- अमेरिका ने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ त्रिपक्षीय तालमेल बढ़ाकर क्षेत्रीय सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश की
- G20 विदेश मंत्रियों की बैठक में तीनों देशों ने ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता बनाए रखने पर जोर दिया
- चीन ने ताइवान के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपने संप्रभु अधिकारों का दावा दोहराया
शनिवार को अमेरिका में एक मीटिंग हुई. तीन देश शामिल हुए और चीन की टेंशन बढ़ गई. एक चीनी विशेषज्ञ का कहना है कि जापान और दक्षिण कोरिया के साथ अपने त्रिपक्षीय तालमेल के ज़रिए अमेरिका अब ताइवान द्वीप, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर जैसे कई क्षेत्रीय हॉटस्पॉट्स को जोड़कर अपने गठबंधन नेटवर्क को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है. विशेषज्ञ के अनुसार, "स्थिरता बनाए रखने" के नाम पर उठाया गया यह कदम गुटीय टकराव को बढ़ा सकता है और क्षेत्रीय स्थिरता को कमज़ोर कर सकता है. यह टिप्पणी तब आई है जब अमेरिका के अटलांटा में G20 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान, इन तीनों देशों के विदेश मंत्रियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा मुद्दों पर अपना-अपना रुख स्पष्ट किया.
चीन का रुख बेहद सतर्क
ज़ियामेन यूनिवर्सिटी के ताइवान रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर झेंग जियान ने रविवार को 'ग्लोबल टाइम्स' को बताया कि ये दावे एक बार फिर दिखाते हैं कि वाशिंगटन अपने सहयोगियों को ताइवान के मुद्दे में घसीटना चाहता है. ये देश चीन के आंतरिक मामलों का फायदा उठाकर अपनी व्यापक क्षेत्रीय रणनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं. इसके साथ ही, वे ताइवान के अधिकारियों को बाहरी समर्थन मांगने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जबकि उन्हें ताइवान जलडमरूमध्य में शांति और स्थिरता लाने में योगदान देना चाहिए.
चीनी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कई बार दोहराया है कि ताइवान द्वीप के पूर्व में स्थित समुद्री क्षेत्रों में चीन का 'एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन' (अनन्य आर्थिक क्षेत्र) और 'कॉन्टिनेंटल शेल्फ' है. इन जल क्षेत्रों में गतिविधियां चलाना चीन के संप्रभु अधिकारों और अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आता है; इसलिए यह पूरी तरह से वैध और कानून सम्मत है, और इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता. चीन कभी भी ऐसा पक्ष नहीं रहा है जिसने इन जल क्षेत्रों में समस्या पैदा की हो या स्थिरता को बिगाड़ा हो.
ताइवान के आगे भी खतरा
ग्लोबल टाइम्स के अनुसार, इस मीटिंग के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री ने जापान और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्रियों के साथ एक 'मेमोरेंडम ऑफ कोऑपरेशन' पर हस्ताक्षर किए. इसका उद्देश्य 'ट्रायलैटरल आर्कटिक पैसिफिक पार्टनरशिप' के जरिए पैसिफिक आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री सहयोग और आर्थिक साझेदारी की संभावनाएं तलाशना है. झेंग ने कहा कि यह कदम आर्कटिक में सीमित बुनियादी ढांचे और क्षमताओं को लेकर वाशिंगटन की रणनीतिक चिंताओं को दर्शाता है. इसके जरिए वह आर्कटिक शिपिंग मार्गों और उससे जुड़े क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए जापान और दक्षिण कोरिया के साथ सहयोग का लाभ उठाना चाहता है.
चीन का मानना है कि जापान की बढ़ती भागीदारी आर्थिक हितों से कहीं आगे जा सकती है. यह आर्कटिक शिपिंग और उससे जुड़े सहयोग के क्षेत्रों में चीन और रूस के साथ प्रतिस्पर्धा करने के उसके इरादे को दर्शाती है. उन्होंने बताया कि एक मेमोरेंडम ऑफ कोऑपरेशन और कुछ वर्किंग ग्रुप्स के होने से कोई एक भी चालू 'हैवी आइसब्रेकर' (बर्फ तोड़ने वाला जहाज) तैयार नहीं हो सकता. यह इस बात को उजागर करता है कि इस क्षेत्र में वाशिंगटन की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उसकी वास्तविक क्षमताओं के बीच कितना बड़ा अंतर है.
झेंग ने आगे कहा कि यह व्यापक दृष्टिकोण, चीन के प्रति अमेरिकी नीति में छिपी 'शीत युद्ध' वाली मानसिकता और 'कंटेनमेंट' (चीन को घेरने की) रणनीति को भी दर्शाता है. इस बीच, जापान अपने सहयोगियों के बीच 'बोझ साझा करने' के लिए वाशिंगटन के दबाव का इस्तेमाल इस क्षेत्र में अपनी सैन्य और रणनीतिक भूमिका बढ़ाने के अवसर के रूप में कर सकता है, जिससे संभवतः उसके फिर से सैन्यीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है. इसलिए, क्षेत्रीय देशों को वाशिंगटन के बयानों और तीखी बयानबाजी से प्रभावित होने के बजाय, उसके कदमों का शांत भाव से आकलन करना चाहिए.
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