महत्वपूर्ण दस्तावेजों के बड़े पैमाने पर जारी होने का मतलब पहले यह होता था कि पत्रकारों की टीमें देर रात तक रुककर दस्तावेजों के ढेर खंगालती रहती थीं. लेकिन अब यह 'जनता की अदालत' में जांच जैसा माहौल पैदा करता है. बाल यौन अपराधी जेफ्री एप्स्टीन से संबंधित 30 लाख से अधिक दस्तावेज 30 जनवरी को जारी हुए, इसके बाद हजारों ऑनलाइन यूजर्स खुद अपनी छानबीन करने के लिए आगे आ गए.
द कन्वरसेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, ये हजारों इंटरनेट यूजर्स इन दस्तावेजों की खाक छान रहे हैं और यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस कलेक्शन में क्या-क्या नए राज छिपे हुए हैं, क्या नई चीजें पता चलती हैं (और क्या नहीं).
इस स्क्रूटिनी का एक हिस्सा इस खुलासे के पीछे के कानूनी ढांचे से जुड़ा है. एप्स्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट मुख्य रूप से पीड़ितों की पहचान की सुरक्षा पर केंद्रित है. हालांकि अमेरिकी न्याय विभाग का कहना है कि उसने अपनी समीक्षा के दौरान डुप्लिकेट रिकॉर्ड, विशेषाधिकार प्राप्त कंटेंट और अन्य कई श्रेणियों को अलग कर दिया था.
सवाल ये उठता है कि क्या ये अतिरिक्त फिल्टर कानून में निर्धारित सीमाओं के अनुरूप हैं? यह भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है. यही वजह है कि लोग न केवल प्रकाशित हुए दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं बल्कि यह समझने की कोशिश भी कर रहे हैं कि उनमें क्या छिपाया गया है.
अपने समय और विशेषज्ञता का इस्तेमाल करके ऑनलाइन कम्युनिटी के सदस्य उन विरोधाभासों को उजागर कर सकते हैं जिनके ऐसा न किए जाने पर अनसुने और अनदेखा रह जाने का डर है. हालांकि यह प्रक्रिया भयावह रूप भी ले सकती है. जब कोई फाइल्स जारी होती है तो वह सार्वजनिक जांच का विषय बन जाती है.
जब भी बड़े पैमाने पर दस्तावेज कानूनन जारी जारी होते हैं, तब अक्सर उन्हें खुफिया स्रोतों की सुरक्षा या गोपनीयता बनाए रखने के लिए नियमित रूप से संपादित किया जाता है. 1992 के जॉन एफ कैनेडी हत्याकांड रिकॉर्ड संग्रह अधिनियम के तहत सार्वजनिक किए गए दस्तावेजों के मामले में भी ऐसा ही हुआ था.
लेकिन देखा गया है कि दस्तावेजों में छिपाए गए झोल जनता के संदेह को दूर करने के बजाय, अक्सर संदेह और अविश्वास को और बढ़ा देते हैं. इससे इस बात को बल मिलता है कि जनता को स्वयं ही इनका ऑडिट करना चाहिए.
जब हजारों लोग दस्तावेजों के एक ही संग्रह को खंगालते हैं, तो परिणाम जल्दी ही सामने आते हैं. डुप्लिकेट रिकॉर्ड का भी पता चलता है. क्रोनोलोजी बनने लगती है, और ऐसी विसंगतियां भी नजर आने लगती हैं जिनके अन्यथा छिपे रह जाने का खतरा था.
एप्स्टीन से संबंधित फाइलों का खुलासा, 2006 की शुरुआत से हुए विकीलीक्स दस्तावेजों के खुलासे से बिल्कुल अलग है. उस वक्त पत्रकारों ने लाखों राजनयिक संदेशों की समीक्षा की थी, सोर्सेज की सुरक्षा के लिए संवेदनशील नामों को हटा दिया गया था और निष्कर्षों को सार्वजनिक करने से पहले व्यापक रूप से संपादित किया गया था.
आज इंटरनेट का सिस्टम अलग तरह से काम करता है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता के टूल्स कई बार दस्तावेजों में कृत्रिम ‘सबूत' शामिल कर देते हैं, जिससे मामला और भी जटिल हो जाता है.
एप्स्टीन फाइल्स सामने आने के बाद एआई की मदद से बनाई गई कई इमेज, वीडियो और ऑडियो क्लिप्स सामने आईं, जिन्हें बाद में गलत साबित किया गया. इनमें से सबसे वायरल एआई इमेज शायद वो है जिसमें दावा किया गया है कि एप्स्टीन इजराइल में जीवित है.
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