- 15 वर्षीय हबीबुल्लाह पश्चिमी अफगानिस्तान से ईरान काम की तलाश में गया था, लेकिन ठंड से उसकी मौत हो गई
- हबीबुल्लाह उन 18 अफगानियों में से एक था, जिनकी पिछले महीने ईरान में अवैध प्रवेश करने की कोशिश करते समय मौत हुई
- ईरान- पाकिस्तान ने करीब 50 लाख अफगानों को अफगानिस्तान वापस भेजा है, जिससे देश में बेरोजगारी बढ़ी है
15 साल का हबीबुल्लाह ईरान में काम खोजने के इरादे से पश्चिमी अफगानिस्तान में अपने घर से निकला था. लेकिन पहाड़ी सीमा पार करते हुए हबीबुल्लाह की ठंड से मौत हो गई. उसकी मां मह जान ने जैसे सबकुछ खो दिया है. घुंजन गांव में अपने मिट्टी के घर में वो बैठी है और अपने बेटे को याद कर रही है. उन्होंने न्यूज एजेंसी AFP को बताया, "वो जाने के लिए मजबूर था. उसे परिवार का पेट पालने के लिए रोटी कमानी थी." हबीबुल्लाह उन कम से कम 18 अफगानियों में से एक था, जिनकी पिछले महीने अफगानिस्तान के हेरात प्रांत से अवैध रूप से ईरान में प्रवेश करने की कोशिश करते समय मौत हो गई थी. अधिकारियों के अनुसार, उस वक्त तापमान -3C के आसपास था.
मां मह जान ने अपने बेटे की तस्वीर हाथ में लेते हुए कहा, "हमारे पास खाने के लिए खाना नहीं है, पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं. जिस घर में मैं रहती हूं, वहां बिजली नहीं है, पानी नहीं है. इस घर में कहने को एक खिड़की तक नहीं है, हम हाथ सेंक सकें, इसके लिए जलने के लिए कुछ भी नहीं है."
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मां मह जान ने अपने बेटे की तस्वीर हाथ में ले रखी है
कभी सूखा, कभी भूकंप... त्रस्त है अफगानियों का जीवन
संयुक्त राष्ट्र (UN) के अनुसार भूकंप और सूखे के कारण अफगानिस्तान में जिंदा रहना भी हर दिन का संघर्ष बन गया है. इस साल यानी 2026 में अफगानिस्तान की लगभग आधी आबादी को मानवीय सहायता की आवश्यकता होगी. 50 साल की मह जान ने कहा, "मेरे लिए कोई और रास्ता नहीं बचा था. मैंने सोचा, हमारी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए बेटे को जाने देते हैं."
हबीबुल्लाह के सौतेले भाई, गुल अहमद ने कहा कि हबीबुल्लाह ने अफगानिस्तान के अंदर जूता पॉलिश करने की कोशिश की थी, लेकिन वो हर दिन केवल 15 अफगानी (20.45 रुपए) तक ही कमा पाता था. 56 साल के गुल अहमद ने कहा, "वह 2,000 अफगानी (2726 रुपए प्रति माह) पर चरवाहा बनने, एक दुकान में काम करने के लिए तैयार था, लेकिन उसे यहां कुछ काम नहीं मिला. इसलिए उसे अफगानिस्तान को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. उसने अपनी मां से कहा, 'चलो अल्लाह पर पर भरोसा रखें, मैं ईरान जा रहा हूं'."

हबीबुल्लाह को दफ्न करते गुल अहमद और घर के बच्चे
ईरान का रास्ता कठिन
एएफफी की रिपोर्ट के अनुसार एक अफगान सीमा सूत्र ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ईरान से लौटे 15 शवों में से एक हबीबुल्लाह का भी था. सेना के एक अधिकारी ने बताया कि मरे हुए 3 अन्य प्रवासियों को बॉर्डर के अफगान क्षेत्र में बरामद किया गया. ILNA न्यूज एजेंसी के अनुसार ईरानी के बॉर्डर सिक्योरिटी कमांडर माजिद शोजा ने बताया है कि पिछले महीने (दिसंबर 2025) कुछ ही दिनों में, लगभग 1,600 अफगान प्रवासियों को "जिनके मौसम के कारण मरने का खतरा था" पहाड़ों से बचाया गया था.
अंतर्राष्ट्रीय प्रवासन संगठन के अनुसार, ईरान और पाकिस्तान ने मिलकर सितंबर 2023 से 50 लाख अफगानों को वापस अफगानिस्तान भेजा है. इस वजह से देश की जनसंख्या में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है लेकिन नौकरी की किल्लत भी साथ ही बद से बदतर हो गई है.
बेटे की दवाई के लिए ईरान निकला अब्दुल खुद मर गया
हबीबुल्लाह की तरह ही अब्दुल मजीद हैदरी ने दिसंबर के मध्य में ईरान जाकर अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश की थी. अब्दुल मजीद हैदरी का एक साल के बेटे को दिल की बीमारी थी. एक ईंट भट्टी पर काम करने वाला 25 साल का अब्दुल अपने बेटे की दवाओं और परिवार के खर्चा नहीं उठा पा रहा था. उनके साथ ईरान के लिए निकले उनके सौतेले भाई यूनुस ने AFP को बताया कि हमने अफगानिस्तान छोड़ दिया क्योंकि हम बहुत बेसहारा थे.
उन्होंने कहा, "हम बारिश में निकले. ऐसे मौसम में बॉर्डर पर तैनात सैनिकों के रडार और कैमरे ठीक से काम नहीं करते. लेकिन हमे ले जा रहा तस्कर रास्ता भटक गया. उस ठंड में वो आग आग नहीं जला पाए और जैसे ही बर्फ गिरी, अब्दुल बोल उठा: "मैं अब और नहीं चल सकता." यूनुस ने कहा, "कुछ लोगों ने हमें अब्दुल को छोड़ने के लिए कहा ताकि समूह के अन्य 19 लोगों को खतरे में न डाला जाए."
यूनुस ने याद करते हुए कहा, "अब्दुल को दो घंटे तक ले जाने के बाद उसकी आंखें बंद हो गईं, उसका शरीर भारी हो गया." फिर वहां से एक ईरानी परिवार गुजरा और उन्हें अस्पताल ले गया. यूनुस ने कहा, "हॉस्पिटल में उसे बिजली के झटके दिए गए, लेकिन वह पहले ही मर चुका था."
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