- ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच सीजफायर हुआ लेकिन इजरायल ने लेबनान पर भीषण हमला किया है
- हिज्बुल्लाह ने इजरायल के हमलों की निंदा की और कहा कि इजरायल नागरिकों को निशाना बना रहा है
- ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान ने सीजफायर की शर्तों में गड़बड़ी की और शरीफ पर झूठ बोलने के सवाल उठ रहे हैं
मंगलवार को दुनिया के मंगल वाली सूचना आई. ईरान-अमेरिका-इजरायल में सीजफायर हो गया. दुनिया भर के देशों ने मध्यस्थता करने वाले पाकिस्तान को थैंकयू नोट भेजा. मगर अगले ही दिन बुधवार रात इजरायल ने लेबनान पर सबसे भीषण हमला कर दिया. करीब 200 लोग मारे गए. हिज्बुल्लाह ने लेबनान सरकार की तरह ही इजरायल के हालिया हमलों की निंदा की है. हिज्बुल्लाह का कहना है कि जब इजरायली सेना अपने सैन्य उद्देश्यों को प्राप्त करने में असमर्थ होती है, तो वह नागरिकों को निशाना बनाती है, और इस मामले में उसका उद्देश्य हिज्बुल्लाह को निरस्त्र करना है.
हिज्बुल्लाह की मुश्किल
लेकिन हिज्बुल्लाह बहुत मुश्किल स्थिति में है, क्योंकि वह लेबनान में किसी तरह का युद्धविराम कराने के लिए ईरान पर निर्भर था. ईरान का कहना है कि (लेबनान में युद्धविराम) सीजफायर का हिस्सा है, लेकिन इजरायल इससे इनकार करता है. ट्रंप भी इनकार करते हैं और कहते हैं कि लेबनान इसमें शामिल नहीं है. अब हिज्बुल्लाह सीमा पार रॉकेट दागना जारी रख सकता है, और वह ऐसा कर रहा है. हिज्बुल्लाह दक्षिण में इजरायल के जमीनी आक्रमण को धीमा करने की भी कोशिश कर रहा है, लेकिन इजरायल का पलड़ा भारी है. वह आसमान से बम बरसा कर तबाही मचा सकता है, और यह सब लेबनान की जनता और सरकार पर भारी दबाव डाल रहा है.

ईरान या पाकिस्तान, किसकी गलती?
हिज्बुल्लाह को उम्मीद थी कि ईरान के पास इस मोर्चे को शांत करने की शक्ति होगी, लेकिन ईरानी अधिकारियों के बयानों के बावजूद ऐसा अभी तक नहीं हुआ है. अब हिज्बुल्लाह खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है. वो ईरान का कट्टर समर्थक है और ईरान के लिए हर जगह लड़ता रहा है. तो क्या ईरान ने सीजफायर करने के लिए लेबनान और हिज्बुल्लाह की अनदेखी कर दी या सीजफायर करने की जल्दबाजी में उसे शर्तों में लेबनान और हिज्बुल्लाह को लेकर उससे कोई गलती हो गई? या फिर पाकिस्तान ने खेल कर दिया?
सीजफायर में कैसे हो रही थी बात?
लेबनान पर हमले के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक बार फिर बंद कर दिया. समझौते की शर्तों को लेकर दोनों पक्षों में मतभेद बने हुए हैं. ईरान ने संकेत दिया है कि वह जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूल सकता है, वहीं अमेरिका इसका विरोध कर रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने जलडमरूमध्य बंद करने को अस्वीकार्य बताते हुए उसे फिर खोलने की मांग दोहराई. इस बात से साफ हो जाता है कि ईरान ने लेबनान और हिज्बुल्लाह को अनदेखा नहीं किया और ना ही उससे सीजफायर करने की जल्दबाजी में कोई गलती हुई है. तो इसका साफ मतलब निकलता है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर ईरान को सीजफायर की शर्तों की गलत जानकारी दी. अब सवाल उठता है कि आखिर पाकिस्तान ने ऐसा क्यों किया?

