- बांग्लादेश ने 1971 में भारत की मदद से पाकिस्तान से स्वतंत्रता पाई और 1973 में पहला आम चुनाव हुआ था
- 1975 में शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद सैन्य तख्तापलट के कारण लोकतंत्र कमजोर पड़ गया था
- 1991 का चुनाव लोकतंत्र की वापसी का प्रतीक बना, जब BNP सत्ता में आई और संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ
मैं बांग्लादेश हूं. 1971 में एक खूनी संघर्ष, बलिदान और अपार पीड़ा के बाद मैंने जन्म लिया. पड़ोसी भारत ने तानाशाह बने पाकिस्तान के हुक्मरानों से आजाद करने के मेरी मदद की. मेरी आजादी की जंग को अपना मान के लड़ा. मेरी आजादी सिर्फ एक नए देश का उदय नहीं थी, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का सपना थी जो लोकतंत्र, सम्मान और जन-इच्छा पर खड़ा हो. लेकिन आजादी के बाद का मेरा सफर आसान नहीं रहा. मेरी राजनीति ने कई मोड़ लिए- कभी उम्मीद से भरे, कभी अंधेरे और कभी बेहद दर्दनाक. फिर से मैं 12 फरवरी को अपनी जिंदगी के एक ऐतिहासिक चुनाव को देखने वाला हूं. इस मौके पर आपको अपनी चुनावी कहानी सुनाता हूं.
1973: मेरा पहला चुनाव
1971 के बाद 1973 में मैंने अपना पहला आम चुनाव देखा. यह मेरे लिए एक ऐतिहासिक पल था. शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने भारी बहुमत से जीत हासिल की. तब 14 राजनीतिक दलों ने चुनाव लड़ा था, लेकिन अवामी लीग ने भारी 73 प्रतिशत वोट हासिल किए और लड़ी गई कुल 300 सीटों में से 293 सीटें जीत लीं. जनता ने उस नेता पर भरोसा जताया जिसने मुझे आजादी दिलाई थी. उस समय मेरे भीतर उम्मीद थी कि अब लोकतंत्र जड़ें जमाएगा, गरीबी घटेगी और संस्थाएं मजबूत होंगी. लेकिन जल्द ही राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट ने इस सपने को धुंधला करना शुरू कर दिया.
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1975: लोकतंत्र का पतन और सैन्य साया
1975 में मैंने अपना सबसे काला अध्याय देखा. शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गई. अगस्त 1975 में कर्नल सैयद फारूक-उर-रहमान के नेतृत्व में आयोजित खूनी तख्तापलट के दौरान मुजीब और उनके परिवार के अधिकांश लोगों की हत्या कर दी गई थी. वित्त मंत्री खोंडाकेर मुस्ताक अहमद ने सेना के समर्थन से तुरंत खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया. नवंबर 1975 में रहमान के सहयोगी जनरल खालिद मोशर्रफ के नेतृत्व में एक और तख्तापलट हुआ और मुस्ताक अहमद की सरकार को भी कुछ ही समय बाद गिरा दिया गया.
1979: सैन्य शासन में चुनाव
1979 का चुनाव हुआ, लेकिन मैं जानता था कि यह पूरी तरह स्वतंत्र नहीं था. जियाउर रहमान के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) सत्ता में आई. इस चुनाव ने मेरी राजनीति में एक नई धारा जोड़ी- राष्ट्रवाद और इस्लामी पहचान को देश की राजनीति में जगह मिलने लगी. हालांकि यह चुनाव लोकतंत्र की वापसी का दावा करता था, लेकिन सेना की छाया अब भी मेरे ऊपर बनी रही. BNP ने 300 संसदीय सीटों में से 207 सीटें जीती थीं. अवामी लीग अब प्रमुख विपक्ष बन गई थी और उसने 39 सीटें जीतीं लेकिन दावा किया कि चुनावों में धांधली हुई थी.
1986 और 1988: चुनाव, पर भरोसा नहीं
30 मई, 1981 को एक असफल सैन्य तख्तापलट में जियाउर की हत्या कर दी गई. उपराष्ट्रपति अब्दुस सत्तार कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और उसी साल नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव कराए गए. BNP को फिर से 65 प्रतिशत वोट मिले. लेकिन कुछ ही महीनों के भीतर, आर्मी चीफ हुसैन मुहम्मद इरशाद ने मार्च 1982 में एक रक्तहीन तख्तापलट में मार्शल लॉ लगाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया. 1986 और 1988 में चुनाव हुए, लेकिन विपक्ष ने इन्हें नकार दिया. बहिष्कार, धांधली के आरोप और दमन- ये सब मेरी पहचान बनते जा रहे थे. मैं देख रहा था कि चुनाव हो रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र नहीं आ रहा.
1991: मेरी दूसरी आजादी
जियाउर की विधवा पत्नी खालिदा जिया के नेतृत्व वाली BNP और शेख मुजीबुर रहमान की दो जीवित बेटियों में सबसे बड़ी शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने हाथ मिलाया. दोनों ने दिसंबर 1990 में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया, जिससे इरशाद की सरकार को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा. 1990 में सैन्य शासन को गिरा दिया गया. 1991 का चुनाव मेरे लिए सांस लेने जैसा था. यह अपेक्षाकृत स्वतंत्र और निष्पक्ष माना गया. BNP सत्ता में आई और संसदीय लोकतंत्र बहाल हुआ. खालिदा जिया पहली महिला प्रधान मंत्री बनीं. मैंने पहली बार देखा कि सत्ता शांतिपूर्ण तरीके से बदली जा सकती है. यह मेरे लोकतांत्रिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था.
