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10 साल की प्लानिंग, मौत के मुंह से गुजरे... 2 घंटे की नाव यात्रा ने बदल दी किस्मत: यूं नॉर्थ कोरिया से भागकर साउथ कोरिया पहुंचा किम परिवार

नॉर्थ कोरिया के किम परिवार के 9 सदस्य 10 साल की गुप्त तैयारी के बाद महज 2 घंटे में येलो सी पार कर साउथ कोरिया पहुंचे. तूफान की आड़ में समुद्री रास्ते से आजादी मिली, लेकिन योजना के सूत्रधार छोटे भाई की बाद में हादसे में मौत हो गई.

10 साल की प्लानिंग, मौत के मुंह से गुजरे... 2 घंटे की नाव यात्रा ने बदल दी किस्मत: यूं नॉर्थ कोरिया से भागकर साउथ कोरिया पहुंचा किम परिवार
AI जेनरेटेड सांकेतिक तस्वीर
  • किम परिवार के 9 सदस्य 10 साल की योजना बनाकर येलो Sea पार कर साउथ कोरिया पहुंचा.
  • परिवार ने समुद्री सीमा नॉर्डर्न लिमिट लाइन पार कर दो घंटे में साउथ कोरिया पहुंचने में सफलता पाई.
  • पलायन की योजना पिता ने शुरू की थी, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद बेटे किम इल‑ह्योक और किम यी‑ह्योक ने पूरा किया.
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नई दिल्ली:

नॉर्थ कोरिया से भागकर आजादी हासिल करना लगभग असंभव माना जाता है, लेकिन किम परिवार के नौ सदस्यों ने इसे मुमकिन कर दिखाया. 10 साल तक गुप्त रूप से बनी योजना को उन्होंने महज 2 घंटे में अंजाम दिया और येलो सी (Yellow Sea) पार कर साउथ कोरिया पहुंच गए. हालांकि, इस साहसिक पलायन की खुशी ज़्यादा समय तक पूरी नहीं रह सकी.

समुद्र के रास्ते निकली आजादी की राह

6 मई 2023 की रात किम परिवार के नौ सदस्य नॉर्थ कोरिया के तट से एक छोटी मछली पकड़ने वाली नाव पर सवार हुए. चुपचाप येलो सी में उतरकर उन्होंने नॉर्दर्न लिमिट लाइन (NLL) यानी नॉर्थ और साउथ कोरिया के बीच की विवादित समुद्री सीमा पार की और महज दो घंटे में साउथ कोरिया की सीमा में दाखिल हो गए.

पिता का सपना, बेटों ने किया पूरा

इस पलायन की योजना की शुरुआत एक दशक पहले हुई थी, जब परिवार के पिता ने समुद्र के रास्ते भागने का विचार रखा था. लेकिन वे यह दिन देखने से पहले ही दुनिया से चले गए. उनके दोनों बेटे किम इल‑ह्योक और किम यी‑ह्योक पलायन की रात पिता की अस्थियां भी अपने साथ लेकर चले.

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सालों की तैयारी, एक रात का दांव

छोटे भाई किम यी‑ह्योक ने तटीय इलाके में बसकर मछली पकड़ने का काम शुरू किया, अपनी नाव ली और स्थानीय सुरक्षा कर्मियों से रिश्वत के जरिये रिश्ते बनाए. दोनों भाई बार‑बार समुद्र में जाते रहे, मछुआरों के भेष में निगरानी पैटर्न समझते रहे और हर बार लौट आना उसी यात्रा का हिस्सा था, जिससे आखिरी बार न लौटने की तैयारी होती रही.

तूफान बना मददगार

आखिरकार वसंत ऋतु के तूफान वाली रात चुनी गई. रडार की पकड़ कमजोर हुई, गश्त धीमी पड़ी और पहरेदारों को रिश्वत देकर नाव रवाना हुई. परिवार की महिलाओं (जिनमें किम इल‑ह्योक की पांच महीने की गर्भवती पत्नी भी थीं) ने पहले जमीन में बिछे बारूदी इलाके को पैदल पार किया. रास्ता उन्हें पहले ही याद कराया गया था. इतना ही नहीं चार और छह साल के दो बच्चों को बोरे में छिपाकर चुप रहने को कहा गया.

नाव की धीमी रफ्तार के बीच तेज चलती धड़कनें

नाव बेहद धीमी रफ्तार से चली, ताकि रडार पर वह तैरते मलबे जैसी लगे. किसी ने एक शब्द नहीं बोला. किम इल‑ह्योक बाद में बताते हैं कि उन्हें इंजन से ज्यादा अपनी धड़कनों की आवाज सुनाई दे रही थी. जब दूर साउथ कोरिया का योनप्योंग द्वीप रोशनी में नजर आया, तभी साउथ कोरियन नेवी का जहाज पास आया. परिवार ने अपनी पहचान बताई और वर्षों का डर उसी पल खत्म हो गया.

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आजादी की खुशी, फिर बड़ा सदमा

चार महीने बाद सियोल में किम इल‑ह्योक की पत्नी ने बेटी को जन्म दिया. एक साल बाद परिवार ने उसका पहला जन्मदिन मनाया. आजादी की पहली बड़ी खुशी परिवार ने इस दिन मनाई. लेकिन दो महीने बाद ही, इस पूरी योजना के सूत्रधार छोटे भाई किम यी‑ह्योक की स्कूबा डाइविंग हादसे में मौत हो गई. उसने सिर्फ 19 महीने की आजादी देखी.

अब आगे की जिंदगी

किम इल‑ह्योक अब साउथ कोरिया में शेफ बनने की ट्रेनिंग ले रहे हैं और सार्वजनिक रूप से नॉर्थ कोरिया की जिंदगी पर बोलते हैं. मार्च 2026 में उनके घर दूसरी बेटी ने जन्म लिया. वह कहते हैं, 'मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं.' यह कहानी न सिर्फ एक परिवार की हिम्मत की मिसाल है, बल्कि उस कीमत की भी याद दिलाती है, जो आजादी के लिए चुकानी पड़ती है.

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