पाकिस्तान कैसे बना मध्यस्थ?
कई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कतर के मध्यस्थ बनने से इंकार करने के बाद पाकिस्तान को अपने लिए मौका दिखा. उसने आगे बढ़कर मध्यस्थ बनने की ख्वाहिश जताई. ट्रंप ने इस मौके का फायदा उठाया और पाकिस्तान को आगे बढ़ने की हरी झंडी दे दी. यही कारण है कि तुर्की, मिस्र के विदेश मंत्रियों के साथ पाकिस्तान ने अपने देश में बैठक की, मगर ईरान की ओर से उसे बहुत ज्यादा भाव नहीं दिया गया. फिर पाकिस्तान के विदेश मंत्री चीन गए और चीन को समझाया कि अगर होर्मुज जल्द नहीं खुला तो उसका भी नुकसान है. पाकिस्तान ने चीन को ईरान पर दबाव डालने के लिए तैयार किया. चीन ईरान से सबसे ज्यादा तेल खरीदने वाला देश है. ऐसे में चीन ने ईरान को संदेश दिया कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो वो तेल की खरीद को बंद कर सकता है. बस यहीं से पाकिस्तान के साथ ईरान भी बातचीत में गंभीर हो गया. इन रिपोर्ट्स को सीजफायर के बाद ट्रंप और शहबाज के ट्वीट भी सही साबित करते हैं. दोनों ने ही सीजफायर के लिए चीन को बधाई भी दी. ट्रंप ने तो यहां तक लिख दिया कि 'मैंने सुना है कि ईरान को इस सीजफायर के लिए चीन ने राजी किया है.'

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ईरान भी मान रहा पाकिस्तान दोषी
अब ईरान खुद कह रहा है कि पाकिस्तान ने सीजफायर में गड़बड़ी कर दी है. अमेरिका और ईरान सीधे बातचीत नहीं कर रहे थे. दोनों पक्षों पाकिस्तान से बात कर रहे थे और वही दोनों से शर्तों को लेकर बात कर रहा है. अब ईरान कह रहा है कि पूरी संभावना है कि पाकिस्तान ने इसमें गड़बड़ कर दी है. 'द मिडिल ईस्ट' की रिपोर्ट के अनुसार, हो सकता है पाकिस्तान ने ईरान को समझौते का वह संस्करण दिया हो, जो उसे वाशिंगटन से मिले संस्करण से अलग था. मंगलवार को युद्धविराम से कुछ ही घंटे पहले, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के एक सोशल मीडिया पोस्ट में गड़बड़ी हुई थी. दावे किए गए कि उनका ट्वीट अमेरिका से लिखकर आया था. क्योंकि उस पर लिखा था-"ड्राफ्ट - X पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का संदेश" और कॉपी पेस्ट के चक्कर में ये बात दुनिया को पता लग गई. ये बात साबित करता है कि पाकिस्तान और खासकर शहबाज शरीफ सीजफायर कराने और क्रेडिट लेने के लिए बहुत ज्यादा आतुर थे.
शरीफ पर क्यों उठ रहे सवाल?
अब शहबाज शरीफ भले ही ट्वीट करके कह रहे हैं कि लेबनान भी सीजफायर समझौते में शामिल था, लेकिन ट्रंप से इजरायल तक इससे इंकार कर रहे हैं. ट्रंप ने साफ कर दिया है कि ईरान के साथ सीजफायर में लेबनान और हिज्बुल्लाह शामिल नहीं है. PBS से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ दो हफ्ते के सीजफायर समझौते में लेबनान को शामिल नहीं किया गया था. इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कहा है कि सीजफायर डील में लेबनान का नाम नहीं है और लेबनान पर हमले नहीं रुकेंगे. जाहिर है अब सवाल शहबाज शरीफ से पूछे जा रहे हैं. सवाल ये कि क्या शहबाज ने जानबूझकर ईरान से लेबनान वाला झूठ बोला? क्या वो अमेरिका के हाथों खेल रहे थे? अगर शहबाज की बात को ही अमेरिका और इजरायल झूठा साबित कर रहे हैं तो आगे उनकी बात पर ईरान कैसे भरोसा करेगा? या शहबाज ही दोनों तरफ से झूठ बोल रहे हैं? शहबाज ने सीजफायर कराने के लिए ईरान से लेबनान वाला झूठ बोले और उधर ट्रंप को बगैर लेबनान के ईरान के राजी होने की बात कह दी. सवाल कई हैं और पाकिस्तान चुप्पी साधे हुए है.
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