेरिया जैसी कंपनियों की उपस्थिति के कारण चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ आर्थिक सुरक्षा के मुद्दों में सबसे आगे रहा है. जर्मनी - जो इस गुट की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और चीन नीति निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाती है - की स्थिति अभी तक तय नहीं हुई है. जर्मनी की अर्थव्यवस्था मंत्री कैथरीना रीचे इस सप्ताह वाणिज्य मंत्री वांग वेन्ताओ से बातचीत के लिए बीजिंग की यात्रा करेंगी, उनके साथ चीन में गहन निवेश करने वाली कंपनियां भी होंगी.
हालांकि, ब्रसेल्स को उम्मीद है कि औद्योगिक प्रभाव से बर्लिन नई रिपोर्ट तैयार करने वाली कंपनियों के करीब आ सकता है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी टैरिफ और चीन की "अनुचित व्यापार प्रथाओं" का यूरोपीय उद्योग पर सीधा प्रभाव पड़ा है, जिसके कारण 2019 से 2025 के बीच 10 लाख नौकरियां खत्म हो गईं. सेंटर फॉर यूरोपियन रिफॉर्म द्वारा पिछले सप्ताह प्रकाशित एक अलग रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि चीन को निर्यात से जुड़ी 4 लाख से अधिक जर्मन नौकरियां पहले ही चीन के हाथों खो चुकी हैं.
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