हिमालय में तेजी से सूखते प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने के लिए IIT Roorkee ने वैज्ञानिक मॉडल पर आधारित पहल शुरू की है. संस्थान ने उत्तराखंड के टिहरी जिले में नया जल स्रोत विकसित किया है. इससे पानी की उपलब्धता दोगुनी से अधिक हो गई है. IIT रुड़की का यह कदम हिमालयी क्षेत्र में गर्मियों के मौसम में होने वाले जल संकट की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. नया जल स्रोत कीर्तिनगर ब्लॉक के ऊंचौन गांव में चंद्रबदनी मंदिर की तरफ जाने वाली नई बनी सड़क के किनारे विकसित किया गया है. इससे अब स्थानीय पानी के स्रोतों पर निर्भर परिवार को बड़ी राहत मिलेगी. इससे पीने के पानी की उपलब्धता प्रतिदिन करीब 500 लीटर से बढ़कर 1,000 लीटर या उससे अधिक हो गई है.
2 शोध पर आधारित है यह पहल
यह पहल लघु हिमालय क्षेत्र में स्थित तकोली गाड जलग्रहण क्षेत्र में किए गए दो शोध अध्ययनों पर आधारित है. यह परियोजना केंद्र सरकार के राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन और नमामि गंगे कार्यक्रम द्वारा वित्तपोषित है. यह क्षेत्र अलकनंदा नदी बेसिन में करीब 143 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है. दोनों अध्ययन इस बात का विश्लेषण करते हैं कि जलस्रोतों का रिचार्ज कैसे होता है और भूजल की गुणवत्ता पर भूवैज्ञानिक कारकों का क्या असर पड़ता है.
दोनों अध्ययन में क्या है?
पहला अध्ययन “स्थिर एवं रेडियो समस्थानिकों के माध्यम से अलकनंदा नदी बेसिन में जलस्रोत पुनर्भरण की गतिशीलता से जुड़ी जल-मौसम विज्ञान संबंधी प्रक्रियाओं का विश्लेषण” है. इसके अनुसार, जलस्रोतों के पुनर्भरण में लगभग 82 प्रतिशत योगदान मानसूनी वर्षा का है, जबकि शीतकालीन और मानसून-पूर्व वर्षा का योगदान क्रमशः लगभग 10 और आठ प्रतिशत है. ये निष्कर्ष विभिन्न मौसमों में जलस्रोत प्रणालियों को बनाए रखने में मानसूनी जल के अंतःप्रवेश और भूजल भंडारण के महत्व को रेखांकित करते हैं.
वहीं, दूसरी स्टडी, “हिमनद-विहीन लघु हिमालयी जलस्रोत प्रणाली में मौसमी अपक्षय प्रक्रियाओं पर शैलविज्ञान संबंधी नियंत्रण” है जो यह विश्लेषण करता है कि भूवैज्ञानिक संरचनाएं और मौसमी अपक्षय प्रक्रियाएं, जलस्रोतों के पानी की रासायनिक संरचना को किस प्रकार प्रभावित करती हैं. शोध में कार्बोनेट शैलों का अपक्षय, मौसमी पुनर्भरण और मानवीय गतिविधियों को जल की रासायनिक विशेषताओं को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में पहचाना गया है.
गर्मियों को स्थानीय लोगों को मिलेगा पानी
भाषा की रिपोर्ट के अनुसार, संस्थान की टीम ने भूभौतिकीय जांच से उन चट्टानी परतों की पहचान की जिनमें पानी को स्टोर करने की क्षमता है. इसके बाद गहराई और विस्तार का आकलन कर ढलान पर कई खाइयां (Trenches) बनाई गईं. ये खाइयां बरसात के पानी की रफ्तार को धीमा करती हैं, ताकि पानी जमीन में रिसकर भूजल को रिचार्ज कर सके. इसी चिन्हित क्षेत्र में एक नियंत्रित मार्ग बनाकर भूजल को सतह पर लाया गया, जिससे एक नया जलस्रोत विकसित हुआ. इससे कम पानी वाले मौसम में भी स्थानीय लोगों को पानी मिलने लगा.
जलस्रोत के प्रवाह और जल गुणवत्ता की निरंतर निगरानी के साथ-साथ सामुदायिक भागीदारी इस पहल के दीर्घकालिक परिणामों का आकलन करने और हिमालयी क्षेत्र के अन्य स्थानों पर ऐसे प्रयासों को दिशा देने के लिए महत्वपूर्ण होगी. बता दें कि हिमालयी क्षेत्रों में जलस्रोत ही पीने के पानी का मुख्य सहारा हैं, खासकर दूरस्थ गांवों में. जानकारी के मुताबिक, करीब 50% जलस्रोत या तो पूरी तरह सूख चुके हैं या उनका प्रवाह बेहद कम हो गया है, जो गर्मियों में और घट जाता है.
संस्थान ने कहा कि हिमालय में जल संकट का हल तभी निकलेगा, जब हम जलस्रोतों के स्रोत, प्रवाह और मौसमी व्यवहार को समझेंगे. हमारा शोध बताता है कि मानसून, भूजल भंडारण और भूविज्ञान की भूमिका सबसे अहम है. वहीं, संस्थान के निदेशक प्रो. के.के. पंत ने कहा कि वैज्ञानिक शोध का असली मतलब तभी है जब वह समाज की समस्याओं का समाधान बने.
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