1996: केयरटेकर सिस्टम और नई उम्मीद
1996 में राजनीतिक टकराव चरम पर था. जनता के दबाव में केयरटेकर सरकार की व्यवस्था बनी. उसी साल दो चुनाव हुए- फरवरी का चुनाव विपक्ष के बहिष्कार के कारण अविश्वसनीय रहा, लेकिन जून में हुए चुनाव ने मेरी राजनीति को नई दिशा दी. अवामी लीग सत्ता में लौटी. हसीना ने प्रधान मंत्री के रूप में अपना पहला कार्यकाल जीता, जिसमें अवामी लीग ने 146 संसदीय सीटें हासिल कीं. BNP ने 116 सीटें जीतीं. मुझे लगा कि अब शायद चुनावों पर भरोसा लौटेगा.
2001: सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण
2001 का चुनाव मेरे लिए परिपक्वता की परीक्षा था. सत्ता एक बार फिर बदली. BNP ने जीत हासिल की और खालिदा जिया दूसरी बार पीएम बनीं. यह दिखाता था कि मैं धीरे-धीरे लोकतांत्रिक परंपराएं सीख रहा हूं. हालांकि इसके साथ ही राजनीतिक हिंसा, अल्पसंख्यकों पर हमले और ध्रुवीकरण भी बढ़ा.
2008: भारी जनादेश
2006-07 में राजनीतिक संकट के बाद सेना समर्थित केयरटेकर सरकार आई. 2008 का चुनाव मेरे इतिहास के सबसे बड़े और अपेक्षाकृत निष्पक्ष चुनावों में से एक माना गया. हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने ग्रैंड अलायंस बनाने के लिए कई अन्य विपक्षी समूहों के साथ गठबंधन किया. गठबंधन ने 230 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया. BNP को सिर्फ 30 सीटें मिलीं. जनवरी 2009 में नई सरकार बनी और हसीना दूसरी बार सत्ता में लौटीं. जनता ने स्थिरता और विकास को चुना. यहीं से मेरी राजनीति में एक लंबे एकाधिकार की शुरुआत हुई.
2014: बहिष्कार और सवाल
2014 का चुनाव मेरे लिए बेहद विवादास्पद रहा. केयरटेकर सिस्टम को हटाया जा चुका था. BNP ने चुनाव का बहिष्कार किया. उस बार के चुनाव में वोटिंग सिर्फ 39.8% हुई थी. इस बॉयकॉट वाले चुनाव में अवामी लीग ने 300 में से 232 सीटें जीत लीं, जिनमें से लगभग आधे सांसद बिना मुकाबले चुने गए थे. तकनीकी रूप से सरकार बनी, लेकिन नैतिक सवाल मेरे लोकतंत्र पर मंडराने लगे. इस चुनाव में तो वोटिंग वाले दिन ही 18 लोग मारे गए थे.
2018: जीत, लेकिन संदेह से भरा
2018 के चुनाव में अवामी लीग ने लगभग पूरी संसद जीत ली. आधिकारिक नतीजों में भारी जीत दर्ज हुई, लेकिन विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने निष्पक्षता पर सवाल उठाए. मैं देख रहा था कि चुनाव हो रहे हैं, पर प्रतिस्पर्धा कम होती जा रही है.
2024 के बाद: बदलाव की आहट
2024 में छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन ने मेरी राजनीति को झकझोर दिया. सत्ता बदली, अंतरिम सरकार बनी. यह केवल सरकार परिवर्तन नहीं था, बल्कि मेरी आत्मा की पुकार थी कि लोकतंत्र सिर्फ चुनाव नहीं, बल्कि भागीदारी, जवाबदेही और विश्वास भी है. अब मुझे कौन संभालेगा, इसका एक और चुनाव हो रहा है. अगस्त 2024 में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में बनी अंतरिम सरकार ने शेख हसीना की पार्टी, अवामी लीग को बैन कर दिया था. सब कह रहे हैं कि BNP चुनाव जीतेगी लेकिन कट्टरपंथी इस्लामिक पार्टी, जमात-ए-इस्लामी भी मैदान में बनी हुई है. लोग पूछते हैं कि मैं आगे क्या चाहता हूं. शायद मेरे इतिहास में इस सवाल का जवाब छिपा हुआ है. मैं बांग्लादेश हूं. मैंने तानाशाही देखी है, मैंने लगातार आंदोलन झेले हैं, अपने रिच कल्चर पर खून के धब्बों को गिरते देखा है. चुनावों में उम्मीद और धोखा- दोनों महसूस किए हैं. आज मैं जानता हूं कि लोकतंत्र एक प्रक्रिया है, अचानक किसी दिन घटी कोई घटना नहीं. मुझे यकीन है कि मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. हर चुनाव मेरे इतिहास का एक अध्याय है. अब मैं चाहता हूं कि मेरे इतिहास के आने वाले अध्याय जनता की सच्ची आवाज से लिखे जाएं, उसमें डर को नामों निशान न हो और उम्मीद का दरिया कभी सूखे नहीं.
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