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चीन के वैज्ञानिकों ने पेड़-पौधों से सीखकर लैब में बना लिया 'पेट्रोल', जानें कैसे यह खोज दुनिया बदल सकती है

चीन के वैज्ञानिकों ने एक ऑर्टिफिशियल फोटोसिंथेसिस प्रोसेस तैयार किया है. इसकी खास बात यह है कि इसमें एक ऐसा पदार्थ इस्तेमाल किया गया है, जो थोड़ी मात्रा में विद्युत ऊर्जा (इलेक्ट्रिकल इनर्जी) को अस्थायी रूप से जमा कर सकता है.

चीन के वैज्ञानिकों ने पेड़-पौधों से सीखकर लैब में बना लिया 'पेट्रोल', जानें कैसे यह खोज दुनिया बदल सकती है
चीन के वैज्ञानिकों ने लैब में पेड़-पौधों से सीखकर बना लिया 'पेट्रोल'
  • चीन के वैज्ञानिकों ने पौधों की फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया से सीखकर ऊर्जा उत्पादन की नई तकनीक विकसित की है
  • इस तकनीक में सूरज की रोशनी से कार्बन डाइऑक्साइड और पानी को पेट्रोल जैसे ईंधन में बदला जा सकता है
  • यह शोध नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. यह ग्रीनहाउस गैसों को कम करने में सहायक हो सकता है
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पेड़-पौधे हवा से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं, जमीन से पानी सोखते हैं और फिर सूरज की किरणों की मदद से ऊर्जा बनाते हैं. इस नेचुरल प्रक्रिया को ही फोटोसिंथेसिस कहा जाता है. क्या होगा अगर इंसान भी पेड़ों की तरह ही लैब में फोटोसिंथेसिस करे और अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए ऊर्जा पैदा करने लगे. चीन के वैज्ञानिकों ने ठीक यही कर दिखाया है. जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन की चुनौतियों से जूझ रही है, तब चीनी वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में ऊर्जा उत्पादन का तरीका बदल सकती है.

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार चीन की एकैडमी ऑफ साइंसेज और हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने पौधों की फोटोसिंथेसिस प्रक्रिया से प्रेरित होकर एक नई विधि बनाई है. इस विधि में सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाइऑक्साइड और पानी को काम आने वाले रसायनों में बदला जा सकता है, जो आगे चलकर पेट्रोल जैसे ईंधन का आधार बन सकते हैं.

चीन के वैज्ञानिकों ने एक कृत्रिम फोटोसिंथेसिस प्रणाली तैयार की है. इस प्रणाली की खास बात यह है कि इसमें एक ऐसा पदार्थ इस्तेमाल किया गया है, जो थोड़ी मात्रा में विद्युत ऊर्जा (इलेक्ट्रिकल इनर्जी) को अस्थायी रूप से जमा कर सकता है. यह जमा की गई ऊर्जा केमिकल रिएक्शंस को तेज और प्रभावी बनाने में मदद करती है. वैज्ञानिकों ने जब इस सामग्री को ऐसे उत्प्रेरकों (कैटेलिस्ट) के साथ जोड़ा, जो कार्बन डाइऑक्साइड को दूसरे रसायनों में बदलते हैं, तो सूरज की रोशनी से कार्बन मोनोऑक्साइड का उत्पादन संभव हुआ.

कार्बन मोनोऑक्साइड को आगे चलकर तरल हाइड्रोकार्बन में बदला जा सकता है, जिससे ईंधन बनाया जा सकता है. यह तकनीक खास तौर पर प्लेन और समुद्री जहाज जैसे क्षेत्रों के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां सीधे बिजली का इस्तेमाल करना मुश्किल है.

इस रिसर्च को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित किया गया है. रिसर्चर्स का कहना है कि यह तरीका ग्रीनहाउस गैसों को कम करने और टिकाऊ ईंधन उत्पादन की दिशा में एक बड़ा कदम है. अब तक कार्बन डाइऑक्साइड को ईंधन में बदलने वाली तकनीकों में ऐसे रसायनों का उपयोग होता था, जो प्रक्रिया के दौरान पूरी तरह खत्म हो जाते थे. इससे लागत बढ़ती थी और टिकाऊपन कम होता था.

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