लीमा में आज भारत समेत 190 से ज्यादा देशों ने वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के राष्ट्रीय संकल्पों के लिए आम सहमति वाला प्रारूप स्वीकार कर लिया, जिसमें भारत की चिंताओं का समाधान किया गया है। इस समझौते से अब जलवायु पर्वितन से निबटने के मुद्दे पर अगले साल पेरिस में नए महत्वाकांक्षी एवं बाध्यकारी करार पर हस्ताक्षर के लिए रास्त साफ हो गया।
लीमा में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन की तकरीबन दो हफ्ते चली वार्ता के बाद वार्ता के अध्यक्ष एवं पेरू के पर्यावरण मंत्री मैनुएल पुलगर-विदाल ने घोषणा की, 'दस्तावेज स्वीकार हुआ।'
मसौदा पर टिप्पणी करते हुए पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा, 'भारत की सभी चिंताओं का समाधान कर दिया गया है।' उन्होंने कहा, 'यहां हमने लक्ष्य प्राप्त कर लिया और हमने वह पाया जो हम चाहते थे।' उन्होंने यह टिप्पणी 2015 के करार के लिए वार्ता का व्यापक खाका मंजूर होने के बाद की। करार 2020 में प्रभावी होगा।
जावड़ेकर ने रेखांकित किया कि 'विभेदीकरण कुंजी थी' और भारत संतुष्ट है कि उस सूचना वाला एक पैराग्राफ स्वीकृत मजमून में शामिल किया गया। उन्होंने स्वीकार किया कि मजमून 'हर एक को संतुष्ट नहीं करता' लेकिन कहा कि यह किसी समग्र पेरिस 2015 करार के लिए एक अच्छी ईंट का काम करेगा।
मसौदा की मंजूरी को पेरिस में वैश्विक जलवायु परिवर्तन करार तक पहुंचने की दिशा में एक उल्लेखनीय पहले कदम के रूप में देखा जा रहा है।
बहरहाल, प्रतिनिधियों का कहना है कि ज्यादातर कठोर काम अभी बाकी है। इस करार को 'जलवायु कार्रवाई का लीमा आह्वान' का नाम दिया गया है और यह पर्यावरण के इतिहास में एक ऐतिहासिक समझौते के रूप में देखा जा रहा है।
मसौदा में सिर्फ यही कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन पर उनके संयुक्त प्रभाव के आकलन के लिए दिसंबर 2015 पेरिस शिखर सम्मेलन से एक माह पहले तमाम संकल्पों की समीक्षा की जाएगी।
मुख्य पूर्ण सत्र स्थानीय समयानुसार डेढ़ बजे रात दोबारा किया गया और पुलगर-विदाल ने घोषणा की कि मसौदा मजमून स्वीकार कर लिया गया है।
भारत और अन्य विकासशील देशों के रुख के अनुरूप विभेदीकरण : जलवायु कार्रवाई उपायों के लिए अदायगी करने की उनकी क्षमता के आधार पर देशों को श्रेणीबद्ध करने के उसूल के बारे में अलग से एक पैराग्राफ जोड़ा गया है।
इसमें कहा गया है कि पेरिस 2015 करार को 'भिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों के आलोक में साझी, लेकिन विभेदीकृत जिम्मेदारियां एवं संबंधित क्षमता के उसूल' प्रतिबिंबित करना चाहिए।
यह पहला मौका है जब उत्सर्जन के मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ चुका चीन, भारत, ब्राजील और उभरती हुई अन्य अर्थव्यवस्थाएं अपने उत्सर्जन में कटौती करने पर सहमत हुए हैं। अब जो सहमति बनी है, उसके अनुसार ,देश अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्य पेश करेंगे जिसकी समयसीमा अगले साल 31 मार्च होगी।
आईएनडीसी दाखिल करने की नई तारीख जून 2015 से बढ़ा कर अक्तूबर 2015 कर दी गई है, क्योंकि अनेक देशों ने ज्यादा समय की मांग की थी।
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